भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 318 में से

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पृष्ठ 281

२७० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३ अर्चन्ति सूर्यो नित्यं जपेन रविमण्डले। द्वारा, हृदयमें ध्यानद्वारा और सूर्यमण्डलमें जपके द्वारा आदित्यमण्डले दिव्यं देवदेवमनामयम्। भगवान् विष्णुका पूजन करते हैं। वे भक्तजन सूर्यमण्डलमें शङ्खचक्रगदापाणिं ध्यात्वा विष्णुमुपासते॥ १६ दिव्य, अनामय, देवदेव शङ्ख-चक्र-गदाधारी भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए उनकी उपासना करते हैं। जो ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती केयूर, मकराकृतिकुण्डल, किरीट, हार आदि आभूषणोंसे नारायणः सरसिजासनसंनिविष्टः। भूषित हो, हाथमें शङ्ख-चक्र धारण किये कमलासनपर केयूरवान्मकरकुण्डलवान् किरीटी विराजमान हैं तथा जिनके शरीरकी कान्ति सुवर्णके हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः॥ १७ समान देदीप्यमान है, सूर्यमण्डलके मध्यमें विराजमान उन भगवान् नारायणका सदा ध्यान करे। जो प्रतिदिन एतत्पठन् केवलमेव सूक्तं बुद्धिमें भगवान् विष्णुकी भावना करके केवल इस दिने दिने भावितविष्णुबुद्धिः। 'ध्येयः सदा…………' इत्यादि सूक्तका पाठमात्र ही कर लेता स सर्वपापं प्रविहाय वैष्णवं है, वह भगवान् विष्णुको संतुष्ट करनेवाला पुरुष सब पदं प्रयात्यच्युततुष्टिकृन्नरः॥ १८ पापोंसे मुक्त हो विष्णुधामको पहुँच जाता है। बिना मूल्यके ही मिलनेवाले पूजनोपचार-पत्र, पुष्प, फल पत्रेषु पुष्पेषु फलेषु तोये- और जलके सदा रहते हुए तथा एकमात्र भक्तिसे ही ष्वक्रीतलभ्येषु सदैव सत्सु। सुलभ होनेवाले भगवान् पुराण-पुरुषके होते हुए मनुष्यद्वारा भक्त्यैकलभ्ये पुरुषे पुराणे मुक्तिके लिये प्रयत्न क्यों नहीं किया जाता? अर्थात् उक्त मुक्त्यै किमर्थं क्रियते न यत्नः॥ १९ सुलभ उपचारोंसे भगवान्का पूजन करके लोग मोक्ष पानेके लिये यत्न क्यों नहीं करते? ॥ १५-१९॥ इत्येवमुक्तः पुरुषस्य विष्णो- नृपवर! इस प्रकार यह परमपुरुष भगवान् विष्णुकी रर्चाविधिस्तेऽद्य मया नृपेन्द्र। पूजा-विधि आज मैंने तुम्हें बतायी है। यदि तुम्हें वैष्णव- अनेन नित्यं कुरु विष्णुपूजां पद प्राप्त करनेकी इच्छा हो तो इस विधिके द्वारा सदा प्राप्तुं तदिष्टं यदि वैष्णवं पदम्॥ २० भगवान् विष्णुकी पूजा करो ॥ २० ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे विष्णोरर्चाविधिर्नाम द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'भगवान् विष्णुकी पूजा-विधि' नामक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६२॥ ──❖── तिरसठवाँ अध्याय अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार सहस्रानीक उवाच सहस्रानीक बोले- ब्रह्मन्! इस समय आपने सत्यमुक्तं त्वया ब्रह्मन् वैदिकः परमो विधिः। देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुके पूजनकी यह उत्तम वैदिक विष्णोर्देवातिदेवस्य पूजनं प्रति मेऽधुना॥ १ विधि बतायी, वह बिलकुल ठीक है; परंतु ब्रह्मन्! इस विधिसे तो केवल वेदज्ञ पुरुष ही मधुसूदनकी पूजा कर अनेन विधिना ब्रह्मन् पूज्यते मधुसूदनः सकते हैं, दूसरे लोग नहीं; इसलिये आप ऐसी कोई वेदज्ञैरेव नान्यैस्तु तस्मात्सर्वहितं वद॥ २ विधि बताइये, जो सबके लिये उपयोगी हो॥ १-२॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth