भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 290, कुल 318 में से

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पृष्ठ 290

अध्याय ६३ ] अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार २७९

विभीषणोऽपि ते भ्राता सुखी तिष्ठति सर्वदा । | तुम्हारे भाई विभीषण तो सुखपूर्वक हैं न ?' नारदजीकी एवमुक्ता च मुनिना सा कृष्णावदनाभवत् ॥ ८७ | यह बात सुनते ही उसका मुख भयसे काला पड़ गया। विस्मितो देवराजोऽपि छलितो दुष्टयानया । | देवराज इन्द्र भी बहुत आश्चर्यमें पड़े और मन-ही- नारदोऽपि गतः स्नातुं कैलासे मानसं सरः ॥ ८८ | मन कहने लगे—'इस दुष्टाने मुझे छल लिया।' नारदजी | भी वहाँसे कैलास पर्वतके निकट मानससरोवरमें स्नान इन्द्रस्तां हन्तुकामोऽपि आगच्छन्मन्दराचलम् । | करनेके लिये चले गये। तब इन्द्र भी उस राक्षसीका यत्राश्रमोऽस्ति वै नूनं तृणबिन्दोर्महात्मनः ॥ ८९ | वध करनेके लिये मन्दराचलपर, जहाँ महात्मा तृणबिन्दु का | आश्रम था, आये और वहाँ थोड़ी देरतक विश्राम करके क्षणं विश्रम्य तत्रैव धृत्वा केशेषु राक्षसीम् । | वे उस नाडीजङ्घा राक्षसीके केश पकड़कर उसे मारना हन्तुमिच्छति देवेशो नाडीजङ्घां निशाचरीम् ॥ ९० | ही चाहते थे कि इतनेमें महात्मा तृणबिन्दु अपने आश्रमसे तावत्तत्र समायातस्तृणबिन्दुन्निजाश्रमात् । | निकलकर वहाँ आ गये ॥ ८५—९०१/२ ॥ धृता क्रन्दति सा राजन्निन्द्रेणापि निशाचरी ॥ ९१ | राजन् ! इधर इन्द्रके द्वारा पकड़ी जानेपर वह राक्षसी | भी करुण विलाप करने लगी—'हा! मैं मारी जा रही मा मां रक्षति पुण्यात्मा हन्यमानां च साम्प्रतम् । | हूँ; इस समय कोई भी पुण्यात्मा पुरुष मुझ दीनाको तदाऽऽगत्य मुनिश्रेष्ठस्तृणबिन्दुर्महातपाः ॥ ९२ | नहीं बचा रहा है' ॥ ९११/२ ॥ जगाद पुरतः स्थित्वा मुञ्चेमां महिलां वने । | उसी समय महातपस्वी तृणबिन्दु मुनि वहाँ आ जल्पत्येवं मुनौ तस्मिन् महेन्द्रेण निशाचरी ॥ ९३ | पहुँचे और इन्द्रके सामने खड़े हो बोले—'हमारे तपोवनमें | इस महिलाको न मारो, छोड़ दो' ॥ ९२१/२ ॥ वज्रेण निहता भूयः कोपयुक्तेन चेतसा । | भूप ! तृणबिन्दु मुनि यों कह ही रहे थे कि महेन्द्रने स चुकोप मुनिश्रेष्ठः प्रेक्षमाणो मुहुर्मुहुः ॥ ९४ | क्रुद्ध होकर वज्रसे उस राक्षसीको मार ही तो डाला। यदेषा युवती दुष्टा निहता मे तपोवने । | तब वे मुनिवर इन्द्रकी ओर बार-बार देखते हुए बहुत ततस्त्वं मम शापेन निश्चयात् स्त्री भविष्यसि ॥ ९५ | ही कुपित हुए और बोले—'रे दुष्ट ! तूने मेरे तपोवनमें | इस युवतीका वध किया है, इसलिये तू मेरे शापसे इन्द्र उवाच | निश्चय ही स्त्री हो जायगा' ॥ ९३—९५ ॥ एषा नाथ महादुष्टा राक्षसी निहता मया । | इन्द्र बोले—नाथ! मैं देवताओंका स्वामी इन्द्र हूँ अहं स्वामी सुराणां च शापं मा देहि मेऽधुना ॥ ९६ | और यह स्त्री महादुष्टा राक्षसी थी; इसलिये मैंने इसका | वध किया है। आप इस समय मुझे शाप न दें ॥ ९६ ॥ मुनिरुवाच | मुनि बोले—अवश्य ही मेरे तपोवनमें भी दुष्ट और नूनं तपोवनेऽस्माकं दुष्टास्तिष्ठन्ति साधवः । | साधु पुरुष भी रहते हैं, परंतु वे मेरी तपस्याके प्रभावसे ममात्र तपसो भावान्न निघ्नन्ति परस्परम् ॥ ९७ | परस्पर किसीका वध नहीं करते। (तूने मेरे तपोवनकी | मर्यादा भङ्ग की है, अतः तू शापके ही योग्य है।) ॥ ९७ ॥ इत्युक्तो हि तदा चेन्द्रः प्राप्तः स्त्रीत्वं न संशयः । | भूप ! मुनिके यों कहनेपर इन्द्र निःसंदेह स्त्रीयोनिको प्राप्त जगाम त्रिदिवं भूप हतशक्तिपराक्रमः ॥ ९८ | हो गये और पराक्रम तथा शक्ति खोकर स्वर्गको लौट आये। | उन्होंने सदा ही लज्जा और दुःखसे खिन्न रहनेके कारण नासीनो हि भवत्येव सर्वदा देवसंसदि । | देवताओंकी सभामें बैठना ही छोड़ दिया। इधर देवता भी देवा दुःखं समापन्ना दृष्ट्वा स्त्रीत्वं गतं हरिम् ॥ ९९ | इन्द्रको स्त्रीके रूपमें परिवर्तित हुआ देखकर बहुत दुःखी

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