भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 291, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 291

२८० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३ ततो देवगणाः सर्वे वासवेन समन्विताः। हुए। तत्पश्चात् सभी देवता और दीना शची इन्द्रको साथ जग्मुश्च ब्रह्मसदनं तथा दीना शची तदा॥ १०० लेकर ब्रह्माजीके धामको गये। जबतक ब्रह्माजी समाधिसे ब्रह्मा भग्नसमाधिश्च यावत् तत्रैव संस्थिताः। विरत हुए, तबतक वे सभी वहीं ठहरे रहे और इन्द्रके देवा ऊचुश्च ते सर्वे वासवेन समन्विताः॥ १०१ साथ ही सब देवता ब्रह्माजीसे बोले॥ ९८-१०१॥ तृणबिन्दोर्मुनेः शापाद्यातः स्त्रीत्वं सुराधिपः। 'ब्रह्मन्! सुरराज इन्द्र तृणबिन्दु मुनिके शापसे स्त्रीयोनिको स मुनिः कोपवान् ब्रह्मन्नैव गच्छत्यनुग्रहम्॥ १०२ प्राप्त हो गये हैं; वे मुनि बड़े क्रोधी हैं, किसी प्रकार पितामह उवाच अनुग्रह नहीं करते'॥ १०२॥ ब्रह्माजी बोले—इसमें उन महात्मा तृणबिन्दु मुनिका न मुनेरपराधः स्यात्तृणबिन्दोर्महात्मनः। कोई अपराध नहीं है। इन्द्र स्त्रीवधरूपी अपने ही स्वकर्मणोपयातोऽसौ स्त्रीत्वं स्त्रीवधकारणात्॥ १०३ कर्मसे स्त्रीभावको प्राप्त हुए हैं। देवताओ! देवराज इन्द्रने भी मदमत्त होकर बड़ा ही अन्याय किया है, जो चकार दुर्नयं देवा देवराजोऽपि दुर्मदः। कुबेरकी पत्नी चित्रसेनाका गुप्तरूपसे अपहरण कर लिया। जहार चित्रसेनां च सुगुप्तां धनदाङ्गनाम्॥ १०४ यही नहीं, इन्होंने तृणबिन्दुके तपोवनमें एक युवतीका तथा जघान युवतीं तृणबिन्दोस्तपोवने। वध किया है, अतः अपने इस निन्द्य कर्मके परिणामस्वरूप तेन कर्मविपाकेन स्त्रीभावं वासवो गतः॥ १०५ ही ये इन्द्र स्त्रीभावको प्राप्त हुए हैं॥ १०३-१०५॥ देवा ऊचुः देवगण बोले—नाथ इन्होंने दुर्बुद्धिसे प्रेरित होकर जो शंकरप्रिय कुबेरका अपमान किया है, उसके लिये यदसौ कृतवाञ्शम्भोरुर्नयं नाथ दुर्मतिः। हम सब लोग शचीके साथ कुबेरको प्रसन्न करनेका यत्न तत्सर्वं साधयिष्यामो वयं शच्या समन्विताः॥ १०६ करेंगे। विभो! कुबेरकी पत्नी चित्रसेना मन्दराचलपर कान्ता धनाधिनाथस्य गूढा तिष्ठति या विभो। गुप्तरूपसे रहती है, हम सभी लोग सम्मति करके उसे तां च तस्मै प्रदास्यामः सर्वे कृत्वा परां मतिम्॥ १०७ कुबेरको अर्पित कर देंगे। देवराज इन्द्र भी प्रति त्रयोदशी त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां देवराजः शचीयुतः। और चतुर्दशीको नन्दनवनमें शचीको साथ लेकर यक्ष नन्दने चार्चनं कर्ता सर्वदा यक्षरक्षसाम्॥ १०८ और राक्षसोंकी पूजा करेंगे॥ १०६-१०८॥ तत्पश्चात् शची अपने प्रियतमको कष्टमें डालनेवाली ततः शची तदा गूढं चित्रसेनां विगृह्य च। चित्रसेनाको गुप्तरूपसे ले जाकर यक्षराज कुबेरके भवनमें मुमोच यक्षभवनं प्रियकष्टानुवर्तिनीम्॥ १०९ छोड़ आयीं। इसी समय कुबेरका दूत असमयमें ही एतस्मिन्नन्तरे दूतोऽकाले लङ्कां समागतः। लङ्कामें पहुँचा और कुबेरसे चित्रसेनाके लौट आनेका धनेशं कथयामास चित्रसेनासमागमम्॥ ११० समाचार सुनाया—'हे धनाधिप! आपकी प्रिय पत्नी चित्रसेना शचीके साथ घर लौट आयी है। वह शची- शच्या साकं समायाता तव कान्ता धनाधिप। जैसी अनुपम सखीको पाकर कृतार्थ हो चुकी है।' तब सखीं स्वामतुलां प्राप्य चरितार्था बभूव सा॥ १११ कुबेर भी कृतकृत्य होकर अपने घरको लौट आये। धनेशोऽपि कृतार्थोऽभूज्जगाम निजवेश्मनि। इसके बाद देवगण पुनः ब्रह्मलोकमें जाकर ब्रह्माजीसे प्रार्थना करने लगे॥ १०९-११११/२॥ देवा ऊचुः देवगण बोले—ब्रह्मन्! आपकी कृपासे सर्वमेतत्कृतं ब्रह्मन् प्रसादात्ते न संशयः॥ ११२ यह सारा काम तो हो गया—इसमें संदेह नहीं। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth