संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 292, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६३] अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार २८१ पतिहीना यथा नारी नाथहीनं यथा बलम्। गोकुलं कृष्णहीनं तु तथेन्द्रेणामरावती ॥ ११३ जपः क्रिया तपो दानं ज्ञानं तीर्थं च वै प्रभो। वासवस्य समाख्याहि यतः स्त्रीत्वाद्दिमुच्यते ॥ ११४ ब्रह्मोवाच निहन्तुं न मुनेः शापं समर्थोऽहं न शङ्करः। तीर्थं चान्यन्न पश्यामि मुक्त्वैकं विष्णुपूजनम् ॥ ११५ अष्टाक्षरेण मन्त्रेण पूजनं च तथा जपम्। करोतु विधिवच्छक्रः स्त्रीत्वाद्येन च मुच्यते ॥ ११६ एकाग्रमनसा शक्र स्नात्वा श्रद्धासमन्वितः। ॐ नमो नारायणायेति जप त्वमात्मशुद्धये ॥ ११७ लक्षद्वये कृते जाप्ये स्त्रीभावान्मुच्यसे हरे। इति श्रुत्वा तथाकार्षीद्ब्रह्मोक्तं वचनं हरिः। स्त्रीभावाच्च विनिर्मुक्तस्तदा विष्णोः प्रसादतः ॥ ११८ मार्कण्डेय उवाच इति ते कथितं सर्वं विष्णुमाहात्म्यमुत्तमम्। मया भृगुनियुक्तेन कुरु सर्वमतन्द्रितः ॥ ११९ शृण्वन्ति ये विष्णुकथामकल्मषा वीर्यं हि विष्णोऽखिलकारणस्य। ते मुक्तपापाः परदारगामिनो विशन्ति विष्णोः परमं पदं ध्रुवम् ॥ १२० सूत उवाच इति सम्बोधितस्तेन मार्कण्डेयेन पार्थिवः। नरसिंहं समाराध्य प्राप्तवान् वैष्णवं पदम् ॥ १२१ एतत्ते कथितं सर्वं भरद्वाज मुने मया। सहस्रानीकचरितं किमन्यत् कथयामि ते ॥ १२२ कथामिमां यस्तु शृणोति मानवः पुरातनीं सर्वविमुक्तिदां च। सम्प्राप्य स ज्ञानमतीव निर्मलं तेनैव विष्णुं प्रतिपद्यते जनः ॥ १२३ परंतु अब जैसे पतिके बिना नारी, सेनापतिके बिना सेना और श्रीकृष्णके बिना व्रजकी शोभा नहीं होती, उसी प्रकार इन्द्रके बिना अमरावती सुशोभित नहीं होती। प्रभो! अब इन्द्रके लिये कोई जप, क्रिया, तप, दान, ज्ञान और तीर्थ-सेवन आदि उपाय बताइये, जिससे स्त्रीभावसे इनका उद्धार हो सके ॥ ११२-११४॥ ब्रह्माजी बोले—उस मुनिके शापको अन्यथा करनेमें न तो मैं समर्थ हूँ और न भगवान् शङ्कर ही। इसके लिये एकमात्र भगवान् विष्णुके पूजनको छोड़कर दूसरा कोई उपाय भी सफल नहीं दीख पड़ता। बस, इन्द्र अष्टाक्षर-मन्त्रके द्वारा भगवान् विष्णुका विधिपूर्वक पूजन करें और उस मन्त्रका जप करते रहें; इससे वे स्त्रीभावसे मुक्त हो सकते हैं। इन्द्र! स्नान करके, श्रद्धायुक्त हो, आत्मशुद्धि-के लिये एकाग्रचित्तसे 'ॐ नमो नारायणाय' —इस मन्त्रका जप करो। देवेन्द्र! इस मन्त्रका दो लाख जप हो जानेपर तुम स्त्री-योनिसे मुक्त हो सकते हो। यह सुनकर इन्द्रने ब्रह्माजीकी आज्ञाका यथावत् पालन किया, तब वे भगवान् विष्णुकी कृपासे स्त्रीभावसे छुटकारा पा गये ॥ ११५-११८॥ मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार मैंने भृगुजीकी आज्ञासे तुम्हारे समक्ष परम उत्तम भगवान् विष्णुके माहात्म्यको पूर्णरूपसे सुना दिया। अब तुम आलस्य त्यागकर भगवान् विष्णुकी आराधना करो। जो लोग अखिल जगत्के कारणभूत भगवान् विष्णुके पराक्रमसे सम्बन्ध रखनेवाली उनकी कथाको सुनते हैं, वे यदि परस्त्रीगामी रहे हों तो भी पापहीन एवं कल्मषरहित होकर निश्चय ही भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त करते हैं ॥ ११९-१२०॥ सूतजी कहते हैं—मुनिवर मार्कण्डेयजीके द्वारा इस तरह सम्यक् प्रकारसे उपदिष्ट होकर राजा सहस्रानीक भगवान् नृसिंहकी आराधना करके विष्णुके अविनाशी पदको प्राप्त हो गये। भरद्वाज मुने! इस प्रकार मैंने आपको यह सम्पूर्ण सहस्रानीक-चरित्र सुनाया; इसके बाद आपसे और क्या कहूँ? ॥ १२१-१२२॥ जो मानव सब प्रकारसे मोक्ष देनेवाली इस प्राचीन कथाका श्रवण करता है, वह अत्यन्त निर्मल ज्ञान प्राप्त करके उसीके द्वारा भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेता है ॥ १२३॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सहस्रानीकचरितेऽष्टाक्षरमन्त्रकथनं नाम त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणके अन्तर्गत सहस्रानीक-चरित्रके अन्तर्गत 'अष्टाक्षर-मन्त्रकी महिमाका कथन' नामक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६३ ॥