भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 293, कुल 318 में से

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पृष्ठ 293

२८२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय-६४ चौंसठवाँ अध्याय भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान


[मूल संस्कृत श्लोक]

श्रीभरद्वाज उवाच सत्यं केचित्प्रशंसन्ति तपः शौचं तथापरे। सांख्यं केचित्प्रशंसन्ति योगमन्ये प्रचक्षते॥ १ ज्ञानं केचित्प्रशंसन्ति समलोष्टाश्मकाञ्चनाः। क्षमां केचित्प्रशंसन्ति तथैव च दयार्जवम्॥ २ केचिद्दानं प्रशंसन्ति केचिदाहुः परं शुभम्। सम्यग्ज्ञानं परं केचित्केचिद्वैराग्यमुत्तमम्॥ ३ अग्निष्टोमादिकर्माणि तथा केचित्परं विदुः। आत्मध्यानं परं केचित्सांख्यतत्त्वार्थवेदिनः॥ ४ धर्मार्थकाममोक्षाणां चतुर्णामिह केवलम्। उपायः पदभेदेन बहुधैवं प्रचक्ष्यते॥ ५ एवं चावस्थिते लोके कृत्याकृत्यविधौ नराः। व्यामोहमेव गच्छन्ति विमुक्ताः पापकर्मभिः॥ ६ यदेतेषु परं कृत्यमनुष्ठेयं महात्मभिः। वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ मम सर्वार्थसाधकम्॥ ७ सूत उवाच श्रूयतामिदमत्यन्तं गूढं संसारमोचनम्। अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्॥ ८ पुण्डरीकस्य संवादं देवर्षेर्नारदस्य च। ब्राह्मणः श्रुतसम्पन्नः पुण्डरीको महामतिः॥ ९ आश्रमे प्रथमे तिष्ठन् गुरूणां वशगः सदा। जितेन्द्रियो जितक्रोधः संध्योपासनधिष्ठितः॥ १० वेदवेदाङ्गनिपुणः शास्त्रेषु च विचक्षणः। समिद्भिः साधुयत्नेन सायं प्रातर्हुताशनम्॥ ११


[हिन्दी अनुवाद]

श्रीभरद्वाजजी बोले—सूतजी! कुछ लोग 'सत्य' को ही पुरुषार्थका साधक बताकर उसकी प्रशंसा करते हैं, दूसरे लोग 'तपस्या' और 'पवित्रता' को उत्तम बताते हैं। कुछ लोग 'सांख्य' और कुछ लोग 'योग' की प्रशंसा करते हैं। ढेले, पत्थर और सोनेको समान समझनेवाले कुछ अन्य लोग 'ज्ञान' को ही पुरुषार्थ-साधनके लिये उत्तम मानते हैं। कुछ लोग 'क्षमा' की प्रशंसा करते हैं तो कुछ लोग 'दया' और 'सरलता' की। कुछ लोग ऐसे हैं, जो 'दान' को उत्तम बताते हैं, कुछ लोग और ही किसी उपायको शुभ कहते हैं। दूसरे लोग 'सम्यग्ज्ञान' को उत्तम मानते हैं और अन्य जन 'वैराग्य' को श्रेष्ठ बताते हैं। कुछ याज्ञिक लोग 'अग्निष्टोम' आदि यज्ञोंको ही सबसे बढ़कर मानते हैं। सांख्यतत्त्वका मर्म जाननेवाले कुछ लोग 'आत्माके ध्यान' को श्रेष्ठ मानते हैं। इस प्रकार यहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चारों पुरुषार्थोंका उपाय ही नाम-भेदसे नाना प्रकारका बताया जाता है। ऐसी स्थितिमें जगत्में पापकर्मसे विमुक्त पुरुष भी कर्तव्याकर्तव्यके विषयमें कुछ निश्चय न हो सकनेके कारण मोहमें ही पड़े रहते हैं। सर्वज्ञ! इन उपर्युक्त 'सत्य' आदि उपायोंमें जो सबसे उत्तम उपाय हो और महात्माओंद्धारा अवश्यकर्तव्य हो, सब मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले उस उपायका आप हमसे वर्णन करें॥ १–७॥ सूतजी कहते हैं—संसार-बन्धनसे मुक्त करनेवाले इस अत्यन्त गूढ उपायको लोग सुनें। इस विषयमें महात्माजन देवर्षि नारद और भक्तवर पुण्डरीकके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका वर्णन किया करते हैं॥ ८१/२॥ महामति पुण्डरीकजी एक विद्वान् ब्राह्मण थे। वे सदा गुरुजनोंके वशमें रहते हुए ब्रह्मचर्य आश्रमके नियमोंका पालन करते थे। उन्होंने अपनी इन्द्रियों और क्रोधको जीत लिया था तथा वे नियमानुसार संध्योपासन किया करते थे। वेद और वेदाङ्गोंमें वे निष्णात थे तथा अन्य शास्त्रोंके भी पण्डित थे। वे प्रतिदिन समिधा एकत्रकर सायं और प्रातःकाल अत्यन्त यत्नपूर्वक अग्निकी उपासना


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