संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 294, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६४] भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान २८३
ध्यात्वा यज्ञपतिं विष्णुं सम्यगाराधयन् विभुम्। | किया करते थे। साक्षात् ब्रह्मपुत्र नारदजीके समान वे सर्वव्यापी तपःस्वाध्यायनिरतः साक्षाद्ब्रह्मसुतो यथा॥ १२ | यज्ञपति भगवान् विष्णुकी विधिपूर्वक आराधना करते हुए | उनका ध्यान किया करते थे और सदा तपस्या तथा स्वाध्यायमें उदकेन्धनपुष्पार्थैरसकृत्तर्पयन् गुरून्। | ही लगे रहते थे। जल, ईंधन और फूल आदि आवश्यक मातापितृभ्यां शुश्रूषुर्भिक्षाहारी जनप्रियः॥ १३ | सामान लाकर वे सदा ही गुरुजनोंको संतुष्ट रखते और | उनकी अपने माता-पिताके समान शुश्रूषा किया करते थे। ब्रह्मविद्यामधीयानः प्राणायामपरायणः। | भिक्षा माँगकर भोजन करते थे और अपने सद्व्यवहारोंके तस्य सर्वार्थभूतस्य संसारेऽत्यन्तनिःस्पृहा॥ १४ | कारण लोगोंके परम प्रिय हो गये थे। वे सदा ब्रह्मविद्याका | अध्ययन और प्राणायामका अभ्यास करते रहते थे। महाराज! बुद्धिरासीन्महाराज संसारार्णवतारणी। | समस्त पदार्थोंको वे अपना स्वरूप ही समझते थे; अतः पितरं मातरं चैव भ्रातॄनथ पितामहान्॥ १५ | संसारके विषयोंमें उनकी बुद्धि अत्यन्त निःस्पृह हो भवसागरसे | पार उतारनेवाली हो गयी थी॥ ९-१४ १/२॥ पितृव्यान्मातुलांश्चैव सखीन् सम्बन्धिबान्धवान्। | भरद्वाजजी! उनका वैराग्य यहाँतक बढ़ गया कि वे महान् परित्यज्य महोदारस्तृणानीव यथासुखम्॥ १६ | उदार पुण्डरीकजी पिता, माता, भाई, पितामह, चाचा, मामा, | मित्र, सम्बन्धी तथा बान्धवजनोंको तृणके समान त्यागकर, विचचार महीमेतां शाकमूलफलाशनः। | शाक और मूल-फलादिका आहार करते हुए इस पृथ्वीपर अनित्यं यौवनं रूपमायुष्यं द्रव्यसंचयम्॥ १७ | आनन्दपूर्वक विचरने लगे। उन्होंने यौवन, रूप, आयु और | धन-संग्रहकी अनित्यताका विचार करके समस्त त्रिभुवनको इति संचिन्तयानेन त्रैलोक्यं लोष्ठवत् स्मृतम्। | मिट्टीके ढेलेके समान तुच्छ समझ लिया था और अपने पुराणोदितमार्गेण सर्वतीर्थानि वै मुने॥ १८ | मनमें यह निश्चय करके कि 'मैं पुराणोक्त मार्गसे यथासमय | सभी तीर्थोंकी यात्रा करूँगा', वे महाबाहु, महातेजस्वी और गमिष्यामि यथाकालमिति निश्चितमानसः। | महाव्रती पुण्डरीकजी गङ्गा, यमुना, गोमती, गण्डकी, शतद्रू, गङ्गां च यमुनां चैव गोमतीमथ गण्डकीम्॥ १९ | पयोष्णी, सरयू और सरस्वतीके तटपर, प्रयागमें, नर्मदा | आदि महानदियों तथा नदोंके तटपर, गयामें तथा विन्ध्याचल शतद्रूं च पयोष्णीं च सरयूं च सरस्वतीम्। | और हिमालयके तीर्थोंमें एवं इनके अतिरिक्त अन्यान्य प्रयागं नर्मदां चैव महानद्यो नदानपि॥ २० | तीर्थोंमें भी यथासमय विधिपूर्वक भ्रमण करते रहे। इसी | तरह घूमते हुए, पुण्यकर्मोंके अधीन हो वे तपस्वी वीर महाभाग गयां च विन्ध्यतीर्थानि हिमवत् प्रभवाणि च। | पुण्डरीक शालग्रामक्षेत्रमें जा पहुँचे॥ १५-२२ १/२॥ अन्यानि च महातेजास्तीर्थानि स महाव्रतः॥ २१ | वह तीर्थ तत्त्वज्ञानी तपस्वी ऋषियोंद्वारा सेवित था। | वहाँ मुनियोंके सुरम्य आश्रम थे, जो पुराणोंमें प्रसिद्ध संचचार महाबाहुर्यथाकालं यथाविधि। | हैं। वह तीर्थ चक्रनदीसे भूषित है और वहाँके कदाचित् प्राप्तवान् वीरः शालग्रामं तपोधनः॥ २२ | शिलाखण्ड भगवान्के चक्रसे चिह्नित हैं। वह तीर्थ | जितना ही सुरम्य था, उतना ही एकान्त। उसका विस्तार पुण्डरीको महाभागः पुण्यकर्मवशानुगः। | बड़ा था और वहाँ चित्त स्वतः प्रसन्न रहता था। वहाँपर आसेव्यमानमृषिभिस्तत्त्वविद्भिस्तपोधनैः ॥ २३ | कुछ चक्रसे चिह्नित प्राणी रहते थे, जिनका दर्शन | बहुत ही पावन था। वहाँ पुण्यतीर्थके यात्री यथेष्ट मुनीनामा श्रमं रम्यं पुराणेषु च विश्रुतम्। | विचरते रहते थे। उस महापवित्र शालग्रामक्षेत्रमें महामति भूषितं चक्रनद्या च चक्राङ्कितशिलातलम्॥ २४ | पुण्डरीकजी प्रसन्नचित्त हो तीर्थ-सेवन करने लगे। रम्यं विविक्तं विस्तीर्णं सदा चित्तप्रसादकम्। केचिच्चक्राङ्कितास्तस्मिन् प्राणिनः पुण्यदर्शनाः॥ २५ विचरन्ति यथाकामं पुण्यतीर्थप्रसङ्गिनः। तस्मिन् क्षेत्रे महापुण्ये शालग्रामे महामतिः॥ २६
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