भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 295, कुल 318 में से

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पृष्ठ 295

२८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४ पुण्डरीकः प्रसन्नात्मा तीर्थानि समसेवत। | वे नियमपूर्वक वहाँ देवह्रद तीर्थमें, पूर्वजन्मकी स्मृति स्नात्वा देवह्रदे तीर्थे सरस्वत्यां च सुव्रतः॥ २७ | दिलानेवाली सरस्वतीके जलमें, चक्र-कुण्डमें और जातिस्मर्यां चक्रकुण्डे चक्रनद्यामृतेष्वपि। | चक्र-नदी (नारायणी)-के जलमें भी स्नान करके उसी तथान्यान्यपि तीर्थानि तस्मिन्नेव चचार सः॥ २८ | क्षेत्रके अन्तर्गत अन्यान्य तीर्थोंमें भ्रमण करते रहते | थे॥ २३-२८॥ ततः क्षेत्रप्रभावेण तीर्थानां चैव तेजसा। | तदनन्तर उस क्षेत्रके प्रभावसे और वहाँके तीर्थोंके मनः प्रसादमगमत्तस्य तस्मिन्महात्मनः॥ २९ | तेजसे उन महात्माका चित्त वहाँ बहुत ही शुद्ध एवं प्रसन्न सोऽपि तीर्थे विशुद्धात्मा ध्यानयोगपरायणः। | हो गया। इस प्रकार शुद्धचित्त एवं ध्यानयोगमें तत्पर हो, वहाँ तत्रैव सिद्धिमाकाङ्क्षन् समाराध्य जगत्पतिम्॥ ३० | ही सिद्धिकी इच्छासे परमभक्तियुक्त हो, वे शास्त्रोक्त विधिसे शास्त्रोक्तेन विधानेन भक्त्या परमया युतः। | जगत्पति भगवान् विष्णुकी आराधना करने लगे। अपनी उवास चिरमेकाकी निर्द्वन्द्वः संयतेन्द्रियः॥ ३१ | इन्द्रियोंको वशमें करके निर्द्वन्द्व रहते हुए उन्होंने अकेले ही | बहुत दिनोंतक वहाँ निवास किया। वे शाक और मूल- शाकमूलफलाहारः संतुष्टः समदर्शनः। | फलादिका आहार करते और सदा संतुष्ट रहते थे। उनकी यमैश्च नियमैश्चैव तथा चासनबन्धनैः॥ ३२ | सर्वत्र समान दृष्टि थी। वे यम, नियम, आसन-बन्ध, तीव्र प्राणायामैः सुतीक्ष्णैश्च प्रत्याहारैश्च संततैः। | प्राणायाम, निरन्तर प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधिके धारणाभिस्तथा ध्यानैः समाधिभिरतन्द्रितः॥ ३३ | द्वारा निरालस्यभावसे भलीभाँति योगाभ्यास करते रहे। इस | प्रकार समस्त पुरुषार्थोंके ज्ञाता निष्पाप महामना पुण्डरीकजीने योगाभ्यासं तदा सम्यक् चक्रे विगतकल्मषः। | देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुमें चित्त लगाकर उनकी आराधना आराध्य देवदेवेशं तद्गतेनान्तरात्मना॥ ३४ | की और उन्हींमें मन लगाये हुए वे उनके परम अनुग्रहकी पुण्डरीको महाभागः पुरुषार्थविशारदः। | आकाङ्क्षासे भजन करने लगे॥ २९-३५॥ | राजेन्द्र! महात्मा पुण्डरीकको उस शालग्रामक्षेत्रमें प्रसादं परमाकाङ्क्षन् विष्णोस्तद्गतमानसः॥ ३५ | निवास करते बहुत समय बीत गया। तब एक दिन तस्य तस्मिन्निवसतः शालग्रामे महात्मनः। | साक्षात् सूर्यके समान महातेजस्वी, वैष्णवहितकारी, पुण्डरीकस्य राजेन्द्र कालोऽगच्छन्महांस्ततः॥ ३६ | परमार्थवेत्ता एवं विष्णुभक्तिपरायण देवर्षि नारदजी तपोनिधि मुने कदाचित्तं देशं नारदः परमार्थवित्। | पुण्डरीक मुनिको देखनेकी इच्छासे उस क्षेत्रमें गये। | समस्त आगमोंके ज्ञाता, महाबुद्धिमान्, महाप्राज्ञ, पूर्णतेजस्वी जगाम सुमहातेजाः साक्षादादित्यसंनिभः॥ ३७ | एवं प्रभापुञ्जसे उपलक्षित नारदजीको वहाँ आया देख तं द्रष्टुकामो देवर्षिः पुण्डरीकं तपोनिधिम्। | पुण्डरीकके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने विनीतभावसे विष्णुभक्तिपरीतात्मा वैष्णवानां हिते रतः॥ ३८ | हाथ जोड़कर उन्हें अर्घ्य निवेदन किया, फिर यथोचितरूपसे स दृष्ट्वा नारदं प्राप्तं सर्वतेजःप्रभान्वितम्। | उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया। तत्पश्चात् परम कान्तिमान् महामतिं महाप्राज्ञं सर्वागमविशारदम्॥ ३९ | विप्रवर पुण्डरीकजी मन-ही-मन यह सोचने लगे कि प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा प्रहृष्टेनान्तरात्मना। | 'ये अद्भुत दिव्य शरीरवाले, मनोरमवेषधारी, तेजस्वी अर्घं दत्त्वा यथायोग्यं प्रणाममकरोत् ततः॥ ४० | महापुरुष कौन हैं? अहो! इनका मुखमण्डल कितना | प्रसन्न है! इनके मस्तकपर जटा-जूट सुशोभित हो रहा कोऽयमत्यद्भुताकारस्तेजस्वी हृद्यवेषधृक्। | है। इन्होंने हाथमें वीणा ले रखी है। इस रूपमें ये साक्षात् आतोद्यहस्तः सुमुखो जटामण्डलभूषणः॥ ४१ | सूर्य ही तो नहीं हैं? अथवा अग्निदेव, इन्द्र और विवस्वानथ वा वह्निरिन्द्रो वरुण एव वा। | वरुणमेंसे तो कोई नहीं हैं?' यों सोचते हुए किसी इति संचिन्तयन् विप्रः पप्रच्छ परमद्युतिः॥ ४२ | निश्चयपर न पहुँचनेके कारण उन्होंने पूछा॥ ३६-४२॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth