संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 296, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६४ ] भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान २८५
पुण्डरीक उवाच को भवानिह सम्प्राप्तः कुतो वा परमद्युते। त्वद्दर्शनं ह्यपुण्यानां प्रायेण भुवि दुर्लभम्॥ ४३
नारद उवाच नारदोऽहमनुप्राप्तस्त्वद्दर्शनकुतूहलात् । पुण्डरीक हरेर्भक्तस्त्वादृशः सततं द्विज॥ ४४ स्मृतः सम्भाषितो वापि पूजितो वा द्विजोत्तम। पुनाति भगवद्भक्तश्चाण्डालोऽपि यदृच्छया॥ ४५ दासोऽहं वासुदेवस्य देवदेवस्य शार्ङ्गिणः। इत्युक्तो नारदेनासौ भक्तिपर्याकुलात्मना॥ ४६ प्रोवाच मधुरं विप्रस्तद्दर्शनसुविस्मितः।
पुण्डरीक उवाच धन्योऽहं देहिनामद्य सुपूज्योऽहं सुरैरपि॥ ४७ कृतार्थाः पितरो मेऽद्य सम्प्राप्तं जन्मनः फलम्। अनुगृह्णीष्व देवर्षे त्वद्भक्तस्य विशेषतः॥ ४८ किं किं करोम्यहं विद्वन् भ्राम्यमाणः स्वकर्मभिः। कर्तव्यं परमं गुह्यमुपदेष्टुं त्वमर्हसि॥ ४९ त्वं गतिः सर्वलोकानां वैष्णवानां विशेषतः।
नारद उवाच अनेकानीह शास्त्राणि कर्माणि च तथा द्विज॥ ५० धर्ममार्गाश्च बहवस्तथैव प्राणिनः स्मृताः। वैलक्षण्यं च जगतस्तस्मादेव द्विजोत्तम॥ ५१
पुण्डरीकजी बोले—परम कान्तिमान् दिव्य पुरुष ! आप कौन हैं और कहाँसे पधारे हैं? इस पृथ्वीपर जिन्होंने कभी पुण्य नहीं किया है, ऐसे लोगोंके लिये आपका दर्शन प्रायः दुर्लभ ही है॥ ४३॥
नारदजी बोले—पुण्डरीक ! मैं नारद हूँ। तुम्हारे दर्शनकी उत्कण्ठासे ही यहाँ आया हूँ। तुम-जैसा निरन्तर भगवद्भक्तिपरायण पुरुष दुर्लभ है। द्विजोत्तम ! भगवद्भक्त पुरुष यदि जातिका चण्डाल हो तो भी वह स्मरणमात्रसे, वार्तालापसे अथवा सम्मानित होकर, अथवा स्वेच्छासे ही लोगोंको पवित्र कर देता है; फिर तुम्हारे-जैसे भक्त ब्राह्मणके सत्सङ्गकी पावनताके विषयमें तो कहना ही क्या है। द्विज ! मैं शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले देवदेव भगवान् वासुदेवका दास हूँ॥ ४४-४५१/२॥
नारदजीके इस प्रकार अपना परिचय देनेपर उनके दर्शनसे अत्यन्त विस्मित हुए विप्रवर पुण्डरीकजी प्रेम-भक्तिसे विह्वलचित्त होकर मधुर वाणीमें बोले॥ ४६१/२॥
पुण्डरीकजीने कहा—आज मैं समस्त देहधारियोंमें धन्य हूँ, देवताओंन्द्वारा भी सम्माननीय हूँ। आज मेरे पितर कृतार्थ हो गये। मेरा जन्म सफल हो गया। देवर्षे! मैं आपका भक्त हूँ; आप मुझपर अब विशेषरूपसे अनुग्रह करें। विद्वन्! मैं अपने पूर्वजन्मकृत कर्मोंसे प्रेरित हो संसारमें भटक रहा हूँ। बताइये, इससे छुटकारा पानेके लिये मैं क्या-क्या करूँ? मेरे लिये जो परम कर्तव्य हो, वह गोपनीय हो तो भी आप मुझे उसका उपदेश कीजिये। मुने! यों तो आप समस्त लोकोंको ही सहारा देनेवाले हैं, परंतु वैष्णवोंके लिये तो आप विशेषरूपसे शरणदाता हैं॥ ४७-४९१/२॥
नारदजी बोले—द्विज ! इस जगत्में अनेक शास्त्र और अनेक प्रकारके कर्म हैं। इसी तरह यहाँ अनेकों प्राणी हैं और उनके लिये धर्मके मार्ग भी बहुत हैं। द्विजोत्तम ! इसीसे इस जगत्में विचित्रता दिखायी देती है॥ ५०-५१॥
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