संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 297, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२८६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४
अव्यक्ताज्जायते सर्वं सर्वात्मकमिदं जगत्। इत्येवं प्राहुरपरे तत्रैव लयमेव च॥ ५२ आत्मानो बहवः प्रोक्ता नित्याः सर्वगतास्तथा। अन्यैर्मतिमतां श्रेष्ठ तत्त्वालोकनतत्परैः॥ ५३ एवमाद्यनुसंचिन्त्य यथामति यथाश्रुतम्। वदन्ति ऋषयः सर्वे नानामतविशारदाः॥ ५४ शृणुष्वावहितो ब्रह्मन् कथयामि तवानघ। परमार्थमिदं गुह्यं घोरसंसारमोचनम्॥ ५५ अनागतमतीतं च विप्रकृष्टमतीव यत्। न गृह्णाति नृणां दृष्टिर्वर्तमानार्थनिश्चिता ॥ ५६ शृणुष्वावहितं तात कथयामि तवानघ। यत्प्रोक्तं ब्रह्मणा पूर्वं पृच्छतो मम सुव्रत ॥ ५७ कदाचिद्ब्रह्मलोकस्य पद्मयोनिं पितामहम्। प्रणिपत्य यथान्यायं पृष्टवानहमव्ययम् ॥ ५८
कुछ लोगोंका मत है कि यह सम्पूर्ण जगत् सर्वथा अव्यक्तसे उत्पन्न होता है और समय आनेपर उसीमें लीन भी हो जाता है। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ! कुछ अन्य तत्त्वदर्शी पुरुष आत्माको अनेक, नित्य एवं सर्वत्र व्यापक मानते हैं। अनघ! ब्रह्मन्! इन सब बातोंपर विचार करके नाना मतोंका ज्ञान रखनेवाले समस्त ऋषिगण अपनी बुद्धि और विद्याके अनुसार जिस सिद्धान्तका प्रतिपादन करते हैं, उसे सावधान होकर सुनो; वह सब मैं तुमसे बतलाता हूँ। यह बताया जानेवाला गोप्य परमार्थतत्त्व इस घोरतर संसारसे मुक्ति दिलानेवाला है। मनुष्योंकी दृष्टि प्रायः वर्तमान विषयोंको ही निश्चितरूपसे ग्रहण करती है; वह सुदूरवर्ती भूत और भविष्यको नहीं ग्रहण कर सकती। उत्तम व्रतके पालक एवं पापशून्य तात पुण्डरीक! इस विषयमें श्रीब्रह्माजीने पहले मेरे प्रश्न करनेपर मुझसे जो कुछ कहा था, वह सब मैं तुम्हें बता रहा हूँ; तुम ध्यान देकर सुनो। एक समयकी बात है, ब्रह्मलोकमें विराजमान अविनाशी कमलयोनि ब्रह्माजीको प्रणाम करके मैंने उनसे यथोचित-रूपसे प्रश्न किया॥ ५२-५८॥
नारद उवाच किं तज्ज्ञानं परं देव कश्च योगः परस्तथा। एतन्मे तत्त्वतः सर्वं त्वमाचक्ष्व पितामह ॥ ५९
नारदजी बोले- देव! लोकपितामह! सबसे उत्तम ज्ञान और सबसे उत्कृष्ट योग कौन-सा है? इस विषयमें सारी बातें आप मुझे ठीक-ठीक बतायें॥ ५९॥
ब्रह्मोवाच यः परः प्रकृतेः प्रोक्तः पुरुषः पञ्चविंशकः। स एव सर्वभूतानां नर इत्यभिधीयते॥ ६० नराज्जातानि तत्त्वानि नाराणीति ततो विदुः। तान्येव चायनं तस्य तेन नारायणः स्मृतः ॥ ६१ नारायणाज्जगत्सर्वं सर्गकाले प्रजायते। तस्मिन्नेव पुनस्तच्च प्रलये सम्प्रलीयते ॥ ६२ नारायणः परं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परम्। नारायणः परं ज्योतिरात्मा नारायणः परः॥ ६३
ब्रह्माजी बोले- जो तेईस विकारोंके कारणभूत चौबीसवें तत्त्व प्रकृतिसे भिन्न पचीसवाँ तत्त्व है, वही सम्पूर्ण प्राणिशरीरोंमें 'नर' (पुरुष या आत्मा) कहलाता है। सम्पूर्ण तत्त्व नरसे उत्पन्न हैं, इसलिये 'नार' कहलाते हैं। ये नार जिनके अयन (आश्रय) हैं, अर्थात् जो इनमें व्यापक हैं, वे भगवान् 'नारायण' कहे जाते हैं। सृष्टिकालमें सम्पूर्ण जगत् भगवान् नारायणसे ही प्रकट होता है और प्रलयके समय फिर उन्हींमें लीन हो जाता है। नारायण ही परब्रह्म हैं, नारायण ही परम तत्त्व हैं, नारायण ही
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