संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 298, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६४] भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान २८७ परादपि परश्चासौ तस्मान्नातिपरं मुने। परमज्योति और नारायण ही परम आत्मा हैं। मुने! वे यच्च किंचिज्जगत्यस्मिन् दृश्यते श्रूयतेऽपि वा ॥ ६४ भगवान् नारायण परसे भी पर हैं। उनसे बढ़कर या उनसे भिन्न कुछ भी नहीं है। इस जगत्में जो कुछ देखा अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः। या सुना जाता है, सबको बाहर और भीतरसे व्याप्त करके एवं विदित्वा तं देवाः साकारं व्याहरन्मुहुः ॥ ६५ भगवान् नारायण स्थित हैं। इस प्रकार उन्हें साकार वस्तुओंमें व्यापक जानकर ही देवताओंने बार-बार उनको 'साकार' नमो नारायणायेति ध्यात्वा चानन्यमानसाः। कहा है तथा 'ॐ नमो नारायणाय'-इस मन्त्रका ध्यान (मानसिक जप) करते हुए अनन्यभावसे उनमें मन किं तस्य दानैः किं तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः ॥ ६६ लगाया है। जो अनन्यचित्त हो सदा भगवान् नारायणका ध्यान करता है, उसको दान, तीर्थसेवन, तपस्या और यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः। यज्ञोंसे क्या काम है? भगवान् नारायणका ध्यान ही एतज्ज्ञानं वरं नातो योगश्चैव परतस्तथा ॥ ६७ सर्वोत्तम ज्ञान है तथा इससे बढ़कर दूसरा कोई योग भी नहीं है। परस्परविरुद्ध अर्थको व्यक्त करनेवाले दूसरे- परस्परविरुद्धार्थैः किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः। दूसरे शास्त्रोंके विस्तारसे क्या लाभ ? जिस प्रकार एक बहवोऽपि यथा मार्गा विशन्त्येकं महत्पुरम् ॥ ६८ ही बड़े नगरमें बहुत-से मार्गोंका प्रवेश होता है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न शास्त्रोंके सम्पूर्ण ज्ञान उन परमेश्वर तथा ज्ञानानि सर्वाणि प्रविशन्ति तमीश्वरम्। नारायणमें प्रवेश करते हैं ॥ ६०-६८१/२ ॥ स हि सर्वगतो देवः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः ॥ ६९ वे भगवान् विष्णु अव्यक्तरूपसे सर्वत्र व्याप्त हैं, सूक्ष्म तत्त्व हैं, सदा रहनेवाले सनातन पुरुष हैं, सम्पूर्ण जगत्के आदिकारण हैं; परंतु उनका न तो आदि है न अन्त ही। जगदादिरनाद्यन्तः स्वयम्भूद्भूतभावनः। स्वयं वे किसी दूसरेसे उत्पन्न नहीं हैं, अतएव 'स्वयम्भू' विष्णुर्विभुरचिन्त्यात्मा नित्यः सदसदात्मकः ॥ ७० हैं, किंतु इन सम्पूर्ण भूतप्राणियोंको स्वयं ही प्रकट करते हैं। वे विभु, अचिन्त्य, नित्य और कार्य-कारणस्वरूप हैं। वासुदेवो जगद्वासः पुराणः कविरव्ययः। सम्पूर्ण जगत्का उनमें ही निवास है, इसलिये वे 'वासुदेव' यस्मात्प्राप्तं स्थितिं कृत्स्नं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ७१ कहे गये हैं। वे पुराणपुरुष, त्रिकालदर्शी और अविकारी हैं। यह सम्पूर्ण चराचरमय त्रिभुवन उन्हीं भगवान्के द्वारा तस्मात् स भगवान्देवो विष्णुरित्यभिधीयते। व्याप्त होनेसे स्थित है, इसलिये वे 'विष्णु' कहलाते हैं। यस्माद्वा सर्वभूतानां तत्त्वादीनां युगक्षये ॥ ७२ अथवा युगका क्षय होनेपर महत्तत्त्व आदि समस्त भूतोंका उन्हीं सृष्टिके आश्रयभूत परमात्मामें निवास होता है, इसलिये तस्मिन्निवासः संसर्गे वासुदेवस्ततस्तु सः। वे 'वासुदेव' कहे गये हैं। कुछ लोग उनको पुरुष (आत्मा) तमाहुः पुरुषं केचित्केचिदीश्वरमव्ययम् ॥ ७३ कहते हैं और कुछ लोग अविनाशी ईश्वर बताते हैं। कुछ अन्य लोग उन्हें केवल 'विज्ञानस्वरूप' मानते हैं, कितने विज्ञानमात्रं केचिच्च केचिद्ब्रह्म परं तथा। ही उन्हें परब्रह्म कहते हैं। कुछ विचारक उन्हें आदि- केचित्कालमनाद्यन्तं केचिज्जीवं सनातनम् ॥ ७४ अन्तरहित 'काल' कहते हैं और कुछ मनुष्य उनको 'सनातन जीव' मानते हैं। कुछ लोग 'परमात्मा' कहते केचिच्च परमात्मानं केचिच्चैवमनामयम्। हैं, कुछ उन्हें एक 'निरामय तत्त्व' मानते हैं, कुछ विद्वान् उन्हें 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं और कुछ उन्हें तेईस केचित्क्षेत्रज्ञमित्याहुः केचित्षड्विंशकं तथा ॥ ७५ विकारोंके कारण चौबीसवें तत्त्व प्रकृति और पचीसवें तत्त्वरूप पुरुषसे भिन्न 'छब्बीसवाँ तत्त्व' (पुरुषोत्तम) अङ्गुष्ठमात्रं केचिच्च केचित्पद्मरजोपमम्। मानते हैं। कुछ लोग आत्माको अँगूठेके बराबर बताते एते चान्ये च मुनिभिः संज्ञाभेदाः पृथग्विधाः ॥ ७६ हैं और कुछ विद्वान् कमल-पुष्पकी धूलिके एक In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth