भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 318 में से

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पृष्ठ 300

अध्याय ६४ ] भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान २८९ तदन्यः को महोदारः प्रार्थितं दातुमीश्वरः । हेलया कीर्तितो यो वै स्वं पदं दिशति द्विज ॥ ९० अपि कार्यस्त्वया चैव जपः स्वाध्याय एव च। तमेवोद्दिश्य देवेशं कुरु नित्यमतन्द्रितः ॥ ९१ किं तत्र बहुभिर्मन्त्रैः किं तत्र बहुभिर्व्रतैः। नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः ॥ ९२ चीरवासा जटाधारी त्रिदण्डी मुण्ड एव वा। भूषितो वा द्विजश्रेष्ठ न लिङ्गं धर्मकारणम् ॥ ९३ ये नृशंसा दुरात्मानः पापाचाररताः सदा। तेऽपि यान्ति परं स्थानं नरा नारायणाश्रयाः ॥ ९४ जन्मान्तरसहस्रेषु यस्य स्याद्बुद्धिरीदृशी। दासोऽहं वासुदेवस्य देवदेवस्य शार्ङ्गिणः ॥ ९५ प्रयाति विष्णुसालोक्यं पुरुषो नात्र संशयः। किं पुनस्तद्गतप्राणः पुरुषः संयतेन्द्रियः ॥ ९६ द्विज! जो अवहेलनापूर्वक नाम लेनेपर भी भक्तको अपना परमधाम दे देते हैं, उन भगवान् नारायणके सिवा दूसरा कौन ऐसा महान् उदार है, जो माँगी हुई वस्तुको देनेमें समर्थ हो ? तुम्हें जप अथवा स्वाध्याय-जो कुछ भी करना हो, उसे उन देवेश्वर भगवान् नारायणके उद्देश्यसे ही सदा आलस्य त्यागकर करते रहो। बहुत-से मन्त्र और व्रतोंसे क्या काम ? 'ॐ नमो नारायणाय'—यह मन्त्र ही सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। द्विजश्रेष्ठ ! कोई चीर वस्त्र पहननेवाला, जटा धारण करनेवाला, त्रिदण्डी, सदा माथा मुँड़ाये रहनेवाला अथवा तरह-तरहके उपकरणोंसे विभूषित ही क्यों न हो, उसके ये बाह्य चिह्न धर्मके कारण नहीं हो सकते; किंतु जो मनुष्य भगवान् नारायणकी शरणमें जा चुके हैं, वे पहले निर्दयी, दुष्ट और सदा पापरत रहे हों तो भी भगवान्‌के परमधामको पधारते हैं। हजारों जन्मोंमें भी जिसकी ऐसी बुद्धि हो जाय कि 'मैं देवदेव, शार्ङ्गधनुषधारी भगवान् वासुदेवका दास हूँ', वह मनुष्य निःसंदेह भगवान् विष्णुके सालोक्यको प्राप्त होता है; फिर जो पुरुष जितेन्द्रिय होकर सदा भगवान्‌में ही अपने प्राणोंको लगाये रहता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है ॥ ९०-९६ ॥ सूत उवाच इत्युक्त्वा देवदेवर्षिस्तत्रैवान्तरधीयत । परोपकारनिरतस्त्रैलोक्यस्यैकभूषणः ॥ ९७ पुण्डरीकोऽपि धर्मात्मा नारायणपरायणः । नमोऽस्तु केशवायेति पुनः पुनरुदीरयन् ॥ ९८ प्रसीदस्व महायोगिन्नित्यमुच्चार्य सर्वदा। हृत्पुण्डरीके गोविन्दं प्रतिष्ठाप्य जनार्दनम् ॥ ९९ तपःसिद्धिकरेऽरण्ये शालग्रामे तपोधनः । उवास चिरमेकाकी पुरुषार्थविचक्षणः ॥ १०० स्वप्नेऽपि केशवादन्यन्न पश्यति महातपाः । निद्रापि तस्य नैवासीत्पुरुषार्थविरोधिनी ॥ १०१ तपसा ब्रह्मचर्येण शौचेन च विशेषतः । जन्मजन्मान्तरारूढसंस्कारेण च स द्विजः ॥ १०२ प्रसादाद्देवदेवस्य सर्वलोकैकसाक्षिणः । अवाप परमां सिद्धिं वैष्णवीं वीतकल्मषः ॥ १०३ सूतजी कहते हैं—सदा दूसरोंके ही उपकारमें लगे रहनेवाले त्रिभुवनभूषण देवर्षि नारदजी उपर्युक्त बातें बताकर वहींपर अन्तर्धान हो गये। अब धर्मात्मा पुण्डरीक भी एकमात्र भगवान् नारायणके भजनमें तत्पर हो बार-बार इस प्रकार उच्चारण करने लगे—'भगवान् केशवको नमस्कार है; हे महायोगिन् ! आप मुझपर प्रसन्न हों।' निरन्तर यों कहते हुए पुरुषार्थ-साधनमें कुशल वे तपस्वी पुण्डरीकजी अपने हृदय-कमलके आसनपर जनार्दन भगवान् गोविन्दको स्थापितकर तपस्याकी सिद्धि करनेवाले उस 'शालग्राम' नामक तपोवनमें बहुत कालतक अकेले ही रहे। महातपस्वी पुण्डरीक स्वप्नमें भी भगवान् केशवके सिवा दूसरा कुछ नहीं देखते थे। उनकी नींद भी उन्हें पुरुषार्थ-साधनमें बाधा नहीं देती थी। उन पापरहित द्विजवर पुण्डरीकने तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा विशेषतः शौचाचारके पालनसे और जन्म-जन्मान्तरोंकी साधनासे सुदृढ़ हुए भगवद्भक्तिसाधक संस्कारसे सम्पूर्ण लोकोंके एकमात्र साक्षी देवदेव भगवान् विष्णुकी कृपाद्वारा परम उत्तम वैष्णवी सिद्धि प्राप्त कर ली। उनके निकट