भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 318 में से

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पृष्ठ 301

२९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४ सिंहव्याघ्रास्तथान्येऽपिमृगाः प्राणिविहिंसकाः। सिंह, व्याघ्र तथा दूसरे-दूसरे हिंसक जीव आपसके विरोधं सहजं हित्वा समेतास्तस्य संनिधौ। स्वाभाविक वैर-विरोधको त्याग एक साथ मिलकर निवसन्ति द्विजश्रेष्ठ प्रशान्तेन्द्रियवृत्तयः ॥ १०४ रहते थे। द्विजवर भरद्वाजजी! उनके समीप उन हिंसक जन्तुओंकी इन्द्रियवृत्तियाँ अत्यन्त शान्त रहती थीं॥ ९७-१०४॥ ततः कदाचिद्भगवान् पुण्डरीकस्य धीमतः। तत्पश्चात् एक दिन बुद्धिमान् पुण्डरीकजीके समक्ष प्रादुरासीज्जगन्नाथः पुण्डरीकायतेक्षणः ॥ १०५ जगदीश्वर भगवान् नारायण प्रकट हुए। उनके नेत्र कमल- दलके समान विशाल थे। उनके हाथोंमें शङ्ख, चक्र और शङ्खचक्रगदापाणिः पीतवासाः स्रगुज्ज्वलः। गदा सुशोभित थी। उन्होंने पीताम्बर धारण कर रखा था। श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः कौस्तुभेन विभूषितः ॥ १०६ दिव्य पुष्पोंकी माला उनकी शोभा बढ़ा रही थी। उनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्स-चिह्न और लक्ष्मीका निवास था। वे कौस्तुभमणिसे विभूषित थे। कज्जलगिरिके समान आरुह्य गरुडं श्रीमानञ्जनाचलसंनिभः। श्यामवर्ण एवं पीताम्बरधारी भगवान् विष्णु सुनहली मेरुशृङ्गमिवारूढः कालमेघस्तडिद्युतिः ॥ १०७ कान्तिवाले गरुडपर आरूढ़ हो इस प्रकार सुशोभित होते थे, मानो मेरुगिरिके शिखरपर बिजलीकी कान्तिसे युक्त श्याममेघ शोभा पा रहा हो। भगवान्‌के ऊपर रजतमय राजतेनातपत्रेण मुक्तादामविलम्बिना। श्वेत छत्र तना था, जिसमें मोतियोंकी झालरें लगी थीं। विराजमानो देवेशश्चामरव्यजनादिभिः ॥ १०८ उस समय उस छत्रसे तथा चँवर-व्यजन आदिसे उन देवेश्वरकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १०५-१०८॥ तं दृष्ट्वा देवदेवेशं पुण्डरीकः कृताञ्जलिः। उन देवदेवेश्वर भगवान् नारायणका प्रत्यक्ष दर्शन पपात शिरसा भूमौ साध्वसावनतो द्विजः ॥ १०९ पाकर पुण्डरीकने दोनों हाथ जोड़ लिये। आदरमिश्रित भयसे उनका मस्तक झुक गया। उन्होंने धरतीपर माथा टेक दिया-साष्टाङ्ग प्रणाम किया। वे विह्वल होकर उन पिबन्निव हृषीकेशं नयनाभ्यां समाकुलः। भगवान् हृषीकेशकी ओर आँखें फाड़-फाड़कर इस प्रकार जगाम महतीं तृप्तिं पुण्डरीकस्तदानघः ॥ ११० देखने लगे, मानो उन्हें पी जायँगे। जिनके दर्शनके लिये वे चिरकालसे प्रार्थना कर रहे थे, उन भगवान्‌को आज तमेवालोकयन् वीरश्चिरप्रार्थितदर्शनः। सामने पाकर उन्हींकी ओर निर्निमेष नयनोंसे देखते हुए ततस्तमाह भगवान् पद्मनाभस्त्रिविक्रमः ॥ १११ पापरहित धीरचित्त पुण्डरीकजीको आज बड़ी ही तृप्ति हुई। तब तीन पगोंसे त्रिलोकीको नाप लेनेवाले भगवान् पद्मनाभने पुण्डरीकसे कहा- ॥ १०९-१११॥ प्रीतोऽस्मि वत्स भद्रं ते पुण्डरीक महामते। 'वत्स पुण्डरीक ! तुम्हारा कल्याण हो। महामते ! मैं वरं वृणीष्व दास्यामि यत्ते मनसि वर्तते ॥ ११२ तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, उसीको वरके रूपमें माँग लो; उसे मैं अवश्य दूँगा'॥ ११२॥ सूत उवाच सूतजी कहते हैं- देवदेव नारायणके कहे हुए इस एतच्छ्रुत्वा तु वचनं देवदेवेन भाषितम्। वचनको सुनकर महामति पुण्डरीकने उनसे यों निवेदन इदं विज्ञापयामास पुण्डरीको महामतिः ॥ ११३ किया ॥ ११३ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth