संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ
पृष्ठ 302, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 302
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ देवनागरी में प्रस्तुत है:
अध्याय ६४] भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान २९१
[संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अनुवाद]
| संस्कृत मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुण्डरीक उवाच<br>क्वाहमत्यन्तदुर्बुद्धिः क्व चात्महितवीक्षणम्।<br>यद्धितं मम देवेश तदाज्ञापय माधव ॥ ११४ | पुण्डरीक बोले—देवेश्वर ! कहाँ मुझ-जैसा अत्यन्त दुर्बुद्धि पुरुष और कहाँ अपने वास्तविक हितको देखनेका कार्य ? अतः माधव ! मेरे लिये जो हितकर हो, उसके लिये आप ही कृपापूर्वक आज्ञा करें ॥ ११४ ॥ |
| एवमुक्तोऽथ भगवान् सुप्रीतः पुनरब्रवीत्।<br>पुण्डरीकं महाभागं कृताञ्जलिमुपस्थितम् ॥ ११५ | उनके यों कहनेपर भगवान् बहुत ही प्रसन्न हुए और अपने सामने हाथ जोड़े खड़े हुए महाभाग पुण्डरीकसे बोले ॥ ११५ ॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>आगच्छ कुशलं तेऽस्तु मयैव सह सुव्रत।<br>मद्रूपधारी नित्यात्मा ममैव पार्षदो भव ॥ ११६ | श्रीभगवान्ने कहा—सुव्रत ! तुम्हारा कल्याण हो; तुम मेरे साथ ही आ जाओ और मेरे ही समान रूप धारणकर मेरे नित्य-पार्षद हो जाओ ॥ ११६ ॥ |
| सूत उवाच<br>एवमुक्तवति प्रीत्या श्रीधरे भक्तवत्सले।<br>देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिः पपात च ॥ ११७<br><br>देवाः सेन्द्रास्तथा सिद्धाः साधु साध्वित्यथाब्रुवन्।<br>जगुश्च सिद्धगन्धर्वाः किंनराश्च विशेषतः ॥ ११८<br><br>अथैनं समुपादाय वासुदेवो जगत्पतिः।<br>जगाम गरुडारूढः सर्वदेवनमस्कृतः ॥ ११९<br><br>तस्मात्त्वमपि विप्रेन्द्र विष्णुभक्तिसमन्वितः।<br>तच्चित्तस्तद्गतप्राणस्तद्भक्तानां हिते रतः ॥ १२०<br><br>अर्चयित्वा यथायोगं भजस्व पुरुषोत्तमम्।<br>शृणुष्व तत्कथाः पुण्याः सर्वपापप्रणाशिनीः ॥ १२१<br><br>येनोपायेन विप्रेन्द्र विष्णुः सर्वेश्वरेश्वरः।<br>प्रीतो भवति विश्वात्मा तत्कुरुष्व सुविस्तरम् ॥ १२२<br><br>अश्वमेधसहस्रेण वाजपेयशतैरपि।<br>नाप्नुवन्ति गतिं पुण्यां नारायणपराङ्मुखाः ॥ १२३ | सूतजी कहते हैं—भक्तवत्सल भगवान् श्रीधरके प्रेमपूर्वक यों कहनेपर देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और वहाँ आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। उस समय इन्द्र आदि सभी देवता और सिद्धगण 'यह बहुत अच्छा हुआ, बहुत अच्छा हुआ'—इस प्रकार कहकर साधुवाद देने लगे। सिद्ध, गन्धर्व और किंनरगण विशेषरूपसे यशोगान करने लगे। इधर सर्वदेववन्दित जगदीश्वर भगवान् वासुदेव पुण्डरीकको साथ ले, गरुडपर आरूढ़ हो, वैकुण्ठधामको चले गये। इसलिये विप्रवर भरद्वाज ! आप भी विष्णुभक्तिसे युक्त हो, अपने मन और प्राणोंको भगवान्में ही लगाकर उनके भक्तोंके हित-साधनमें तत्पर रहिये और यथाशक्ति भगवान्का पूजन करते हुए उन पुरुषोत्तमका भजन कीजिये। समस्त पापोंको नष्ट करनेवाली भगवान्की कथाएँ सदा सुनते रहिये। विप्रवर ! अधिक क्या कहें, सर्वेश्वरेश्वर विश्वात्मा भगवान् विष्णु जिस उपायसे प्रसन्न हों, उसीको आप विस्तारपूर्वक करें। भगवान् नारायणसे विमुख हुए पुरुष हजारों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय करनेसे भी पावन गतिको नहीं प्राप्त कर सकते ॥ ११७–१२३ ॥ |
| अजरममरमेकं ध्येयमाद्यन्तशून्यं<br>सगुणविगुणमाद्यं स्थूलमत्यन्तसूक्ष्मम्।<br>निरुपममुपमेयं योगिनां ज्ञानगम्यं<br>त्रिभुवनगुरुमीशं त्वां प्रपन्नोऽस्मि विष्णो ॥ १२४ | ( भगवान्से इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये ) 'भगवन् विष्णो ! आप अजर, अमर, अद्वितीय, सबके ध्यान करनेयोग्य, आदि-अन्तसे रहित, सगुण-निर्गुण, स्थूल-सूक्ष्म और अनुपम होकर भी उपमेय हैं। योगियोंको ज्ञानके द्वारा आपके स्वरूपका अनुभव होता है तथा आप इस त्रिभुवनके गुरु और परमेश्वर हैं; अतः मैं आपकी शरणमें आया हूँ' ॥ १२४ ॥ |
[अध्याय-समाप्ति (पुष्पिका)]
इति श्रीनरसिंहपुराणे पुण्डरीकनारदसंवादे चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'पुण्डरीक-नारद-संवाद' विषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥