भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 318 में से

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पृष्ठ 309

२९८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६७

सकृत्तीर्थाद्रितोयेषु गङ्गायां तु पुनः पुनः। | है। अन्य सभी तीर्थोंके पर्वतोंसे बहनेवाले जलमें सर्वतीर्थमयी गङ्गा सर्वदेवमयो हरिः ॥ ४० | यथासम्भव एक बार स्नान कर लेना चाहिये, परंतु | गङ्गामें बार-बार स्नान करे; क्योंकि गङ्गामें सम्पूर्ण तीर्थ सर्वशास्त्रमयी गीता सर्वधर्मो दयापरः। | हैं, भगवान् विष्णुमें सभी देवता वर्तमान हैं, गीता एवं ते कथितं विप्र क्षेत्रमाहात्म्यमुत्तमम् ॥ ४१ | सर्वशास्त्रमयी है और सभी धर्मोंमें जीवदया श्रेष्ठ | है ॥ ३७—४०१/२ ॥ श्रीसह्यामलकग्रामे तीर्थे स्नात्वा फलानि च। | विप्र ! इस प्रकार मैंने आपसे इस क्षेत्रके उत्तम तीर्थानामपि यत्तीर्थं तत्तीर्थं द्विजसत्तम। | माहात्म्यका वर्णन किया। साथ ही सह्य और आमलक देवदेवस्य पादस्य तलाद्भूवि विनिस्सृतम् ॥ ४२ | ग्रामके तीर्थोंमें स्नान करनेके फल भी बताये। द्विजश्रेष्ठ ! | वही उत्तम तीर्थ है, जो तीर्थोंका भी तीर्थ हो। यह | आमलकग्राम तीर्थ देवदेव भगवान् विष्णुके चरण- अम्भोगुगं तुरगमेधसहस्रतुल्यं | तलसे प्रकट हुआ है, अतः यह सर्वोत्तम तीर्थ है। तच्चक्रतीर्थमिति वेदविदो वदन्ति। | यहाँपर जो जल है, उसमें स्नान करना हजार अश्वमेध स्नानाच्च तत्र मनुजा न पुनर्भवन्ति | यज्ञ करनेके बराबर है। उसीको वेदवेत्ता पुरुष 'चक्रतीर्थ' पादौ प्रणम्य शिरसा मधुसूदनस्य ॥ ४३ | कहते हैं। वहाँ स्नान करके भगवान् मधुसूदनके | चरणोंमें मस्तक झुकानेसे मनुष्यका इस संसारमें | पुनर्जन्म नहीं होता। गङ्गा, प्रयाग, नैमिषारण्य, पुष्कर, गङ्गाप्रयागगमनैमिषपुष्कराणि | कुरुजाङ्गलप्रदेश और यमुना-तटवर्ती तीर्थ—ये सभी पुण्यायुतानि कुरुजाङ्गलयामुनानि। | पुण्यतीर्थ हैं। इन तीर्थोंके जलमें स्नान करनेपर वे कालेन तीर्थसलिलानि पुनन्ति पापान् | कुछ समयके बाद पवित्र करते हैं; किंतु भगवान् पादोदकं भगवतस्तु पुनाति सद्यः ॥ ४४ | विष्णुका चरणोदकरूप यह 'चक्रतीर्थ' तत्काल पवित्र | कर देता है ॥ ४१—४४ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे तीर्थप्रशंसायां षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'तीर्थप्रशंसा' विषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥

सड़सठवाँ अध्याय मानसतीर्थ, व्रत तथा नरसिंहपुराणका माहात्म्य सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार अबतक तीर्थानि कथितान्येवं भौमानि द्विजसत्तम। | मैंने भूतलके प्रसिद्ध तीर्थोंका वर्णन किया; किंतु इन मानसानि हि तीर्थानि फलदानि विशेषतः ॥ १ | तीर्थोंकी अपेक्षा मानसतीर्थ विशेष फल देनेवाले हैं।

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