संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 308, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६६ ] अन्यान्य तीर्थों तथा सह्याद्रि और आमलक ग्रामके तीर्थोंका माहात्म्य २९७
ऋणमोचनतीर्थं हि तीर्थानां गुह्यमुत्तमम्। | दक्षिण 'ऋणमोचन' नामक तीर्थ है, जो सब तीर्थोंमें त्रिरात्रमुषितो यस्तु तत्र स्नानं समाचरेत्॥ २८ | उत्तम और गुह्य है। ब्रह्मन्! वहाँ तीन राततक निवास | करके जो स्नान करता है, वह निस्संदेह तीनों ऋणोंसे ऋणैस्त्रिभिरसौ ब्रह्मन् मुच्यते नात्र संशयः। | मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य पिण्डस्थानमें श्राद्ध करके श्राद्धं कृत्वा पितृभ्यश्च पिण्डस्थानेषु यो नरः॥ २९ | वहाँ पितरोंके उद्देश्यसे विधिपूर्वक पिण्डदान करेगा, | उसके पितर पूर्ण तृप्त होकर अवश्य ही पितृलोकको पितॄनुद्दिश्य विधिवत्पिण्डान्निर्व्वापयिष्यति। | प्राप्त होंगे॥ २८-३०॥ सुतृप्ताः पितरो यान्ति पितृलोकं न संशयः॥ ३० | | इसके बाद 'पाप-मोचन' तीर्थ है। उस तीर्थमें पाँच पञ्चरात्रोषितस्नायी तीर्थे वै पापमोचने। | राततक निवास करते हुए जो नित्य स्नान करता है, वह सर्वपापक्षयं प्राप्य विष्णुलोके स मोदते॥ ३१ | अपने सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करके विष्णुलोकमें आनन्दका | भागी होता है। वहीं एक बहुत बड़ी धारा बहती है। तत्रैव महतीं धारां शिरसा यस्तु धारयेत्। | उसके जलको जो अपने सिरपर धारण करता है, वह सर्वक्रतुफलं प्राप्य नाकपृष्ठे महीयते॥ ३२ | समस्त यज्ञोंके फलको प्राप्त करके स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित | होता है॥ ३१-३२॥ धनुःपाते महातीर्थे भक्त्या यः स्नानमाचरेत्। | इसके बाद 'धनुःपात' नामक एक महान् तीर्थ है। आयुर्भोगफलं प्राप्य स्वर्गलोके महीयते॥ ३३ | उसमें जो भक्तिपूर्वक स्नान करता है, वह पूर्ण आयुका | भोग करके अन्तमें स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। 'शरबिन्दु' शरबिन्दौ नरः स्नात्वा शतक्रतुपुरं व्रजेत्। | तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य मृत्युके बाद इन्द्रपुरीमें जाता वाराहतीर्थे विप्रेन्द्र सह्ये यः स्नानमाचरेत्॥ ३४ | है तथा जो सह्यपर्वतपर 'वाराहतीर्थ' में स्नान करता | और वहाँ एक दिन-रात निवास करता है, वह विष्णुलोकमें अहोरात्रोषितो भूत्वा विष्णुलोके महीयते। | पूजित होता है। इसके बाद सह्यके शिखरपर 'आकाशगङ्गा' आकाशगङ्गानाम्ना च सह्याग्रे तीर्थमुत्तमम्॥ ३५ | नामक एक उत्तम तीर्थ है। वहाँकी शिलाओंके नीचेसे | सफेद मिट्टी निकलती है। विप्रवर! उसमें जो भक्तिपूर्वक शिलातलात्ततो ब्रह्मन्निर्गता श्वेतमृत्तिका। | स्नान करता है, वह सम्पूर्ण यज्ञोंका फल प्राप्तकर तस्यां भक्त्या तु यः स्नाति नरो द्विजवरोत्तम॥ ३६ | विष्णुलोकमें पूजित होता है॥ ३३-३६१/२॥ | सर्वक्रतुफलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते। | ब्रह्मन्! उस निर्मल सह्यगिरिसे जहाँ-जहाँ जलके ब्रह्मन्नमलसह्याद्रेर्यद्यत्तोयविनिर्गमः ॥ ३७ | झरने गिरते हैं, वहाँ-वहाँ सब जगह तीर्थ समझना | चाहिये। उसमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त तत्र तीर्थं विजानीहि स्नात्वा पापात्प्रमुच्यते। | हो जाता है। जो नित्य ही सह्यपर्वतकी यात्रा करके सह्याद्रिं गत्वान्नित्यं स्नात्वा पापात्प्रमुच्यते॥ ३८ | वहाँ स्नान करता है, वह निष्पाप हो जाता है। द्विजेन्द्र! | जो मनुष्य सह्यपर्वतके इन पावन तीर्थोंमें स्नान करके एतेषु तीर्थेषु नरो द्विजेन्द्र | भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुको पुष्प चढ़ाता है, वह पुण्येषु सह्याद्रिसमुद्भवेषु। | पापोंसे रहित हो भगवान् विष्णुमें ही लीन हो जाता दत्त्वा सुपुष्पाणि हरिं स भक्त्या | विहाय पापं प्रविशेत्स विष्णुम्॥ ३९ |