भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 318 में से

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पृष्ठ 307

२९६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६६ परेषां ब्राह्मणानां तु परेण ब्रह्मणा पुरा। स दृष्टस्तु महावृक्षो महाफलसमन्वितः ॥ १५ किमेतदिति विप्रेन्द्र ध्यानदृष्टिपरोऽभवत् । ध्यानेन दृष्टवांस्तत्र पुनरामलकं तरुम् ॥ १६ तस्योपरि तु देवेशं शङ्खचक्रगदाधरम् । उत्थाय च पुनः पश्येत्प्रतिमामेव केवलाम् ॥ १७ तत्पादं भूतले देवः प्रविवेश महातरुः । ततस्त्वाराधयामास देवदेवेशमव्ययम् ॥ १८ गन्धपुष्पादिभिर्नित्यं ब्रह्मा लोकपितामहः। द्वादशभिः सप्तभिस्तु संख्याभिः पूजितो हरिः ॥ १९ तस्मिन् क्षेत्रे मुनिश्रेष्ठ माहात्म्यं तस्य को वदेत् । श्रीसह्यामलग्रामे देवदेवेशमव्ययम् ॥ २० आराध्य तीर्थे सम्प्राप्ता द्वादश प्रति चतुर्मुखम् । तस्य पादतले तीर्थं निस्सृतं पश्चिमामुखम् ॥ २१ तच्चक्रतीर्थमभवत्पुण्यं पापप्रणाशनम् । चक्रतीर्थे नरः स्नात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २२ बहुवर्षसहस्त्राणि ब्रह्मलोके महीयते । शङ्खतीर्थे नरः स्नात्वा वाजपेयफलं लभेत् ॥ २३ पौषे मासे तु पुष्यार्के तद्यात्रादिवसं मुने। ब्रह्मणः कुण्डिका पूर्वं गङ्गातोयप्रपूरिता ॥ २४ तस्याद्रौ पतिता ब्रह्मंस्तत्र तीर्थेऽशुभं हरेत् । नाम्ना तत्कुण्डिकातीर्थं शिलागृहसमन्वितम् ॥ २५ तत्तीर्थे मनुजः स्नात्वा तदानीं सिद्धिमाप्नुयात् । त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा यस्तत्र स्नाति मानवः ॥ २६ सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते। कुण्डिकातीर्थादुत्तरे पिण्डस्थानाच्च दक्षिणे ॥ २७ समस्त उत्तम ब्राह्मणोंमें उत्कृष्ट श्रीब्रह्माजीने पूर्वकालमें महान् फलोंसे युक्त उस महावृक्षको देखा था। विप्रेन्द्र! उसे देखकर, यह क्या है—यह जाननेके लिये ब्रह्माजी ध्यानमग्न हो गये। उन्होंने ध्यानमें उस स्थानपर महान् आँवलेके वृक्षको देखा और उसके ऊपर शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले देवेश्वर भगवान् विष्णुको विराजमान देखा। फिर उन्होंने जब ध्यानसे निवृत्त हो खड़े होकर दृष्टिपात किया, तब वहाँ वृक्षके स्थानमें केवल भगवान् विष्णुकी एक प्रतिमा दिखायी दी। उसका आधारभूत वह दिव्य महावृक्ष भूतलमें धँस गया! तब लोकपितामह भगवान् ब्रह्माजी गन्ध-पुष्प आदिसे नित्य ही उन अविनाशी देवदेवेश्वरकी आराधना करने लगे। उस समय उनके द्वारा बारह और सात बार भगवान्की पूजा सम्पन्न हुई ॥ १३-१९ ॥ मुनिश्रेष्ठ! उस आमलकक्षेत्रमें विराजमान भगवान्के माहात्म्यका कौन वर्णन कर सकता है। श्रीसह्यपर्वतस्थ आमलक ग्राममें इस प्रकार अविनाशी देवेश्वर भगवान्की आराधना करनेके पश्चात् ब्रह्माजीको वहाँ बारह तीर्थ और प्राप्त हुए। भगवान्के चरणके नीचे पश्चिमाभिमुख एक तीर्थ प्रकट हुआ। वह 'चक्रतीर्थ' के नामसे विख्यात हुआ। वह पावन तीर्थ पापोंको नष्ट करनेवाला है। मनुष्य चक्रतीर्थमें स्नान करके सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और हजारों वर्षोंतक ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। इसके बाद 'शङ्खतीर्थ' है। उसमें स्नान करनेसे मनुष्यको वाजपेय यज्ञका फल मिलता है। मुने! पौष मासमें जब सूर्य पुष्य नक्षत्रपर स्थित हों, उसी समय वहाँकी यात्राका पर्व है। पूर्वकालमें एक समय सह्यपर्वतपर गङ्गाजलसे भरा हुआ ब्रह्माजीका कमण्डलु गिर पड़ा था, तबसे वह स्थान 'कुण्डिका' तीर्थके नामसे विख्यात हुआ। वह तीर्थ सारे अशुभोंको हर लेता है। वहाँ एक शिलामय गृह भी है। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य तत्काल सिद्धि प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य उस तीर्थमें तीन राततक उपवास करके स्नान करता है, वह सब पापोंसे सर्वथा मुक्त हो ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। कुण्डिका-तीर्थसे उत्तर और 'पिण्डस्थान' नामक तीर्थसे In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth