भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 306

अध्याय ६६ ] अन्यान्य तीर्थों तथा सह्याद्रि और आमलक ग्रामके तीर्थोंका माहात्म्य २९५ तापी पयोष्णी पुण्ये द्वे तत्सङ्गात्तीर्थमुत्तमम्। | तापी, पयोष्णी—ये दो पावन नदियाँ हैं। इनके संगमसे तथा ब्रह्मगिरेश्चापि मेखलाभिः समन्विताः ॥ ४ | एक बहुत उत्तम तीर्थ हो गया है तथा ब्रह्मगिरिकी | मेखलाओंसे मिले हुए भी बहुत-से उत्तम तीर्थ हैं। विरजं च तथा तीर्थं सर्वपापक्षयंकरम्। | विरज-तीर्थ भी समस्त पापोंको क्षीण करनेवाला है तथा गोदावरी महापुण्या सर्वत्र चतुरानन ॥ ५ | चतुरानन! गोदावरी नदी सर्वत्र परमपावन है। कमलोद्भव! तुङ्गभद्रा महापुण्या यत्राहं कमलोद्भव। | तुङ्गभद्रा नदी भी अत्यन्त पवित्र करनेवाली है, जिसके हरेण सार्धं प्रीत्या तु वसामि मुनिपूजितः ॥ ६ | तटपर मैं मुनियोंद्वारा पूजित हो भगवान् शङ्करके साथ | स्वयं निवास करता हूँ। दक्षिण गङ्गा, कृष्णा और विशेषतः दक्षिणगङ्गा कृष्णा तु कावेरी च विशेषतः । | कावेरी—ये पुण्य नदियाँ हैं। इनके अतिरिक्त, कमलोद्भव ! सह्ये त्वामलकग्रामे स्थितोऽहं कमलोद्भव ॥ ७ | मैं सह्यपर्वतपर आमलक ग्राममें स्वयं निवास करता हूँ। | वहाँ 'देवदेव' नामसे प्रसिद्ध मेरे श्रीविग्रहका तुम स्वयं देवदेवस्य नाम्ना तु त्वया ब्रह्मन् सदार्चितः । | ही सदा पूजन करते हो। वहाँ समस्त पापोंको हर लेनेवाले तत्र तीर्थान्यनेकानि सर्वपापहराणि वै॥ | अनेक तीर्थ हैं, जिनमें स्नान और आचमन करके मनुष्य येषु स्नात्वा च पीत्वा च पापान्मुच्यति मानवः ॥ ८ | पापसे मुक्त हो जाता है ॥ २–८ ॥ सूत उवाच | इत्येवं कथयित्वा तु तीर्थानि मधुसूदनः । | सूतजी कहते हैं—भरद्वाज ! ब्रह्माजीसे इन तीर्थोंका ब्रह्मणो गतवान् ब्रह्मन् ब्रह्मापि स्वपुरं गतः ॥ ९ | वर्णन करके भगवान् मधुसूदन अपने धामको चले गये | और ब्रह्मा भी ब्रह्मलोक सिधारे ॥ ९ ॥ भरद्वाज उवाच | | भरद्वाजजी बोले—धर्मज्ञ ! उस आमलक ग्राममें तस्मिन्नामलकग्रामे पुण्यतीर्थानि यानि वै। | जो-जो पुण्यतीर्थ हैं, उनका आप विस्तारके साथ यथार्थ- तानि मे वद धर्मज्ञ विस्तरेण यथार्थतः ॥ १० | रूपमें वर्णन करें। जहाँ देवदेवेश्वर भगवान् विष्णु स्वयं क्षेत्रोत्पत्तिं च माहात्म्यं यात्रापर्व च यत्र तत् । | ब्रह्माजीके द्वारा पूजित होते हैं, उस क्षेत्रकी उत्पत्ति- तत्रासौ देवदेवेशः पूज्यते ब्रह्मणा स्वयम् ॥ ११ | कथा, माहात्म्य और यात्रापर्वका विस्तृत विवरण प्रस्तुत | कीजिये ॥ १०-११ ॥ सूत उवाच | शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पुण्यं पापप्रणाशनम्। | सूतजी कहते हैं—विप्र ! महामुने ! सह्यपर्वतपर स्थित सह्यामलाकतीर्थस्य उत्पत्त्यादि महामुने ॥ १२ | 'आमलक' तीर्थके आविर्भाव आदिकी पवित्र एवं पापनाशक | कथा मैं आपसे कह रहा हूँ, सुनें ॥ १२ ॥ पुरा सह्यावनोद्देशे तरुरामलको महान्। | ब्रह्मन् ! पूर्वकालमें सह्यपर्वतके वनमें एक बहुत आसीद्ब्रह्मन् महोग्रोऽयं नाम्नायं चोच्यते बुधैः ॥ १३ | बड़ा आँवलेका वृक्ष था। उसे बुद्धिमान् लोगोंने फलानि तस्य वृक्षस्य महान्ति सुरसानि च । | 'महोग्र' नाम दे रखा था। महामुने ! उस वृक्षके फल दर्शनीयानि दिव्यानि दुर्लभाानि महामुने ॥ १४ | बड़े रसीले, दर्शनीय, दिव्य एवं दुर्लभ होते थे। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth