भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 305

२९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६६ सर्वत्र परमात्मानं यः पश्यति स मुच्यते । और सर्वत्र ही परमात्माका जो दर्शन करता है, वह मुक्त अष्टषष्टिश्च नामानि कथितानि मया तव ॥ २४ हो जाता है ॥ १९-२३१/२ ॥ ब्रह्माजी ! ये अड़सठ नाम हमने तुम्हें बताये तथा क्षेत्राणि चैव गुह्यानि कथितानि विशेषतः । विशेषतः गुप्त तीर्थोंका भी वर्णन किया। प्रजापते ! जो एतानि मम नामानि रहस्यानि प्रजापते ॥ २५ पुरुष प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर मेरे इन गुह्यनामोंका यः पठेत् प्रातरुत्थाय शृणुयाद्वापि नित्यशः । पाठ या श्रवण करेगा, वह नित्य एक लाख गोदानका गवां शतसहस्रस्य दत्तस्य फलमाप्नुयात् ॥ २६ फल पायेगा। नित्यप्रति पवित्र होकर जो इन नामोंका दिने दिने शुचिर्भूत्वा नामान्येतानि यः पठेत् । पाठ करता है, उसको मेरी कृपासे कभी दुःस्वप्नका दुःस्वप्नं न भवेत् तस्य मत्प्रसादान्न संशयः ॥ २७ दर्शन नहीं होता, इसमें संदेह नहीं है। जो पुरुष इन अड़सठ नामोंका प्रतिदिन तीनों काल, अर्थात् प्रातः, अष्टषष्टिस्तु नामानि त्रिकालं यः पठेन्नरः । मध्याह्न और सायंकालमें पाठ करता है, वह सब पापोंसे विमुक्तः सर्वपापेभ्यो मम लोके स मोदते ॥ २८ मुक्त होकर मेरे लोकमें आनन्द भोगता है। सभी मनुष्यों और विशेषतः वैष्णवोंको चाहिये कि यथाशक्ति पूर्वोक्त द्रष्टव्यानि यथाशक्त्या क्षेत्राण्येतानि मानवैः । तीर्थोंका दर्शन करें। जो लोग ऐसा करते हैं, उन्हें मैं वैष्णवैस्तु विशेषेण तेषां मुक्तिं ददाम्यहम् ॥ २९ मुक्ति देता हूँ ॥ २४-२९ ॥ सूत उवाच सूतजी कहते हैं- जो पुरुष सदा और विशेषतः हरिं समभ्यर्च्य तदग्रसंस्थितो हरिवासर (एकादशी या द्वादशीको) भगवान् विष्णुकी हरिं स्मरन् विष्णुदिने विशेषतः । पूजा करके उनके सामने खड़ा हो भगवत्स्मरणपूर्वक इस इमं स्तवं यः पठते स मानवः स्तोत्रका पाठ करता है, वह विष्णुके अमृतपदको प्राप्त प्राप्नोति विष्णोरमृतात्मकं पदम् ॥ ३० कर लेता है ॥ ३० ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे आद्ये धर्मार्थमोक्षदायिनि विष्णुवल्लभे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'आदि धर्मार्थमोक्षदायक विष्णुवल्लभस्तोत्र' विषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥ छाछठवाँ अध्याय अन्यान्य तीर्थों तथा सह्याद्रि और आमलक ग्रामके तीर्थोंका माहात्म्य सूत उवाच सूतजी कहते हैं - भगवान् विष्णु पुनः बोले- उक्तः पुण्यः स्तवो ब्रह्मन् हरेरेभिश्च नामभिः । ब्रह्मन् ! उपर्युक्त अड़सठ नामोंसे भगवान् विष्णुकी पावन पुनरन्यानि नामानि यानि तानि निबोध मे ॥ १ स्तुतिका वर्णन किया गया। अब जो दूसरे-दूसरे पावन तीर्थ और नाम हैं, उनका वर्णन मुझसे सुनिये ॥ १ ॥ गङ्गा तु प्रथमं पुण्या यमुना गोमती पुनः । सर्वप्रथम गङ्गा पवित्र है; फिर यमुना, गोमती, सरयू, सरयूः सरस्वती च चन्द्रभागा चर्मण्वती ॥ २ सरस्वती, चन्द्रभागा और चर्मण्वती- ये नदियाँ पावन हैं। कुरुक्षेत्रं गया चैव पुष्कराणि तथार्बुदम् । इसी प्रकार कुरुक्षेत्र, गया, तीनों पुष्कर और अर्बुद-क्षेत्र तथा नर्मदा च महापुण्या तीर्थान्येतानि चोत्तरे ॥ ३ परम पावन नर्मदा नदी-ये उत्तरमें परम पावन तीर्थ हैं। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित) · पृष्ठ 305, कुल 318 में से · BharatKosha