संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६६
२९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६६ सर्वत्र परमात्मानं यः पश्यति स मुच्यते । और सर्वत्र ही परमात्माका जो दर्शन करता है, वह मुक्त अष्टषष्टिश्च नामानि कथितानि मया तव ॥ २४ हो जाता है ॥ १९-२३१/२ ॥ ब्रह्माजी ! ये अड़सठ नाम हमने तुम्हें बताये तथा क्षेत्राणि चैव गुह्यानि कथितानि विशेषतः । विशेषतः गुप्त तीर्थोंका भी वर्णन किया। प्रजापते ! जो एतानि मम नामानि रहस्यानि प्रजापते ॥ २५ पुरुष प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर मेरे इन गुह्यनामोंका यः पठेत् प्रातरुत्थाय शृणुयाद्वापि नित्यशः । पाठ या श्रवण करेगा, वह नित्य एक लाख गोदानका गवां शतसहस्रस्य दत्तस्य फलमाप्नुयात् ॥ २६ फल पायेगा। नित्यप्रति पवित्र होकर जो इन नामोंका दिने दिने शुचिर्भूत्वा नामान्येतानि यः पठेत् । पाठ करता है, उसको मेरी कृपासे कभी दुःस्वप्नका दुःस्वप्नं न भवेत् तस्य मत्प्रसादान्न संशयः ॥ २७ दर्शन नहीं होता, इसमें संदेह नहीं है। जो पुरुष इन अड़सठ नामोंका प्रतिदिन तीनों काल, अर्थात् प्रातः, अष्टषष्टिस्तु नामानि त्रिकालं यः पठेन्नरः । मध्याह्न और सायंकालमें पाठ करता है, वह सब पापोंसे विमुक्तः सर्वपापेभ्यो मम लोके स मोदते ॥ २८ मुक्त होकर मेरे लोकमें आनन्द भोगता है। सभी मनुष्यों और विशेषतः वैष्णवोंको चाहिये कि यथाशक्ति पूर्वोक्त द्रष्टव्यानि यथाशक्त्या क्षेत्राण्येतानि मानवैः । तीर्थोंका दर्शन करें। जो लोग ऐसा करते हैं, उन्हें मैं वैष्णवैस्तु विशेषेण तेषां मुक्तिं ददाम्यहम् ॥ २९ मुक्ति देता हूँ ॥ २४-२९ ॥ सूत उवाच सूतजी कहते हैं- जो पुरुष सदा और विशेषतः हरिं समभ्यर्च्य तदग्रसंस्थितो हरिवासर (एकादशी या द्वादशीको) भगवान् विष्णुकी हरिं स्मरन् विष्णुदिने विशेषतः । पूजा करके उनके सामने खड़ा हो भगवत्स्मरणपूर्वक इस इमं स्तवं यः पठते स मानवः स्तोत्रका पाठ करता है, वह विष्णुके अमृतपदको प्राप्त प्राप्नोति विष्णोरमृतात्मकं पदम् ॥ ३० कर लेता है ॥ ३० ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे आद्ये धर्मार्थमोक्षदायिनि विष्णुवल्लभे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'आदि धर्मार्थमोक्षदायक विष्णुवल्लभस्तोत्र' विषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥ छाछठवाँ अध्याय अन्यान्य तीर्थों तथा सह्याद्रि और आमलक ग्रामके तीर्थोंका माहात्म्य सूत उवाच सूतजी कहते हैं - भगवान् विष्णु पुनः बोले- उक्तः पुण्यः स्तवो ब्रह्मन् हरेरेभिश्च नामभिः । ब्रह्मन् ! उपर्युक्त अड़सठ नामोंसे भगवान् विष्णुकी पावन पुनरन्यानि नामानि यानि तानि निबोध मे ॥ १ स्तुतिका वर्णन किया गया। अब जो दूसरे-दूसरे पावन तीर्थ और नाम हैं, उनका वर्णन मुझसे सुनिये ॥ १ ॥ गङ्गा तु प्रथमं पुण्या यमुना गोमती पुनः । सर्वप्रथम गङ्गा पवित्र है; फिर यमुना, गोमती, सरयू, सरयूः सरस्वती च चन्द्रभागा चर्मण्वती ॥ २ सरस्वती, चन्द्रभागा और चर्मण्वती- ये नदियाँ पावन हैं। कुरुक्षेत्रं गया चैव पुष्कराणि तथार्बुदम् । इसी प्रकार कुरुक्षेत्र, गया, तीनों पुष्कर और अर्बुद-क्षेत्र तथा नर्मदा च महापुण्या तीर्थान्येतानि चोत्तरे ॥ ३ परम पावन नर्मदा नदी-ये उत्तरमें परम पावन तीर्थ हैं। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ६६ ] अन्यान्य तीर्थों तथा सह्याद्रि और आमलक ग्रामके तीर्थोंका माहात्म्य २९५ तापी पयोष्णी पुण्ये द्वे तत्सङ्गात्तीर्थमुत्तमम्। | तापी, पयोष्णी—ये दो पावन नदियाँ हैं। इनके संगमसे तथा ब्रह्मगिरेश्चापि मेखलाभिः समन्विताः ॥ ४ | एक बहुत उत्तम तीर्थ हो गया है तथा ब्रह्मगिरिकी | मेखलाओंसे मिले हुए भी बहुत-से उत्तम तीर्थ हैं। विरजं च तथा तीर्थं सर्वपापक्षयंकरम्। | विरज-तीर्थ भी समस्त पापोंको क्षीण करनेवाला है तथा गोदावरी महापुण्या सर्वत्र चतुरानन ॥ ५ | चतुरानन! गोदावरी नदी सर्वत्र परमपावन है। कमलोद्भव! तुङ्गभद्रा महापुण्या यत्राहं कमलोद्भव। | तुङ्गभद्रा नदी भी अत्यन्त पवित्र करनेवाली है, जिसके हरेण सार्धं प्रीत्या तु वसामि मुनिपूजितः ॥ ६ | तटपर मैं मुनियोंद्वारा पूजित हो भगवान् शङ्करके साथ | स्वयं निवास करता हूँ। दक्षिण गङ्गा, कृष्णा और विशेषतः दक्षिणगङ्गा कृष्णा तु कावेरी च विशेषतः । | कावेरी—ये पुण्य नदियाँ हैं। इनके अतिरिक्त, कमलोद्भव ! सह्ये त्वामलकग्रामे स्थितोऽहं कमलोद्भव ॥ ७ | मैं सह्यपर्वतपर आमलक ग्राममें स्वयं निवास करता हूँ। | वहाँ 'देवदेव' नामसे प्रसिद्ध मेरे श्रीविग्रहका तुम स्वयं देवदेवस्य नाम्ना तु त्वया ब्रह्मन् सदार्चितः । | ही सदा पूजन करते हो। वहाँ समस्त पापोंको हर लेनेवाले तत्र तीर्थान्यनेकानि सर्वपापहराणि वै॥ | अनेक तीर्थ हैं, जिनमें स्नान और आचमन करके मनुष्य येषु स्नात्वा च पीत्वा च पापान्मुच्यति मानवः ॥ ८ | पापसे मुक्त हो जाता है ॥ २–८ ॥ सूत उवाच | इत्येवं कथयित्वा तु तीर्थानि मधुसूदनः । | सूतजी कहते हैं—भरद्वाज ! ब्रह्माजीसे इन तीर्थोंका ब्रह्मणो गतवान् ब्रह्मन् ब्रह्मापि स्वपुरं गतः ॥ ९ | वर्णन करके भगवान् मधुसूदन अपने धामको चले गये | और ब्रह्मा भी ब्रह्मलोक सिधारे ॥ ९ ॥ भरद्वाज उवाच | | भरद्वाजजी बोले—धर्मज्ञ ! उस आमलक ग्राममें तस्मिन्नामलकग्रामे पुण्यतीर्थानि यानि वै। | जो-जो पुण्यतीर्थ हैं, उनका आप विस्तारके साथ यथार्थ- तानि मे वद धर्मज्ञ विस्तरेण यथार्थतः ॥ १० | रूपमें वर्णन करें। जहाँ देवदेवेश्वर भगवान् विष्णु स्वयं क्षेत्रोत्पत्तिं च माहात्म्यं यात्रापर्व च यत्र तत् । | ब्रह्माजीके द्वारा पूजित होते हैं, उस क्षेत्रकी उत्पत्ति- तत्रासौ देवदेवेशः पूज्यते ब्रह्मणा स्वयम् ॥ ११ | कथा, माहात्म्य और यात्रापर्वका विस्तृत विवरण प्रस्तुत | कीजिये ॥ १०-११ ॥ सूत उवाच | शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पुण्यं पापप्रणाशनम्। | सूतजी कहते हैं—विप्र ! महामुने ! सह्यपर्वतपर स्थित सह्यामलाकतीर्थस्य उत्पत्त्यादि महामुने ॥ १२ | 'आमलक' तीर्थके आविर्भाव आदिकी पवित्र एवं पापनाशक | कथा मैं आपसे कह रहा हूँ, सुनें ॥ १२ ॥ पुरा सह्यावनोद्देशे तरुरामलको महान्। | ब्रह्मन् ! पूर्वकालमें सह्यपर्वतके वनमें एक बहुत आसीद्ब्रह्मन् महोग्रोऽयं नाम्नायं चोच्यते बुधैः ॥ १३ | बड़ा आँवलेका वृक्ष था। उसे बुद्धिमान् लोगोंने फलानि तस्य वृक्षस्य महान्ति सुरसानि च । | 'महोग्र' नाम दे रखा था। महामुने ! उस वृक्षके फल दर्शनीयानि दिव्यानि दुर्लभाानि महामुने ॥ १४ | बड़े रसीले, दर्शनीय, दिव्य एवं दुर्लभ होते थे। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
२९६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६६
२९६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६६ परेषां ब्राह्मणानां तु परेण ब्रह्मणा पुरा। स दृष्टस्तु महावृक्षो महाफलसमन्वितः ॥ १५ किमेतदिति विप्रेन्द्र ध्यानदृष्टिपरोऽभवत् । ध्यानेन दृष्टवांस्तत्र पुनरामलकं तरुम् ॥ १६ तस्योपरि तु देवेशं शङ्खचक्रगदाधरम् । उत्थाय च पुनः पश्येत्प्रतिमामेव केवलाम् ॥ १७ तत्पादं भूतले देवः प्रविवेश महातरुः । ततस्त्वाराधयामास देवदेवेशमव्ययम् ॥ १८ गन्धपुष्पादिभिर्नित्यं ब्रह्मा लोकपितामहः। द्वादशभिः सप्तभिस्तु संख्याभिः पूजितो हरिः ॥ १९ तस्मिन् क्षेत्रे मुनिश्रेष्ठ माहात्म्यं तस्य को वदेत् । श्रीसह्यामलग्रामे देवदेवेशमव्ययम् ॥ २० आराध्य तीर्थे सम्प्राप्ता द्वादश प्रति चतुर्मुखम् । तस्य पादतले तीर्थं निस्सृतं पश्चिमामुखम् ॥ २१ तच्चक्रतीर्थमभवत्पुण्यं पापप्रणाशनम् । चक्रतीर्थे नरः स्नात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २२ बहुवर्षसहस्त्राणि ब्रह्मलोके महीयते । शङ्खतीर्थे नरः स्नात्वा वाजपेयफलं लभेत् ॥ २३ पौषे मासे तु पुष्यार्के तद्यात्रादिवसं मुने। ब्रह्मणः कुण्डिका पूर्वं गङ्गातोयप्रपूरिता ॥ २४ तस्याद्रौ पतिता ब्रह्मंस्तत्र तीर्थेऽशुभं हरेत् । नाम्ना तत्कुण्डिकातीर्थं शिलागृहसमन्वितम् ॥ २५ तत्तीर्थे मनुजः स्नात्वा तदानीं सिद्धिमाप्नुयात् । त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा यस्तत्र स्नाति मानवः ॥ २६ सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते। कुण्डिकातीर्थादुत्तरे पिण्डस्थानाच्च दक्षिणे ॥ २७ समस्त उत्तम ब्राह्मणोंमें उत्कृष्ट श्रीब्रह्माजीने पूर्वकालमें महान् फलोंसे युक्त उस महावृक्षको देखा था। विप्रेन्द्र! उसे देखकर, यह क्या है—यह जाननेके लिये ब्रह्माजी ध्यानमग्न हो गये। उन्होंने ध्यानमें उस स्थानपर महान् आँवलेके वृक्षको देखा और उसके ऊपर शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले देवेश्वर भगवान् विष्णुको विराजमान देखा। फिर उन्होंने जब ध्यानसे निवृत्त हो खड़े होकर दृष्टिपात किया, तब वहाँ वृक्षके स्थानमें केवल भगवान् विष्णुकी एक प्रतिमा दिखायी दी। उसका आधारभूत वह दिव्य महावृक्ष भूतलमें धँस गया! तब लोकपितामह भगवान् ब्रह्माजी गन्ध-पुष्प आदिसे नित्य ही उन अविनाशी देवदेवेश्वरकी आराधना करने लगे। उस समय उनके द्वारा बारह और सात बार भगवान्की पूजा सम्पन्न हुई ॥ १३-१९ ॥ मुनिश्रेष्ठ! उस आमलकक्षेत्रमें विराजमान भगवान्के माहात्म्यका कौन वर्णन कर सकता है। श्रीसह्यपर्वतस्थ आमलक ग्राममें इस प्रकार अविनाशी देवेश्वर भगवान्की आराधना करनेके पश्चात् ब्रह्माजीको वहाँ बारह तीर्थ और प्राप्त हुए। भगवान्के चरणके नीचे पश्चिमाभिमुख एक तीर्थ प्रकट हुआ। वह 'चक्रतीर्थ' के नामसे विख्यात हुआ। वह पावन तीर्थ पापोंको नष्ट करनेवाला है। मनुष्य चक्रतीर्थमें स्नान करके सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और हजारों वर्षोंतक ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। इसके बाद 'शङ्खतीर्थ' है। उसमें स्नान करनेसे मनुष्यको वाजपेय यज्ञका फल मिलता है। मुने! पौष मासमें जब सूर्य पुष्य नक्षत्रपर स्थित हों, उसी समय वहाँकी यात्राका पर्व है। पूर्वकालमें एक समय सह्यपर्वतपर गङ्गाजलसे भरा हुआ ब्रह्माजीका कमण्डलु गिर पड़ा था, तबसे वह स्थान 'कुण्डिका' तीर्थके नामसे विख्यात हुआ। वह तीर्थ सारे अशुभोंको हर लेता है। वहाँ एक शिलामय गृह भी है। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य तत्काल सिद्धि प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य उस तीर्थमें तीन राततक उपवास करके स्नान करता है, वह सब पापोंसे सर्वथा मुक्त हो ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। कुण्डिका-तीर्थसे उत्तर और 'पिण्डस्थान' नामक तीर्थसे In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ६६ ] अन्यान्य तीर्थों तथा सह्याद्रि और आमलक ग्रामके तीर्थोंका माहात्म्य २९७
ऋणमोचनतीर्थं हि तीर्थानां गुह्यमुत्तमम्। | दक्षिण 'ऋणमोचन' नामक तीर्थ है, जो सब तीर्थोंमें त्रिरात्रमुषितो यस्तु तत्र स्नानं समाचरेत्॥ २८ | उत्तम और गुह्य है। ब्रह्मन्! वहाँ तीन राततक निवास | करके जो स्नान करता है, वह निस्संदेह तीनों ऋणोंसे ऋणैस्त्रिभिरसौ ब्रह्मन् मुच्यते नात्र संशयः। | मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य पिण्डस्थानमें श्राद्ध करके श्राद्धं कृत्वा पितृभ्यश्च पिण्डस्थानेषु यो नरः॥ २९ | वहाँ पितरोंके उद्देश्यसे विधिपूर्वक पिण्डदान करेगा, | उसके पितर पूर्ण तृप्त होकर अवश्य ही पितृलोकको पितॄनुद्दिश्य विधिवत्पिण्डान्निर्व्वापयिष्यति। | प्राप्त होंगे॥ २८-३०॥ सुतृप्ताः पितरो यान्ति पितृलोकं न संशयः॥ ३० | | इसके बाद 'पाप-मोचन' तीर्थ है। उस तीर्थमें पाँच पञ्चरात्रोषितस्नायी तीर्थे वै पापमोचने। | राततक निवास करते हुए जो नित्य स्नान करता है, वह सर्वपापक्षयं प्राप्य विष्णुलोके स मोदते॥ ३१ | अपने सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करके विष्णुलोकमें आनन्दका | भागी होता है। वहीं एक बहुत बड़ी धारा बहती है। तत्रैव महतीं धारां शिरसा यस्तु धारयेत्। | उसके जलको जो अपने सिरपर धारण करता है, वह सर्वक्रतुफलं प्राप्य नाकपृष्ठे महीयते॥ ३२ | समस्त यज्ञोंके फलको प्राप्त करके स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित | होता है॥ ३१-३२॥ धनुःपाते महातीर्थे भक्त्या यः स्नानमाचरेत्। | इसके बाद 'धनुःपात' नामक एक महान् तीर्थ है। आयुर्भोगफलं प्राप्य स्वर्गलोके महीयते॥ ३३ | उसमें जो भक्तिपूर्वक स्नान करता है, वह पूर्ण आयुका | भोग करके अन्तमें स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। 'शरबिन्दु' शरबिन्दौ नरः स्नात्वा शतक्रतुपुरं व्रजेत्। | तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य मृत्युके बाद इन्द्रपुरीमें जाता वाराहतीर्थे विप्रेन्द्र सह्ये यः स्नानमाचरेत्॥ ३४ | है तथा जो सह्यपर्वतपर 'वाराहतीर्थ' में स्नान करता | और वहाँ एक दिन-रात निवास करता है, वह विष्णुलोकमें अहोरात्रोषितो भूत्वा विष्णुलोके महीयते। | पूजित होता है। इसके बाद सह्यके शिखरपर 'आकाशगङ्गा' आकाशगङ्गानाम्ना च सह्याग्रे तीर्थमुत्तमम्॥ ३५ | नामक एक उत्तम तीर्थ है। वहाँकी शिलाओंके नीचेसे | सफेद मिट्टी निकलती है। विप्रवर! उसमें जो भक्तिपूर्वक शिलातलात्ततो ब्रह्मन्निर्गता श्वेतमृत्तिका। | स्नान करता है, वह सम्पूर्ण यज्ञोंका फल प्राप्तकर तस्यां भक्त्या तु यः स्नाति नरो द्विजवरोत्तम॥ ३६ | विष्णुलोकमें पूजित होता है॥ ३३-३६१/२॥ | सर्वक्रतुफलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते। | ब्रह्मन्! उस निर्मल सह्यगिरिसे जहाँ-जहाँ जलके ब्रह्मन्नमलसह्याद्रेर्यद्यत्तोयविनिर्गमः ॥ ३७ | झरने गिरते हैं, वहाँ-वहाँ सब जगह तीर्थ समझना | चाहिये। उसमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त तत्र तीर्थं विजानीहि स्नात्वा पापात्प्रमुच्यते। | हो जाता है। जो नित्य ही सह्यपर्वतकी यात्रा करके सह्याद्रिं गत्वान्नित्यं स्नात्वा पापात्प्रमुच्यते॥ ३८ | वहाँ स्नान करता है, वह निष्पाप हो जाता है। द्विजेन्द्र! | जो मनुष्य सह्यपर्वतके इन पावन तीर्थोंमें स्नान करके एतेषु तीर्थेषु नरो द्विजेन्द्र | भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुको पुष्प चढ़ाता है, वह पुण्येषु सह्याद्रिसमुद्भवेषु। | पापोंसे रहित हो भगवान् विष्णुमें ही लीन हो जाता दत्त्वा सुपुष्पाणि हरिं स भक्त्या | विहाय पापं प्रविशेत्स विष्णुम्॥ ३९ |
२९८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६७
२९८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६७
सकृत्तीर्थाद्रितोयेषु गङ्गायां तु पुनः पुनः। | है। अन्य सभी तीर्थोंके पर्वतोंसे बहनेवाले जलमें सर्वतीर्थमयी गङ्गा सर्वदेवमयो हरिः ॥ ४० | यथासम्भव एक बार स्नान कर लेना चाहिये, परंतु | गङ्गामें बार-बार स्नान करे; क्योंकि गङ्गामें सम्पूर्ण तीर्थ सर्वशास्त्रमयी गीता सर्वधर्मो दयापरः। | हैं, भगवान् विष्णुमें सभी देवता वर्तमान हैं, गीता एवं ते कथितं विप्र क्षेत्रमाहात्म्यमुत्तमम् ॥ ४१ | सर्वशास्त्रमयी है और सभी धर्मोंमें जीवदया श्रेष्ठ | है ॥ ३७—४०१/२ ॥ श्रीसह्यामलकग्रामे तीर्थे स्नात्वा फलानि च। | विप्र ! इस प्रकार मैंने आपसे इस क्षेत्रके उत्तम तीर्थानामपि यत्तीर्थं तत्तीर्थं द्विजसत्तम। | माहात्म्यका वर्णन किया। साथ ही सह्य और आमलक देवदेवस्य पादस्य तलाद्भूवि विनिस्सृतम् ॥ ४२ | ग्रामके तीर्थोंमें स्नान करनेके फल भी बताये। द्विजश्रेष्ठ ! | वही उत्तम तीर्थ है, जो तीर्थोंका भी तीर्थ हो। यह | आमलकग्राम तीर्थ देवदेव भगवान् विष्णुके चरण- अम्भोगुगं तुरगमेधसहस्रतुल्यं | तलसे प्रकट हुआ है, अतः यह सर्वोत्तम तीर्थ है। तच्चक्रतीर्थमिति वेदविदो वदन्ति। | यहाँपर जो जल है, उसमें स्नान करना हजार अश्वमेध स्नानाच्च तत्र मनुजा न पुनर्भवन्ति | यज्ञ करनेके बराबर है। उसीको वेदवेत्ता पुरुष 'चक्रतीर्थ' पादौ प्रणम्य शिरसा मधुसूदनस्य ॥ ४३ | कहते हैं। वहाँ स्नान करके भगवान् मधुसूदनके | चरणोंमें मस्तक झुकानेसे मनुष्यका इस संसारमें | पुनर्जन्म नहीं होता। गङ्गा, प्रयाग, नैमिषारण्य, पुष्कर, गङ्गाप्रयागगमनैमिषपुष्कराणि | कुरुजाङ्गलप्रदेश और यमुना-तटवर्ती तीर्थ—ये सभी पुण्यायुतानि कुरुजाङ्गलयामुनानि। | पुण्यतीर्थ हैं। इन तीर्थोंके जलमें स्नान करनेपर वे कालेन तीर्थसलिलानि पुनन्ति पापान् | कुछ समयके बाद पवित्र करते हैं; किंतु भगवान् पादोदकं भगवतस्तु पुनाति सद्यः ॥ ४४ | विष्णुका चरणोदकरूप यह 'चक्रतीर्थ' तत्काल पवित्र | कर देता है ॥ ४१—४४ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे तीर्थप्रशंसायां षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'तीर्थप्रशंसा' विषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥
सड़सठवाँ अध्याय मानसतीर्थ, व्रत तथा नरसिंहपुराणका माहात्म्य सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार अबतक तीर्थानि कथितान्येवं भौमानि द्विजसत्तम। | मैंने भूतलके प्रसिद्ध तीर्थोंका वर्णन किया; किंतु इन मानसानि हि तीर्थानि फलदानि विशेषतः ॥ १ | तीर्थोंकी अपेक्षा मानसतीर्थ विशेष फल देनेवाले हैं।
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अध्याय ६७] मानसतीर्थ, व्रत तथा नरसिंहपुराणका माहात्म्य २९९
अध्याय ६७] मानसतीर्थ, व्रत तथा नरसिंहपुराणका माहात्म्य २९९ मनोनिर्मलता तीर्थं रागादिभिरनाकुला। सत्यं तीर्थं दया तीर्थं तीर्थमिन्द्रियनिग्रहः॥ २ गुरुशुश्रूषणं तीर्थं मातृशुश्रूषणं तथा। स्वधर्माचरणं तीर्थं तीर्थमग्नेरुपासनम्॥ ३ वास्तवमें राग-द्वेषादिसे रहित मनकी स्वच्छता ही उत्तम तीर्थ है। सत्य, दया, इन्द्रियनिग्रह, गुरुसेवा, माता- पिताकी सेवा, स्वधर्मपालन और अग्निकी उपासना— ये परम उत्तम तीर्थ हैं। यह तो पावन तीर्थोंका वर्णन हुआ, अब व्रतोंका वर्णन सुनिये॥१-३१/२॥ एतानि पुण्यतीर्थानि व्रतानि शृणु मेऽधुना। एकभुक्तं तथा नक्तमुपवासं च वै मुने॥ ४ मुने! दिन-रातमें एक बार भोजन करके रहना और विशेषतः रातमें भोजन न करना—यह व्रत है। पूर्णिमा और अमावास्याको एक ही बार भोजन करके रहना चाहिये। इन तिथियोंमें एक बार भोजन करके रहनेवाला मनुष्य पावन गतिको प्राप्त करता है। जो चतुर्थी, चतुर्दशी, सप्तमी, अष्टमी और त्रयोदशीको रातमें उपवास करता है, उसे मनोवाञ्छित वस्तुकी प्राप्ति होती है॥४-६॥ पूर्णमास्याममावास्यामेकभुक्तं समाचरेत्। तत्रैकभुक्तं कुर्वाणः पुण्यां गतिमवाप्नुयात्॥ ५ चतुर्थ्यां तु चतुर्दश्यां सप्तम्यां नक्तमाचरेत्। अष्टम्यां तु त्रयोदश्यां स प्राप्नोत्यभिवाञ्छितम्॥ ६ उपवासो मुनिश्रेष्ठ एकादश्यां विधीयते। नरसिंहं समभ्यर्च्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ७ मुनिश्रेष्ठ! एकादशीको दिन-रात उपवास करनेका विधान है। उस दिन भगवान् विष्णुका पूजन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। यदि हस्त नक्षत्रसे युक्त रविवार हो तो उस दिन रात्रिमें उपवास करके सौरनक्त-व्रतका पालन करना चाहिये। उस दिन स्नानके पश्चात् सूर्यमण्डलमें भगवान् विष्णुका ध्यान करके मनुष्य रोगमुक्त हो जाता है। जब सूर्य अपनी दुगुनी छायामें स्थित हों, उस दिन सौर नक्तव्रतका समय है। उस समयसे लेकर राततक भोजन न करे॥७-९॥ हस्तयुक्तेऽर्कदिवसे सौरनक्तं समाचरेत्। स्नात्वार्कमध्ये विष्णुं च ध्यात्वा रोगात्प्रमुच्यते॥ ८ आत्मनो द्विगुणां छायां यदा संतिष्ठते रविः। सौरनक्तं विजानीयान्न नक्तं निशि भोजनम्॥ ९ जो पुरुष बृहस्पतिवारको त्रयोदशी तिथि होनेपर अपराह्नकालमें जलमें स्नान करके तिल और तण्डुलोंद्वारा देवता, ऋषि एवं पितरोंका तर्पण करता है तथा भगवान् नरसिंहका पूजन करके उपवास करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ १०-११॥ गुरुवार त्रयोदश्यामपराह्ने जले ततः। तर्पयित्वा पितृन्देवानृषींश्च तिलतण्डुलैः॥ १० नरसिंहं समभ्यर्च्य यः करोत्युपवासकम्। सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥ ११ महामुने! जब अगस्त्य तारेका उदय हो, उस समयसे लगातार सात रात्रियोंतक अगस्त्य- मुनिको पूजा करके उन्हें अर्घ्य देना चाहिये। यदागस्त्योदये प्राप्ते तदा सप्तसु रात्रिषु। अर्घ्यं दद्यात् समभ्यर्च्य अगस्त्याय महामुने॥ १२ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
३०० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६७
शङ्खे तोयं विनिक्षिप्य सितपुष्पाक्षतैर्युतम्। मन्त्रेणानेन वै दद्याच्छितपुष्पादिनार्चिते ॥ १३ काशपुष्पप्रतीकाश अग्निमारुतसम्भव। मित्रावरुणयोः पुत्र कुम्भयोने नमोऽस्तु ते ॥ १४ आतापी भक्षितो येन वातापी च महासुरः। समुद्रः शोषितो येन सोऽगस्त्यः प्रीयतां मम ॥ १५ एवं तु दद्याद्यो सर्वमगस्त्ये वै दिशं प्रति। सर्वपापविनिर्मुक्तस्तमस्तरति दुस्तरम् ॥ १६ शङ्खमें श्वेत पुष्प और अक्षतसहित जल रखकर श्वेत पुष्प आदिसे पूजित हुए अगस्त्यजीके प्रति निम्नाङ्कित मन्त्र-वाक्य पढ़कर अर्घ्य निवेदन करे—'अग्नि और वायु देवतासे प्रकट हुए अगस्त्यजी! काश पुष्पके समान उज्ज्वल वर्णवाले कुम्भज मुने! मित्र और वरुणके पुत्र भगवान् कुम्भयोने! आपको नमस्कार है। जिन्होंने महान् असुर आतापी और वातापीको भक्षण कर लिया और समुद्रको भी सोख डाला, वे अगस्त्यजी मुझपर प्रसन्न हों।' इस प्रकार कहकर जो पुरुष अगस्त्यकी दिशा (दक्षिण)-के प्रति अर्घ्य अर्पण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो, दुस्तर मोहान्धकारसे पार हो जाता है॥ १२—१६॥
एवं ते कथितं सर्वं भरद्वाज महामुने। पुराणं नारसिंहं च मुनीनां संनिधौ मया ॥ १७ सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। वंशानुचरितं चैव सर्वमेव प्रकीर्तितम् ॥ १८ ब्रह्मणैव पुरा प्रोक्तं मरीच्यादिषु वै मुने। तेभ्यश्च भृगुणा प्रोक्तं मार्कण्डेयाय वै ततः ॥ १९ मार्कण्डेयेन वै प्रोक्तं राज्ञो नागकुलस्य ह। प्रसादान्नारसिंहस्य प्राप्तं व्यासेन धीमता ॥ २० तत्प्रसादान्मया प्राप्तं सर्वपापप्रणाशनम्। पुराणं नरसिंहस्य मया च कथितं तव ॥ २१ मुनीनां संनिधौ पुण्यं स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम्। महामुने! भरद्वाजजी! इस प्रकार मैंने मुनियोंके निकट यह पूरा 'नरसिंहपुराण' आपको सुनाया। इसमें मैंने सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—सभीका वर्णन किया है। मुने! इस पुराणको सर्वप्रथम ब्रह्माजीने मरीचि आदि मुनियोंके प्रति कहा था। उन मुनियोंमेंसे भृगुजीने मार्कण्डेयजीके प्रति इसे कहा और मार्कण्डेयजीने नागकुलोत्पन्न राजा सहस्रानीकको इसका श्रवण कराया। फिर भगवान् नरसिंहकी कृपासे इस पुराणको बुद्धिमान् श्रीव्यासजीने प्राप्त किया। उनकी अनुकम्पासे मैंने इस सर्वपापनाशक पवित्र पुराणका ज्ञान प्राप्त किया और इस समय मैंने यह नरसिंहपुराण इन मुनियोंके निकट आपसे कहा। अब आपका कल्याण हो, मैं जा रहा हूँ॥ १७—२११/२॥
यः शृणोति शुचिर्भूत्वा पुराणं ह्येतदुत्तमम् ॥ २२ माघे मासि प्रयागे तु स स्नानफलमाप्नुयात्। यो भक्त्या श्रावयेद्भक्तान्रित्यं नरहरेरिदम् ॥ २३ सर्वतीर्थफलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते। जो मनुष्य पवित्र होकर इस उत्तम पुराणका श्रवण करता है, वह माघ मासमें प्रयागतीर्थमें स्नान करनेका फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य इस नरसिंहपुराणको भगवान्के भक्तोंके प्रति नित्य सुनाता है, वह सम्पूर्ण तीर्थोंके सेवनका फल प्राप्त करके विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ २२—२३१/२॥
श्रुत्वैवं स्नातकौः सार्धं भरद्वाजो महामतिः ॥ २४ सूतमभ्यर्च्य तत्रैव स्थितवान् मुनयो गताः। इस प्रकार स्नातकोंके साथ इस पुराणको सुन महामति भरद्वाजजीने सूतजीका पूजन-सत्कार किया और स्वयं वहीं रह गये। अन्य सब मुनि अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ २४१/२॥
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अध्याय ६८ ] नरसिंहपुराणके पठन और श्रवणका फल ३०१
अध्याय ६८ ] नरसिंहपुराणके पठन और श्रवणका फल ३०१ सर्वपापहरं पुण्यं पुराणं नृसिंहात्मकम्॥ २५ पठतां शृण्वतां नृणां नरसिंहः प्रसीदति। प्रसन्ने देवदेवेशे सर्वपापक्षयो भवेत्॥ २६ प्रक्षीणपापबन्धास्ते मुक्तिं यान्ति नरा इति॥ २७ यह नरसिंहपुराण समस्त पापोंको हर लेनेवाला और पुण्यमय है। जो इसको पढ़ते और सुनते हैं, उन मनुष्योंपर भगवान् नरसिंह प्रसन्न होते हैं। देवदेवेश्वर नरसिंहके प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण पापोंका नाश हो जाता है और जिनके पाप-बन्धन सर्वथा नष्ट हो गये हैं, वे मानव मोक्षको प्राप्त होते हैं॥ २५-२७॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे मानसतीर्थव्रतं नाम सप्तषष्टितमोऽध्यायः॥ ६७॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'मानसतीर्थ-व्रत' नामक सड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६७॥ अड़सठवाँ अध्याय नरसिंहपुराणके पठन और श्रवणका फल सूत उवाच सूतजी कहते हैं- इस प्रकार मैंने यह सम्पूर्ण नरसिंहपुराण कह सुनाया। यह सब पापोंको हरनेवाला और सम्पूर्ण दुःखोंको दूर करनेवाला है। समस्त पुण्यों तथा सभी यज्ञोंका फल देनेवाला है। जो लोग इसके एक श्लोक या आधे श्लोकका श्रवण अथवा पाठ करते हैं, उन्हें कभी भी पापोंसे बन्धन नहीं प्राप्त होता। भगवान् विष्णुको अर्पण किया हुआ यह पावन पुराण समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला है। भरद्वाजजी! जो लोग भक्तिपूर्वक इस पुराणका पाठ अथवा श्रवण करते हैं, उनको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन सुनिये। वे सौ जन्मोंके पापसे तत्काल ही मुक्त हो जाते हैं तथा अपनी सहस्र पीढ़ियोंके साथ ही परमपदको प्राप्त होते हैं। जो प्रतिदिन एकाग्रचित्तसे गोविन्दगुणगान सुनते रहते हैं, उनको अनेक बार तीर्थ-सेवन, गोदान, तपस्या और यज्ञानुष्ठान करनेसे क्या लेना है। जो प्रतिदिन सबेरे उठकर इस पुराणके बीस श्लोकोंका पाठ करता है, इत्येतत् सर्वमाख्यातं पुराणं नारसिंहकम्। सर्वपापहरं पुण्यं सर्वदुःखनिवारणम्॥ १ समस्तपुण्यफलदं सर्वयज्ञफलप्रदम्। ये पठन्त्यपि शृण्वन्ति श्लोकं श्लोकार्धमेव वा॥ २ न तेषां पापबन्धस्तु कदाचिदपि जायते। विष्ण्वर्पितमिदं पुण्यं पुराणं सर्वकामदम्॥ ३ भक्त्या च वदतामेतच्छृण्वतां च फलं शृणु। शतजन्मार्जितैः पापैः सद्य एव विमोचिताः॥ ४ सहस्त्रकुलसंयुक्ताः प्रयान्ति परमं पदम्। किं तीर्थैर्गोप्रदानैर्वा तपोभिर्वा किमध्वरैः॥ ५ अहन्यहनि गोविन्दं तत्परत्वेन शृण्वताम्। यः पठेत्प्रातरुत्थाय यदस्य श्लोकविंशतिम्॥ ६ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
३०२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६८
३०२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६८ ज्योतिष्टोमफलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते। एतत्पवित्रं पूज्यं च न वाच्यमकृतात्मनाम्॥ ७ द्विजानां विष्णुभक्तानां श्राव्यमेतन्न संशयः। एतत्पुराणश्रवणमिहामुत्र सुखप्रदम्॥ ८ वदतां शृण्वतां सद्यः सर्वपापप्रणाशनम्। बहुनात्र किमुक्तेन भूयो भूयो मुनीश्वराः॥ ९ श्रद्धयाश्रद्धया वापि श्रोतव्यमिदमुत्तमम्। भारद्वाजमुखाः सर्वे कृतकृत्या द्विजोत्तमाः॥ १० सूतं हृष्टाः प्रपूज्याथ सर्वे स्वस्वाश्रमं ययुः॥ ११ वह ज्योतिष्टोम यज्ञका फल प्राप्तकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ १-६१/२॥ यह पुराण परम पवित्र और आदरणीय है। इसे अजितेन्द्रिय पुरुषोंको तो कभी नहीं सुनाना चाहिये, परंतु विष्णुभक्त द्विजोंको निस्संदेह इसका श्रवण करना चाहिये। इस पुराणका श्रवण इस लोक और परलोकमें भी सुख देनेवाला है। यह वक्ताओं और श्रोताओंके पापको तत्काल नष्ट कर देता है। मुनीश्वरगण! इस विषयमें बहुत कहनेकी क्या आवश्यकता है। श्रद्धासे हो या अश्रद्धासे, इस उत्तम पुराणका श्रवण करना ही चाहिये। इस पुराणको सुनकर भरद्वाज आदि द्विजश्रेष्ठगण कृतार्थ हो गये। उन्होंने हर्षपूर्वक सूतजीका समादर किया। फिर सब लोग अपने-अपने आश्रमको चले गये॥ ७-११॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सूतभरद्वाजादिसंवादे सर्वदुःखोपहरं श्रीनरसिंहपुराणस्य माहात्म्यं समाप्तम्॥ ६८॥ इस प्रकार सूत-भरद्वाजादि-संवादरूप श्रीनरसिंहपुराणमें इसके 'सर्वदुःखहारी माहात्म्यका वर्णन' नामक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६८॥
गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित पुराण-साहित्य श्रीमद्भागवतमहापुराण, व्याख्यासहित (कोड 26, 27) ग्रन्थाकार - श्रीमद्भागवत भारतीय वाङ्मयका मुकुटमणि है। भगवान् शुकदेवद्वारा महाराज परीक्षित्को सुनाया गया भक्तिमार्गका तो मानो सोपान ही है। इसके प्रत्येक श्लोकमें श्रीकृष्ण-प्रेमकी सुगन्धि है। यह सम्पूर्ण ग्रन्थरत्न मूलके साथ हिन्दी-अनुवाद, पूजन-विधि, भागवत-माहात्म्य, आरती, पाठके विभिन्न प्रयोगोंके साथ दो खण्डोंमें उपलब्ध है। विशिष्ट संस्करण (कोड 1535, 1536) सचित्र, सजिल्द, (कोड 1552, 1553) गुजराती, (कोड 1678, 1735) सानुवाद, मराठी, (कोड 1739, 1740), कन्नड़, (कोड 1577, 1744) बँगला, (कोड 564, 565) अंग्रेजी-अनुवाद, (कोड 25) केवल हिन्दी बृहदाकार, बड़े टाइपमें, (कोड 1190, 1191) बड़ा टाइप, दो खण्डोंमें, केवल हिन्दी, (कोड 1490) (वि० सं०) केवल हिन्दी (कोड 1159, 1160) वि० सं०, केवल अंग्रेजी-अनुवाद (कोड 28) केवल हिन्दी, (कोड 1608) केवल गुजराती, (कोड 29) मूल, मोटा टाइप, संस्कृत, ग्रन्थाकार (कोड 1573) मूल, मोटा टाइप, तेलुगु, ग्रन्थाकार (कोड 124) मूल मझला आकार, (कोड 1855) विशिष्ट सं० मूल मझला संस्कृतमें भी। संक्षिप्त शिवपुराण, मोटा टाइप (कोड 789) ग्रन्थाकार - इस पुराणमें परात्पर ब्रह्म शिवके कल्याणकारी स्वरूपका तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा और उपासनाका विस्तृत वर्णन है। सचित्र, सजिल्द, विशिष्ट संस्करण (कोड 1468) हिन्दी एवं (कोड 1286) गुजरातीमें भी उपलब्ध। संक्षिप्त पद्मपुराण (कोड 44) ग्रन्थाकार - इस पुराणमें भगवान् विष्णुकी विस्तृत महिमाके साथ, भगवान् श्रीराम तथा श्रीकृष्णके चरित्र, विभिन्न तीर्थोंका माहात्म्य, शालग्रामका स्वरूप, तुलसी-महिमा, गीता माहात्म्य, विष्णुसहस्रनाम, उपासना-विधि तथा विभिन्न व्रतोंका सुन्दर वर्णन है। सचित्र, सजिल्द। संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण (कोड 539) ग्रन्थाकार - भगवतीकी विस्तृत महिमाका परिचय देनेवाले इस पुराणमें दुर्गासप्तशतीकी कथा एवं माहात्म्य, हरिश्चन्द्रकी कथा, मदालसा-चरित्र, अत्रि-अनसूयाकी कथा, दत्तात्रेय- चरित्र आदि अनेक सुन्दर कथाओंका विस्तृत वर्णन है। सचित्र, सजिल्द। श्रीविष्णुपुराण, अनुवादसहित (कोड 48) ग्रन्थाकार - इसके प्रतिपाद्य भगवान् विष्णु हैं, जो सृष्टिके आदिकारण, नित्य, अक्षय, अव्यय तथा एकरस हैं। इसमें आकाश आदि भूतोंका परिमाण, समुद्र, सूर्य आदिका परिमाण, पर्वत, देवतादिकी उत्पत्ति, मन्वन्तर, कल्प-विभाग, सम्पूर्ण धर्म एवं देवर्षि तथा राजर्षियोंके चरित्रका विशद वर्णन है। सचित्र, सजिल्द (कोड 1364) केवल हिन्दी अनुवादमें भी उपलब्ध। संक्षिप्त नारदपुराण (कोड 1183) ग्रन्थाकार - इसमें सदाचार-महिमा, वर्णाश्रम धर्म, भक्ति तथा भक्तके लक्षण, देवपूजन, तीर्थ-माहात्म्य, दान-धर्मके माहात्म्य और भगवान् विष्णुकी महिमाके साथ अनेक भक्तिपरक उपाख्यानोंका विस्तृत वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द। संक्षिप्त स्कन्दपुराण (कोड 279) ग्रन्थाकार - यह पुराण कलेवरकी दृष्टिसे सबसे बड़ा है तथा इसमें लौकिक और पारलौकिक ज्ञानके अनन्त उपदेश भरे हैं। इसमें भगवान् शिवकी महिमा, सती-चरित्र, शिव- पार्वती-विवाह, कार्तिकेय-जन्म, तारकासुर-वध एवं धर्म, सदाचार, योग, ज्ञान तथा भक्तिके सुन्दर विवेचनके साथ-साथ अनेको साधु-महात्माओंके सुन्दर चरित्र पिरोये गये हैं। सचित्र, सजिल्द। संक्षिप्त ब्रह्मपुराण (कोड 1111) ग्रन्थाकार - इस पुराणमें सृष्टिकी उत्पत्ति, पृथुका पावन चरित्र, सूर्य एवं चन्द्रवंशका वर्णन, श्रीकृष्णचरित्र, कल्पान्तजीवी मार्कण्डेय मुनिका चरित्र, तीर्थोंका माहात्म्य एवं अनेक भक्तिपरक आख्यानोंकी सुन्दर चर्चा की गयी है। सचित्र, सजिल्द। संक्षिप्त गरुडपुराण- (कोड 1189) ग्रन्थाकार - इस पुराणके अधिष्ठातृ देव भगवान् विष्णु हैं। इसमें ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, सदाचार, निष्काम कर्मकी महिमाके साथ यज्ञ, दान, तप, तीर्थ आदि शुभ कर्मोंमें सर्व साधारणको प्रवृत्त करनेके लिये अनेक लौकिक एवं पारलौकिक फलोंका वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द। संक्षिप्त भविष्यपुराण - (कोड 584) ग्रन्थाकार - यह पुराण विषय-वस्तु एवं वर्णन शैलीकी दृष्टिसे अत्यन्त उच्च कोटिका है। इसमें धर्म, सदाचार, नीति, उपदेश, अनेक आख्यान, व्रत, तीर्थ, दान, ज्योतिष एवं आयुर्वेदशास्त्रके विषयोंका अद्भुत संग्रह है। वेताल-विक्रम-संवादके रूपमें कथा-प्रबन्ध इसमें अत्यन्त रमणीय है। इसके अतिरिक्त इसमें नित्यकर्म, सामुद्रिक शास्त्र, शान्ति तथा पौष्टिक कर्मका भी वर्णन है। सचित्र, सजिल्द। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
संक्षिप्त श्रीवराहपुराण (कोड 1361) ग्रन्थाकार— इस पुराणमें भगवान् श्रीहरिके वराह-अवतारकी मुख्य कथाके साथ-साथ अनेक तीर्थ, व्रत, यज्ञ, दान आदिका विस्तृत वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द। संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण (कोड 631) ग्रन्थाकार— इस पुराणमें चार खण्ड हैं—ब्रह्मखण्ड, प्रकृतिखण्ड, श्रीकृष्णजन्मखण्ड और गणेशखण्ड। इसमें भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओंका विस्तृत वर्णन, अनेक रोचक एवं रहस्यमयी कथाएँ, श्रीराधाकी गोलोक-लीला तथा अवतार-लीलाका सुन्दर विवेचन किया गया है। सचित्र, सजिल्द। वामनपुराण, अनुवादसहित (कोड 1432) ग्रन्थाकार— यह पुराण मुख्यरूपसे त्रिविक्रम भगवान् विष्णुके दिव्य माहात्म्यका व्याख्याता है। इसमें भगवान् वामन, नर-नारायण, भगवती दुर्गाके उत्तम चरित्रके साथ-साथ भक्त प्रह्लाद तथा श्रीदामा आदि भक्तोंके बड़े रम्य आख्यान हैं। सचित्र, सजिल्द। अग्निपुराण, केवल हिन्दी-अनुवाद (कोड 1362) ग्रन्थाकार— इसमें परा-अपरा विद्याओंका वर्णन, महाभारतके सभी पर्वोंकी संक्षिप्त कथा, रामायणकी संक्षिप्त कथा, मत्स्य, कूर्म आदि अवतारोंकी कथाएँ, वास्तु-पूजा, विभिन्न देवताओंके मन्त्र आदि अनेक उपयोगी विषयोंका अत्यन्त सुन्दर प्रतिपादन किया गया है। सचित्र, सजिल्द। मत्स्यमहापुराण, अनुवादसहित (कोड 557)— यह पुराण मत्स्यावतारके रूपमें भगवान् विष्णुकी लीलाओंका सुन्दर परिचायक है। इसमें मत्स्यावतारकी कथा, सृष्टि-वर्णन, मन्वन्तर तथा पितृवंश-वर्णन, ययाति- चरित्र, राजनीति, यात्राकाल, स्वप्नशास्त्र, शकुन-शास्त्र आदि अनेक विषयोंका सरल वर्णन किया गया है। इस पुराणका पठन-पाठन आयुकी वृद्धि करनेवाला, कीर्तिवर्धक तथा पापोंका नाशक है। सचित्र, सजिल्द। कूर्मपुराण, अनुवादसहित (कोड 1131)— इस पुराणमें भगवान्के कूर्मावतारकी कथाके साथ-साथ सृष्टि वर्णन, वर्ण, आश्रम और उनके कर्तव्यका वर्णन, युगधर्म, मोक्षके साधन, तीर्थ-माहात्म्य, २८ व्यासोंकी कथाएँ, ईश्वर-गीता, व्यास-गीता आदि विविध विषयोंका अत्यन्त सुन्दर प्रतिपादन किया गया है। विभिन्न कथाओं एवं रोचक उपाख्यानोंके द्वारा इसमें ज्ञान और भक्तिकी सरस व्याख्या की गयी है। विभिन्न दृष्टियोंसे इस पुराणका पठन-पाठन सबके लिये कल्याणकारी है। सचित्र, सजिल्द। संक्षिप्त श्रीमद्देवीभागवत-मोटा टाइप (कोड 1133) ग्रन्थाकार— यह पुराण परम पवित्र वेदकी प्रसिद्ध श्रुतियोंके अर्थसे अनुमोदित, अखिल शास्त्रोंके रहस्यका स्रोत तथा आगमोंमें अपना प्रसिद्ध स्थान रखता है। यह सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, वंशानुकीर्ति, मन्वन्तर आदि पाँचों लक्षणोंसे पूर्ण है। पराम्बा भगवतीके पवित्र आख्यानोंसे युक्त इस पुराणका पठन-पाठन तथा अनुष्ठान भक्तोंके त्रितापोंका शमन करनेवाला तथा सिद्धियोंका प्रदाता है। सचित्र, सजिल्द (कोड 1326) गुजराती, (कोड 1897, 1898) सटीक। नरसिंहपुराणम् (कोड 1113) ग्रन्थाकार— इस पुराणमें दशावतारकी कथाएँ एवं सात काण्डोंमें भगवान् श्रीरामके पावन चरित्रके साथ-साथ सदाचार, राजनीति, वर्णधर्म, आश्रम-धर्म, योग-साधना आदिका सुन्दर विवेचन किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें भगवान् नरसिंहकी विस्तृत महिमा, अनेक कल्याणप्रद उपाख्यानोंका वर्णन, भौगोलिक वर्णन, सूर्य-चन्द्रादिसे उत्पन्न राजवंशोंका वर्णन तथा अनेक स्तुतियोंका उल्लेख है। सचित्र, सजिल्द। महाभारत-खिलभाग हरिवंशपुराण (कोड 38) ग्रन्थाकार— हरिवंशपुराण वेदार्थ-प्रकाशक महाभारत ग्रन्थका अन्तिम पर्व है। पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे हरिवंशपुराणके श्रवणकी परम्परा भारतवर्षमें चिरकालसे प्रचलित है। अनन्त भावुक धर्मपरायण लोग इसके श्रवणसे पुत्र-प्राप्तिका लाभ प्राप्त कर चुके हैं। भगवद्भक्ति तथा प्रेरणादायी कथानकोंकी दृष्टिसे भी इसका बड़ा महत्त्व है। भगवान् श्रीकृष्णसे सम्बन्धित अगणित कथाएँ इसमें ऐसी हैं, जो अन्यत्र दुर्लभ हैं। धार्मिक जन-सामान्यके कल्याणार्थ इसके अन्तमें सन्तानगोपाल- मन्त्र, अनुष्ठान-विधि, सन्तान-गोपाल-यन्त्र तथा संतान-गोपालस्तोत्र भी संगृहीत हैं। सचित्र, सजिल्द। (कोड 1589) केवल हिन्दीमें भी। महाभागवत [ देवीपुराण ], अनुवादसहित (कोड 1610) ग्रन्थाकार— इस पुराणमें मुख्य रूपसे भगवती महाशक्तिके माहात्म्य एवं उनके विभिन्न चरित्रोंका विस्तृत वर्णन है। इसमें मूल प्रकृति भगवतीके गङ्गा, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती, तुलसी आदि रूपोंमें विवर्तित होनेके मनोरम आख्यान हैं। सचित्र, सजिल्द।
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