संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 313, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें३०२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६८ ज्योतिष्टोमफलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते। एतत्पवित्रं पूज्यं च न वाच्यमकृतात्मनाम्॥ ७ द्विजानां विष्णुभक्तानां श्राव्यमेतन्न संशयः। एतत्पुराणश्रवणमिहामुत्र सुखप्रदम्॥ ८ वदतां शृण्वतां सद्यः सर्वपापप्रणाशनम्। बहुनात्र किमुक्तेन भूयो भूयो मुनीश्वराः॥ ९ श्रद्धयाश्रद्धया वापि श्रोतव्यमिदमुत्तमम्। भारद्वाजमुखाः सर्वे कृतकृत्या द्विजोत्तमाः॥ १० सूतं हृष्टाः प्रपूज्याथ सर्वे स्वस्वाश्रमं ययुः॥ ११ वह ज्योतिष्टोम यज्ञका फल प्राप्तकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ १-६१/२॥ यह पुराण परम पवित्र और आदरणीय है। इसे अजितेन्द्रिय पुरुषोंको तो कभी नहीं सुनाना चाहिये, परंतु विष्णुभक्त द्विजोंको निस्संदेह इसका श्रवण करना चाहिये। इस पुराणका श्रवण इस लोक और परलोकमें भी सुख देनेवाला है। यह वक्ताओं और श्रोताओंके पापको तत्काल नष्ट कर देता है। मुनीश्वरगण! इस विषयमें बहुत कहनेकी क्या आवश्यकता है। श्रद्धासे हो या अश्रद्धासे, इस उत्तम पुराणका श्रवण करना ही चाहिये। इस पुराणको सुनकर भरद्वाज आदि द्विजश्रेष्ठगण कृतार्थ हो गये। उन्होंने हर्षपूर्वक सूतजीका समादर किया। फिर सब लोग अपने-अपने आश्रमको चले गये॥ ७-११॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सूतभरद्वाजादिसंवादे सर्वदुःखोपहरं श्रीनरसिंहपुराणस्य माहात्म्यं समाप्तम्॥ ६८॥ इस प्रकार सूत-भरद्वाजादि-संवादरूप श्रीनरसिंहपुराणमें इसके 'सर्वदुःखहारी माहात्म्यका वर्णन' नामक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६८॥