संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 32, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७ ] मार्कण्डेयजीके द्वारा तपस्यापूर्वक श्रीहरिकी आराधना; 'मृत्युञ्जय-स्तोत्र'का पाठ २९ अभिवाद्य यथान्यायं मुनींश्चैव स धार्मिकः। कृताञ्जलिपुटो भूत्वा तस्थौ तत्पुरतो दमी॥ २६ गतायुषं ततो दृष्ट्वा पौत्रं बालं महामतिः। भृगुराह महाभागं मार्कण्डेयं तदा शिशुम्॥ २७ किमागतोऽसि पुत्रात्र पितुस्ते कुशलं पुनः। मातुश्च बान्धवानां च किमागमनकारणम्॥ २८ इत्येवमुक्तो भृगुणा मार्कण्डेयो महामतिः। उवाच सकलं तस्मै आदेशिवचनं तदा॥ २९ पौत्रस्य वचनं श्रुत्वा भृगुस्तु पुनरब्रवीत्। एवं सति महाबुद्धे किं त्वं कर्म चिकीर्षसि ॥ ३० मार्कण्डेय उवाच भूतापहारिणं मृत्युं जेतुमिच्छामि साम्प्रतम्। शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि तत्रोपायं वदस्व नः ॥ ३१ भृगुरुवाच नारायणमनाराध्य तपसा महता सुत। को जेतुं शक्नुयान्मृत्युं तस्मात्तं तपसार्चय ॥ ३२ तमनन्तमजं विष्णुमच्युतं पुरुषोत्तमम्। भक्तप्रियं सुरश्रेष्ठं भक्त्या त्वं शरणं व्रज ॥ ३३ तमेव शरणं पूर्वं गतवान्नारदो मुनिः। तपसा महता वत्स नारायणमनामयम् ॥ ३४ तत्प्रसादान्महाभाग नारदो ब्रह्मणः सुतः। जरां मृत्युं विजित्याशु दीर्घायुर्वर्धते सुखम्॥ ३५ तमृते पुण्डरीकाक्षं नारसिंहं जनार्दनम्। कः कुर्यान्मानवो वत्स मृत्युसत्तानिवारणम्॥ ३६ तमनन्तमजं विष्णुं कृष्णं जिष्णुं श्रियः पतिम्। गोविन्दं गोपतिं देवं सततं शरणं व्रज ॥ ३७ नरसिंहं महादेवं यदि पूजयसे सदा। वत्स जेतासि मृत्युं त्वं सततं नात्र संशयः ॥ ३८ व्यास उवाच उक्तः पितामहेनैवं भृगुणा पुनरब्रवीत्। मार्कण्डेयो महातेजा विनयात् स्वपितामहम् ॥ ३९ साथ विराजमान अपने पितामह धर्मात्मा भृगुजीका दर्शन किया। उनके साथ ही अन्य ऋषियोंका भी यथोचित अभिवादन करके धर्मपरायण मार्कण्डेयजी मनोनिग्रहपूर्वक दोनों हाथ जोड़कर भृगुजीके समक्ष खड़े हो गये। महामति भृगुजीने अपने बालक पौत्र महाभाग मार्कण्डेयको, जिसकी आयु प्रायः बीत चुकी थी, देखकर कहा— 'वत्स! तुम यहाँ कैसे आये? अपने माता-पिता और बान्धवजनोंका कुशल कहो तथा यह भी बतलाओ कि यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है?' भृगुजीके इस प्रकार पूछनेपर महाप्राज्ञ मार्कण्डेयजीने उनसे उस समय ज्योतिषीकी कही हुई सारी बात कह सुनायी। पौत्रकी बात सुनकर भृगुजीने पुनः कहा—'महाबुद्धे! ऐसी स्थितिमें तुम कौन-सा कर्म करना चाहते हो?'॥ २४-३०॥ मार्कण्डेयजी बोले- भगवन्! मैं इस समय प्राणियोंका अपहरण करनेवाले मृत्युको जीतना चाहता हूँ, इसलिये आपकी शरणमें आया हूँ। इस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये आप मुझे कोई उपाय बतायें ॥ ३१ ॥ भृगुजी बोले- पुत्र ! बहुत बड़ी तपस्याके द्वारा भगवान् नारायणकी आराधना किये बिना कौन मृत्युको जीत सकता है? इसलिये तुम तपस्याद्वारा उन्हींका अर्चन करो। भक्तोंके प्रियतम और देवताओंमें सर्वश्रेष्ठ उन अनन्त, अजन्मा, अच्युत पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुकी शरणमें जाओ। वत्स ! पूर्वकालमें नारदमुनि भी महान् तपके द्वारा उन्हीं अनामय भगवान् नारायणकी शरणमें गये थे। महाभाग! ब्रह्मपुत्र नारदजी उन्हींकी कृपासे जरा और मृत्युको शीघ्र ही जीतकर दीर्घायु हो सुखपूर्वक रहते हैं। पुत्र! उन कमललोचन नृसिंहस्वरूप भगवान् जनार्दनके बिना कौन मनुष्य यहाँ मृत्युकी सत्ताका निवारण कर सकता है? तुम निरन्तर उन्हीं अनन्त, अजन्मा, विजयी, कृष्णवर्ण, लक्ष्मीपति, गोविन्द, गोपति भगवान् विष्णुकी शरणमें जाओ! वत्स ! यदि तुम सदा उन महान् देवता भगवान् नरसिंहकी पूजा करते रहोगे तो सदाके लिये मृत्युपर विजय प्राप्त कर लोगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ३२-३८॥ व्यासजी बोले- पितामह भृगुके इस प्रकार कहनेपर महान् तेजस्वी मार्कण्डेयजीने उनसे विनयपूर्वक कहा ॥ ३९ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth