संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 33, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें३० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ७ मार्कण्डेय उवाच आराध्यः कथितस्तात विष्णुर्विश्वेश्वरः प्रभुः। कथं कुत्र मया कार्यमच्युताराधनं गुरो। येनासौ मम तुष्टस्तु मृत्युं सद्योऽपनेष्यति॥ ४० भृगुरुवाच तुङ्गभद्रेति विख्याता या नदी सह्यपर्वते। तत्र भद्रवटे वत्स त्वं प्रतिष्ठाप्य केशवम्॥ ४१ आराध्य जगन्नाथं गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्। हृदि कृत्वेन्द्रियग्रामं मनः संयम्य तत्त्वतः॥ ४२ हृत्पुण्डरीके देवेशं शङ्खचक्रगदाधरम्। ध्यायन्नेकमना वत्स द्वादशाक्षरमभ्यसन्॥ ४३ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। इमं मन्त्रं हि जपतो देवदेवस्य शार्ङ्गिणः॥ प्रीतो भवति विश्वात्मा मृत्युं येनापनेष्यति॥ ४४ व्यास उवाच इत्युक्तस्तं प्रणम्याथ स जगाम तपोवनम्॥ ४५ सह्यपादोद्भवोवायास्तु भद्रायास्तटमुत्तमम्। नानाद्रुमलताकीर्णं नानापुष्पोपशोभितम्॥ ४६ गुल्मवेणुलताकीर्णं नानामुनिजनाकुलम्। तत्र विष्णुं प्रतिष्ठाप्य गन्धधूपादिभिः क्रमात्॥ ४७ पूजयामास देवेशं मार्कण्डेयो महामुनिः। पूजयित्वा हरिं तत्र तपस्तेपे सुदुष्करम्॥ ४८ निराहारो मुनिस्तत्र वर्षमेकममन्द्रितः। मात्रोक्तकाले त्वासन्ने दिने तत्र महामतिः॥ ४९ स्नात्वा यथोक्तविधिना कृत्वा विष्णोस्तथार्चनम्। हृदि कृत्वेन्द्रियग्रामं विशुद्धेनान्तरात्मना॥ ५० आसनं स्वस्तिकं बद्ध्वा कृत्वासौ प्राणसंयमम्। ॐकारोच्चारणाद्धीमान् हृत्पद्मं स विकासयन्॥ ५१ तन्मध्ये रविसोमाग्निमण्डलानि यथाक्रमम्। कल्पयित्वा हरेः पीठं तस्मिन् देशे सनातनम्॥ ५२ हिन्दी अनुवाद: मार्कण्डेयजी बोले—तात! गुरो! आपने विश्वपति भगवान् विष्णुको आराध्य तो बतलाया, परंतु मैं उन अच्युतकी आराधना कहाँ और किस प्रकार करूँ? जिससे वे शीघ्र प्रसन्न होकर मेरी मृत्युको दूर कर दें॥ ४०॥ भृगुजी बोले—सह्यपर्वतपर जो 'तुङ्गभद्रा' नामसे विख्यात नदी है, वहाँ 'भद्रवट' नामक वृक्षके नीचे जगन्नाथ भगवान् केशवकी स्थापना कर क्रमशः गन्ध और पुष्प आदिसे उनकी पूजा करो। इन्द्रियोंको मनमें नियन्त्रित कर, मनको भी पूर्णतः संयममें रखते हुए एकाग्रचित्त हो, 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'—इस द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करो और अपने हृदयकमलमें शङ्ख, चक्र, गदा (एवं पद्म) धारण किये देवेश्वर भगवान् विष्णुका ध्यान किया करो। जो देवाधिदेव शार्ङ्गधन्वा विष्णुके इस द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करता है, उसके ऊपर वे विश्वात्मा प्रसन्न होते हैं। तुम भी इसका जप करो, जिससे प्रसन्न होकर वे तुम्हारी मृत्यु दूर कर देंगे॥ ४१–४४॥ व्यासजी कहते हैं—वत्स! भृगुजीके इस प्रकार कहनेपर उन्हें प्रणाम करके मार्कण्डेयजी सह्यपर्वतकी शाखासे निकली हुई तुङ्गभद्राके उत्तम तटपर विविध प्रकारके वृक्ष और लताओंसे भरे हुए नाना भाँतिके पुष्पोंसे सुशोभित, गुल्म, लता और वेणुओंसे व्याप्त तथा अनेकानेक मुनिजनोंसे पूर्ण तपोवनमें गये। वहाँ वे महामुनिने देवेश्वर भगवान् विष्णुकी स्थापना करके क्रमशः गन्ध-धूप आदिसे उनकी पूजा करने लगे। भगवान्की पूजा करते हुए वहाँ उन्होंने निरालस्यभावसे निराहार रहकर सालभर अत्यन्त दुष्कर तप किया। माताका बतलाया हुआ समय निकट आनेपर उस दिन महामति मार्कण्डेयजीने वहाँ स्नान करके पूर्वोक्त विधिसे विष्णुकी पूजा की और स्वस्तिकासन बाँध इन्द्रियसम्मूहको मनमें संयत कर विशुद्ध अन्तःकरणसे युक्त हो प्राणायाम किया। फिर ॐकारके उच्चारणसे हृदयकमलको विकसित करते हुए उसके मध्यभागमें क्रमशः सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्निमण्डलकी कल्पना करके भगवान् विष्णुका पीठ निश्चित किया और उस स्थानपर In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth