भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 34

अध्याय ७ ] मार्कण्डेयजीके द्वारा तपस्यापूर्वक श्रीहरिकी आराधना; 'मृत्युञ्जय-स्तोत्र'का पाठ ३१ पीताम्बरधरं कृष्णं शङ्खचक्रगदाधरम्। भावपुष्पैः समभ्यर्च्य मनस्तस्मिन्निवेश्य च ॥ ५३ ब्रह्मरूपं हरिं ध्यायंस्ततो मन्त्रमुदीरयत्। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ ५४ व्यास उवाच इत्येवं ध्यायत्तस्तस्य मार्कण्डेयस्य धीमतः। मनस्तत्रैव संलग्नं देवदेवे जगत्पतौ ॥ ५५ ततो यमाज्ञया तत्र आगता यमकिंकराः। पाशहस्तास्तु तं नेतुं विष्णुदूतैस्तु ते हताः ॥ ५६ शूलैः प्रहन्यमानास्तु द्विजं मुक्त्वा ययुस्तदा। वयं निवृत्य गच्छामो मृत्युरेवागमिष्यति ॥ ५७ विष्णुदूता ऊचुः यत्र नः स्वामिनो नाम लोकनाथस्य शार्ङ्गिणः। को यमस्तत्र मृत्युर्वा कालः कलयतां वरः ॥ ५८ व्यास उवाच आगत्य स्वयमेवाह मृत्युः पार्श्वं महात्मनः। मार्कण्डेयस्य बभ्राम विष्णुकिंकरशङ्कया ॥ ५९ तेऽप्युद्यम्य्याशु मुशलानायसान् विष्णुकिंकराः। विष्ण्वाज्ञया हनिष्यामो मृत्युमद्येति संस्थिताः ॥ ६० ततो विष्ण्वर्पितमना मार्कण्डेयो महामतिः। तुष्टाव प्रणतो भूत्वा देवदेवं जनार्दनम् ॥ ६१ विष्णुनैवोदितं यत्तत्स्तोत्रं कर्णे महात्मनः। सुभाषितेन मनसा तेन तुष्टाव माधवम् ॥ ६२ मार्कण्डेय उवाच नारायणं सहस्राक्षं पद्मनाभं पुरातनम्। प्रणतोऽस्मि हृषीकेशं किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६३ गोविन्दं पुण्डरीकाक्षमनन्तमजमव्ययम्। केशवं च प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६४ वासुदेवं जगद्योनिं भानुवर्णमतीन्द्रियम्। दामोदरं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६५ पीताम्बर तथा शङ्ख, चक्र, गदा धारण करनेवाले सनातन भगवान् श्रीकृष्णकी भावमय पुष्पोंसे पूजा करके उनमें अपने चित्तको लगा दिया। फिर उन ब्रह्म-स्वरूप श्रीहरिका ध्यान करते हुए वे 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'-इस मन्त्रका जप करने लगे ॥ ५३-५४॥ व्यासजी कहते हैं—शुकदेव ! इस प्रकार ध्यान करते हुए बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीका मन उन देवाधिदेव जगदीश्वरमें लीन हो गया। तदनन्तर यमराजकी आज्ञासे उन्हें ले जानेके लिये हाथोंमें पाश लिये हुए यमदूत वहाँ आये; परंतु भगवान् विष्णुके दूतोंने उन्हें मार भगाया। शूलोंसे मारे जानेपर वे उस समय विप्रवर मार्कण्डेयको छोड़कर भाग चले और यह कहते गये कि 'हमलोग तो लौटकर चले जा रहे हैं, परंतु अब साक्षात् मृत्युदेव ही यहाँ आयेंगे' ॥ ५५-५७॥ विष्णुदूत बोले—जहाँ हमारे स्वामी जगदीश्वर शार्ङ्गधन्वा भगवान् विष्णुका नाम जपा जाता हो, वहाँ उनकी क्या बिसात है? ग्रसनेवालोंमें श्रेष्ठ काल, मृत्यु अथवा यमराज कौन होते हैं? ॥ ५८॥ व्यासजी कहते हैं—यमदूतोंके लौटनेके बाद साक्षात् मृत्युने ही वहाँ आकर उन्हें यमलोक चलनेको कहा, परंतु श्रीविष्णुदूतोंके डरसे वे महात्मा मार्कण्डेयके आसपास ही घूमते रह गये; उन्हें स्पर्श करनेका साहस न कर सके। इधर विष्णुदूत भी शीघ्र ही लोहेके मूसल उठाकर खड़े हो गये। उन्होंने अपने मनमें यह निश्चय कर लिया था कि 'आज हमलोग विष्णुकी आज्ञासे मृत्युका वध कर डालेंगे।' तत्पश्चात् महामति मार्कण्डेयजी भगवान् विष्णुमें चित्त लगाये उन देवाधिदेव जनार्दनको प्रणाम करते हुए स्तुति करने लगे। भगवान् विष्णुने ही वह स्तोत्र उन महात्माके कानमें कह दिया। उसी सुभाषित स्तोत्रद्वारा उन्होंने मनोयोगपूर्वक भगवान् लक्ष्मीपतिकी स्तुति की ॥ ५९-६२॥ मार्कण्डेयजी बोले—जो सहस्रों नेत्रोंसे युक्त, इन्द्रियोंके स्वामी, पुरातन पुरुष तथा पद्मनाभ (अपनी नाभिसे ब्रह्माण्डमय कमलको प्रकट करनेवाले) हैं, उन श्रीनारायणदेवको मैं प्रणाम करता हूँ। मृत्यु मेरा क्या कर लेगा? मैं अनन्त, अजन्मा, अविकारी, गोविन्द, कमलनयन भगवान् केशवकी शरणमें आ गया हूँ; अब मृत्यु मेरा क्या करेगा? मैं संसारकी उत्पत्तिके स्थान, सूर्यके समान प्रकाशमान्, इन्द्रियातीत वासुदेव (सर्वव्यापी देवता) भगवान् दामोदरकी शरणमें आ गया In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth