भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 35

३२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ७ शङ्खचक्रधरं देवं छन्नरूपिणमव्ययम्। हूँ; मृत्यु मेरा क्या कर सकेगा? जिनका स्वरूप अव्यक्त अधोक्षजं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६६ है, जो विकारोंसे रहित हैं, उन शङ्ख-चक्रधारी भगवान् अधोक्षजकी मैं शरणमें आ गया; मृत्यु मेरा क्या कर वाराहं वामनं विष्णुं नरसिंहं जनार्दनम्। लेगा? मैं वाराह, वामन, विष्णु, नरसिंह, जनार्दन एवं माधवं च प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६७ माधवकी शरणमें हूँ; मृत्यु मेरा क्या कर सकेगा? मैं पवित्र, पुष्कररूप अथवा पुष्कल (पूर्ण) रूप, कल्याणबीज, पुरुषं पुष्करं पुण्यं क्षेमबीजं जगत्पतिम्। जगत्-प्रतिपालक एवं लोकनाथ भगवान् पुरुषोत्तमकी लोकनाथं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६८ शरणमें आ गया हूँ; अब मृत्यु मेरा क्या करेगा? जो समस्त भूतोंके आत्मा, महात्मा (परमात्मा) एवं जगत्की भूतात्मानं महात्मानं जगद्योनिमयोनिजम्। योनि (उत्पत्तिके स्थान) होते हुए भी स्वयं अयोनिज हैं, विश्वरूपं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६९ उन भगवान् विश्वरूपकी मैं शरणमें आया हूँ; मृत्यु मेरा क्या कर सकेगा? जिनके सहस्रों मस्तक हैं, जो व्यक्ताव्यक्त सहस्रशिरसं देवं व्यक्ताव्यक्तं सनातनम्। स्वरूप हैं, उन महायोगी सनातन देवकी मैं शरणमें आया महायोगं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ७० हूँ; अब मृत्यु मेरा क्या कर सकेगा? ॥ ६३–७० ॥ इत्युदीरितमाकर्ण्य स्तोत्रं तस्य महात्मनः। महात्मा मार्कण्डेयके द्वारा उच्चारित हुए उस स्तोत्रको अपयातस्ततो मृत्युर्विष्णुदूतैश्च पीडितः ॥ ७१ सुनकर विष्णुदूतोंद्वारा पीड़ित हुए मृत्युदेव वहाँसे भाग चले। इस प्रकार बुद्धिमान् मार्कण्डेयने मृत्युपर इति तेन जितो मृत्युर्मार्कण्डेयेन धीमता। विजय पायी। सच है, कमललोचन भगवान् नृसिंहके प्रसन्ने पुण्डरीकाक्षे नृसिंहे नास्ति दुर्लभम् ॥ ७२ प्रसन्न होनेपर कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता। स्वयं भगवान् विष्णुने ही मार्कण्डेयजीके हितके लिये मृत्युको मृत्युञ्जयमिदं पुण्यं मृत्युप्रशमनं शुभम्। शान्त करनेवाले इस परम पावन मङ्गलमय मृत्युञ्जय- मार्कण्डेयहितार्थाय स्वयं विष्णुरुवाच ह ॥ ७३ स्तोत्रका उपदेश दिया था। जो नित्य नियमपूर्वक पवित्रभावसे भक्तियुक्त होकर सायं, प्रातः और मध्याह्न— य इदं पठते भक्त्या त्रिकालं नियतः शुचिः। तीनों समय इस स्तोत्रका पाठ करता है, भगवान् नाकाले तस्य मृत्युः स्यान्नरस्याच्युतचेतसः ॥ ७४ अच्युतमें चित्त लगानेवाले उस पुरुषका अकालमरण नहीं होता। योगी मार्कण्डेयने अपने हृदय-कमलमें हृत्पद्ममध्ये पुरुषं पुराणं सूर्यसे भी अधिक प्रकाशमान सनातन पुराण-पुरुष नारायणं शाश्वतमादिदेवम्। आदिदेव नारायणका चिन्तन करके तत्काल मृत्युपर संचिन्त्य सूर्यादपि राजमानं मृत्युं स योगी जितवांस्तदैव ॥ ७५ विजय प्राप्त कर ली ॥ ७१–७५ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे मार्कण्डेयमृत्युञ्जयो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'मार्कण्डेयकी मृत्युपर विजय' नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥