भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 318 में से

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पृष्ठ 44

अध्याय ८ ] मृत्यु और दूतोंको समझाते हुए यमका उन्हें वैष्णवोंके पास जानेसे रोकना ३३ आठवाँ अध्याय मृत्यु और दूतोंको समझाते हुए यमका उन्हें वैष्णवोंके पास जानेसे रोकना; उनके मुँहसे श्रीहरिके नामकी महिमा सुनकर नरकस्थ जीवोंका भगवान्‌को नमस्कार करके श्रीविष्णुके धाममें जाना

श्रीव्यास उवाच मृत्युश्च किंकराश्चैव विष्णुदूतैः प्रपीडिताः। स्वराज्ञस्तेऽनु निर्वेशं गत्वा ते चुक्रुशुर्भृशम् ॥ १

श्रीव्यासजी बोले—विष्णुदूतोंके द्वारा अत्यन्त पीड़ित हुए मृत्युदेव और यमदूत अपने राजा यमके भवनमें जाकर बहुत रोने-कलपने लगे॥ १॥

मृत्युकिंकरा ऊचुः शृणु राजन् वचोऽस्माकं तवाग्रे यद् ब्रवीमहे । त्वदादेशाद्वयं गत्वा मृत्युं संस्थाप्य दूरतः ॥ २ ब्राह्मणस्य समीपं च भृगोः पौत्रस्य सत्तम। तं ध्यायमानं कमपि देवमेकाग्रमानसम् ॥ ३ गन्तुं न शक्तास्तत्पार्श्वं वयं सर्वे महामते। यावत्तावन्महाकायैः पुरुषैर्मुशलैर्हताः ॥ ४ वयं निवृत्तास्तद्वीक्ष्य मृत्युस्तत्र गतः पुनः। अस्मान्निर्भर्त्स्य तत्रायं तैनैरैर्मुशलैर्हतः ॥ ५ एवमत्र तमानेतुं ब्राह्मणं तपसि स्थितम्। अशक्ता वयमेवात्र मृत्युना सह वै प्रभो ॥ ६ तद्ब्रवीहि महाभाग यद्ब्रह्म ब्राह्मणस्य तु। देवं कं ध्यायते विप्रः के वा ते यैर्हता वयम् ॥ ७

मृत्यु और यमदूत बोले—राजन् ! आपके आगे हम जो कुछ कह रहे हैं, हमारी इन बातोंको आप सुनें। हमलोगोंने आपकी आज्ञाके अनुसार यहाँसे जाकर मृत्युको तो दूर ठहरा दिया और स्वयं भृगुके पौत्र ब्राह्मण मार्कण्डेयके समीप गये। परंतु सत्पुरुषशिरोमणे ! वह उस समय एकाग्रचित्त होकर किसी देवताका ध्यान कर रहा था। महामते! हम सभी लोग उसके पासतक पहुँचने भी नहीं पाये थे कि बहुत-से महाकाय पुरुष मूसलसे हमें मारने लगे। तब हमलोग तो लौट पड़े, परंतु यह देखकर मृत्युदेव वहाँ फिर पधारे। तब हमें डाँट-फटकारकर उन लोगोंने इन्हें भी मूसलोंसे मारा। प्रभो! इस प्रकार तपस्यामें स्थित हुए उस ब्राह्मणको यहाँतक लानेमें मृत्युसहित हम सब लोग समर्थ न हो सके। महाभाग ! उस ब्राह्मणका जो तप है, उसे आप बतलाइये, वह किस देवताका ध्यान कर रहा था और जिन लोगोंने हमें मारा, वे कौन थे ? ॥ २-७ ॥

व्यास उवाच इत्युक्तः किंकरैः सर्वैर्मृत्युना च महामते। ध्यात्वा क्षणं महाबुद्धिः प्राह वैवस्वतो यमः ॥ ८

व्यासजी कहते हैं—महामते ! मृत्यु तथा समस्त दूतोंके इस प्रकार कहनेपर महाबुद्धि सूर्यकुमार यमने क्षणभर ध्यान करके कहा ॥ ८ ॥

यम उवाच शृण्वन्तु किंकराः सर्वे मृत्युश्चान्ये च मे वचः। सत्यमेतत्प्रवक्ष्यामि ज्ञानं यद्योगमार्गतः ॥ ९ भृगोः पौत्रो महाभागो मार्कण्डेयो महामतिः । स ज्ञात्वाद्यात्मनः कालं गतो मृत्युजिगीषया ॥ १० भृगुणोक्तेन मार्गेण स तेपे परमं तपः। हरिमाराध्य मेधावी जपन् वै द्वादशाक्षरम् ॥ ११

यम बोले—मृत्यु तथा मेरे अन्य सभी किंकर आज मेरी बात सुनें—योगमार्ग (समाधि)-के द्वारा मैंने इस समय जो कुछ जाना है, वही सच-सच बतला रहा हूँ। भृगुके पौत्र महाबुद्धिमान् महाभाग मार्कण्डेयजी आजके दिन अपनी मृत्यु जानकर मृत्युको जीतनेकी इच्छासे तपोवनमें गये थे। वहाँ उन बुद्धिमान्‌ने भृगुजीके बतलाये हुए मार्गके अनुसार भगवान् विष्णुकी आराधना एवं द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करते हुए उत्कृष्ट तपस्या की

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