भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 318 में से

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पृष्ठ 45

३४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ८


[बायाँ स्तम्भ - मूल संस्कृत श्लोक]

एकाग्रेणैव मनसा ध्यायते हृदि केशवम्। सततं योगयुक्तस्तु स मुनिस्तत्र किंकराः ॥ १२ हरिध्यानमहादीक्षाबलं तस्य महामुनेः। नान्यद्वै प्राप्तकालस्य बलं पश्यामि किंकराः ॥ १३ हृदिस्थे पुण्डरीकाक्षे सततं भक्तवत्सले। पश्यन्तं विष्णुभूतं नु को हि स्यात् केशवाश्रयम् ॥ १४ तेऽपि वै पुरुषा विष्णोर्यैर्युयं ताडिता भृशम्। अत ऊर्ध्वं न गन्तव्यं यत्र वै वैष्णवाः स्थिताः ॥ १५ न चित्रं ताडनं तत्र अहं मन्ये महात्मभिः । भवतां जीवनं चित्रं यक्षैर्दत्तं कृपालुभिः ॥ १६ नारायणपरं विप्रं कस्तं वीक्षितुमुत्सहेत्। युष्माभिश्च महापापैर्मार्कण्डेयं हरिप्रियम्। समानेतुं कृतो यत्नः समीचीनं न तत्कृतम् ॥ १७ नरसिंहं महादेवं ये नराः पर्युपासते। तेषां पार्श्वे न गन्तव्यं युष्माभिर्मम शासनात् ॥ १८

श्रीव्यास उवाच स एवं किंकरानुक्त्वा मृत्युं च पुरतः स्थितम्। यमो निरीक्ष्य च जनं नरकस्थं प्रपीडितम् ॥ १९ कृपया परया युक्तो विष्णुभक्त्या विशेषतः । जनस्यानुग्रहार्थाय तेनोक्ताश्च गिरः शृणु ॥ २० नरके पच्यमानस्य यमेन परिभाषितम्। किं त्वया नार्चितो देवः केशवः क्लेशनाशनः ॥ २१ उदकेनाप्यलाभे तु द्रव्याणां पूजितः प्रभुः । यो ददाति स्वकं लोकं स त्वया किं न पूजितः ॥ २२ नरसिंहो हृषीकेशः पुण्डरीकनिभेक्षणः । स्मरणान्मुक्तिदो नृणां स त्वया किं न पूजितः ॥ २३ इत्युक्त्वा नारकान् सर्वान् पुनराह स किंकरान्। वैवस्वतो यमः साक्षाद्विष्णुभक्तिसमन्वितः ॥ २४ नारदाय स विश्वात्मा प्राहैवं विष्णुरव्ययः । अन्येभ्यो वैष्णवेभ्यश्च सिद्धेभ्यः सततं श्रुतम् ॥ २५ तद्वः प्रीत्या प्रवक्ष्यामि हरिवाक्यमनुत्तमम्। शिक्षार्थं किंकराः सर्वे शृणुत प्रणता हरेः ॥ २६


[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]

है। दूतो ! वे मुनि निरन्तर योगयुक्त होकर वहाँ एकाग्रचित्तसे अपने हृदयमें केशवका ध्यान कर रहे हैं। किंकरो ! उस महामुनिको भगवान् विष्णुके ध्यानकी महादीक्षाका ही बल प्राप्त है; क्योंकि जिसका मरणकाल प्राप्त हो गया है, उसके लिये मैं दूसरा कोई बल नहीं देखता। भक्तवत्सल, कमललोचन भगवान् विष्णुके निरन्तर हृदयस्थ हो जानेपर उस विष्णुस्वरूप भगवच्छरणागत पुरुषकी ओर कौन देख सकता है ? ॥ ९-१४ ॥

वे पुरुष भी, जिन्होंने तुम्हें बहुत मारा है, भगवान् विष्णुके ही दूत हैं। आजसे जहाँ वैष्णव हों, वहाँ तुमलोग न जाना। उन महात्माओंके द्वारा तुम्हारा मारा जाना आश्चर्यकी बात नहीं है। आश्चर्य तो यह है कि उन दयालु महापुरुषोंने तुम्हें जीवित रहने दिया है। भला, नारायणके ध्यानमें तत्पर हुए उस ब्राह्मणको देखनेका भी साहस कौन कर सकता है? तुम महापापियोंने भगवान्के प्रिय भक्त मार्कण्डेयजीको जो यहाँ लानेका प्रयत्न किया है, यह अच्छा नहीं किया। आजसे तुमलोग मेरी आज्ञा मानकर उन महात्माओंके पास न जाना, जो महादेव भगवान् नृसिंहकी उपासना करते हों ॥ १५-१८ ॥

**श्रीव्यासजी कहते हैं—**शुकदेव ! यमने अपने सामने खड़े हुए मृत्युदेव और दूतोंसे इस प्रकार कहकर नरकमें पड़े हुए पीड़ित मनुष्योंकी ओर देखा तथा अत्यन्त कृपा एवं विशेषतः विष्णुभक्तिसे युक्त होकर नारकीय जीवोंपर अनुग्रह करनेके लिये जो बातें कहीं, उन्हें तुम सुनो। नरकमें यातना सहते हुए जीवोंसे यमने कहा—‘पापसे कष्ट पानेवाले जीव ! तुमने क्लेशनाशक भगवान् केशवकी पूजा क्यों नहीं की ? पूजन-सम्बन्धी द्रव्योंके न मिलनेपर केवल जलमात्रसे भी पूजित होनेपर जो भगवान् पूजकको अपना लोकतक दे डालते हैं, उनकी पूजा तुमने क्यों नहीं की? कमलके समान लोचनोंवाले, नरसिंहरूपधारी जो भगवान् हृषीकेश स्मरणमात्रसे ही मनुष्योंको मुक्ति देनेवाले हैं, उनकी पूजा तुमने क्यों नहीं की?' ॥ १९-२३ ॥

नरकमें पड़े हुए जीवोंके प्रति यों कहकर विष्णुभक्तिसे युक्त सूर्यनन्दन यमने अपने किंकरोंसे पुनः कहा—'किंकरो ! अविनाशी विश्वात्मा भगवान् विष्णुने नारदजीसे जैसा कहा था और अन्य वैष्णवों तथा सिद्धोंसे जैसा सदा ही सुना गया है, वह अत्यन्त उत्तम भगवद्वाक्य मैं प्रसन्न होकर तुम लोगोंसे शिक्षाके लिये कह रहा हूँ। तुम सभी भगवान्के शरणागत होकर सुनो ॥ २४-२६॥