संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 47, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें३६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ९ व्यास उवाच इति संकीर्तिते विष्णौ नारकैर्भक्तिपूर्वकम्। तदा सा नारकी पीडा गता तेषां महात्मनाम्॥ ४० कृष्णरूपधराः सर्वे दिव्यवस्त्रविभूषिताः। दिव्यगन्धानुलिप्ताङ्गा दिव्याभरणभूषिताः॥ ४१ तानारोप्य विमानेषु दिव्येषु हरिपूरुषाः। तर्जयित्वा यमभटान् नीतास्ते केशवालयम्॥ ४२ नारकेषु च सर्वेषु नीतेषु हरिपूरुषैः। विष्णुलोकं यमो भूयो नमश्चक्रे तदा हरिम्॥ ४३ यन्नामकीर्तनाद्याता नारकाः केशवालयम्। तं नमामि सदा देवं नरसिंहमहं गुरुम्॥ ४४ तस्य वै नरसिंहस्य विष्णोरमिततेजसः। प्रणामं येऽपि कुर्वन्ति तेभ्योऽपीह नमो नमः॥ ४५ दृष्ट्वा प्रशान्तं नरकाग्निमुग्रं यन्त्रादि सर्वं विपरीतमत्र। पुनः स शिक्षार्थमथात्मदूतान् यमो हि वक्तुं कृतवान् मनः स्वयम्॥ ४६ व्यासजी कहते हैं—शुकदेव ! इस प्रकार नरकमें पड़े हुए जीवोंने जब भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुका कीर्तन किया, तब उन महात्माओंकी नरक-पीड़ा तत्काल दूर हो गयी। वे सभी अपने अङ्गोंमें दिव्य गन्धका अनुलेप लगाये, दिव्य वस्त्र और भूषणोंसे विभूषित हो, श्रीकृष्णस्वरूप हो गये। फिर भगवान् विष्णुके किंकर यमदूतोंकी भर्त्सना करके उन्हें दिव्य विमानोंपर बिठाकर विष्णुधामको ले गये। विष्णुदूतोंद्वारा सभी नरकस्थ जीवोंके विष्णुलोकमें ले जाये जानेपर यमराजने पुनः भगवान् विष्णुको प्रणाम किया। 'जिनके नामकीर्तनसे नरकमें पड़े हुए जीव विष्णुधामको चले गये, उन गुरुदेव नरसिंह-भगवान्को मैं सदा प्रणाम करता हूँ। उन अमित तेजस्वी नरसिंहस्वरूप भगवान् विष्णुको जो प्रणाम करते हैं, उन्हें भी मेरा बार-बार नमस्कार है'॥ ४०-४५॥ उग्र नरकाग्निको शान्त और सभी यन्त्र आदिको विपरीत दशामें पड़े देखकर यमराजने स्वयं ही पुनः अपने दूतोंको शिक्षा देनेके लिये मनमें विचार किया॥ ४६॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे यमगीता नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'यमगीता' नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८॥ नवाँ अध्याय यमाष्टक—यमराजका अपने दूतके प्रति उपदेश श्रीव्यास उवाच स्वपुरुषमभिवीक्ष्य पाशहस्तं वदति यमः किल तस्य कर्णमूले। परिहर मधुसूदनप्रपन्नान् प्रभुरहमन्यनृणां न वैष्णवानाम्॥ १ अहममरगणार्चितेन धात्रा यम इति लोकहिताहिते नियुक्तः। हरिगुरुविमुखान् प्रशास्मि मर्त्यान् हरिचरणप्रणतान्नमस्करोमि ॥ २ श्रीव्यासजी बोले—अपने किंकरको हाथमें पाश लिये कहीं जानेको उद्यत देखकर यमराज उसके कानमें कहते हैं—"दूत ! तुम भगवान् मधुसूदनकी शरणमें गये हुए प्राणियोंको छोड़ देना; क्योंकि मेरी प्रभुता दूसरे मनुष्योंपर ही चलती है, वैष्णवोंपर मेरा प्रभुत्व नहीं है। देवपूजित ब्रह्माजीने मुझे 'यम' कहकर लोगोंके पुण्य- पापका विचार करनेके लिये नियुक्त किया है। जो विष्णु और गुरुसे विमुख हैं, मैं उन्हीं मनुष्योंका शासन करता हूँ। जो श्रीहरिके चरणोंमें शीश झुकानेवाले हैं, उन्हें तो In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth 1113 Narsingpuran_Section_3_2_Back