भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 318 में से

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पृष्ठ 48

अध्याय ९ ] यमाष्टक — यमराजका अपने दूतके प्रति उपदेश ३७ सुगतिमभिलषामि वासुदेवा- दहमपि भागवते स्थितान्तरात्मा। मधुवधवशगोऽस्मि न स्वतन्त्रः प्रभवति संयमने ममापि कृष्णः॥ ३ भगवति विमुखस्य नास्ति सिद्धि- र्विषममृतं भवतीति नेदमस्ति। वर्षशतमपीह पच्यमानं व्रजति न काञ्चनतामयः कदाचित् ॥ ४ नहि शशिकुलुषच्छविः कदाचिद्- विरमति नो रवितामुपैति चन्द्रः। भगवति च हरावनन्यचेता भृशमलिनोऽपि विराजते मनुष्यः॥ ५ महदपि सुविचार्य लोकतत्त्वं भगवदुपास्तिमृते न सिद्धिरस्ति। सुरगुरुसुदृढप्रसाददौ तौ हरिचरणौ स्मरतापवर्गहेतोः॥ ६ शुभमिदमुपलभ्य मानुषत्वं सुकृतशतेन वृथेन्द्रियार्थहेतोः। रमयति कुरुते न मोक्षमार्गं दहयति चन्दनमाशु भस्महेतोः॥ ७ मुकुलितकरकुड्मलैः सुरेन्द्रैः सततनमस्कृतपादपङ्कजो यः। अविहतगतये सनातनाय जगति जनिं हरते नमोऽग्रजाय॥ ८ यमाष्टकमिदं पुण्यं पठते यः शृणोति वा। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥ ९ इतीदमुक्तं यमवाक्यमुत्तमं मयाधुना ते हरिभक्तिवर्द्धनम्। पुनः प्रवक्ष्यामि पुरातनीं कथां भृगोस्तु पौत्रेण च या पुरा कृता॥ १०

मैं स्वयं ही प्रणाम करता हूँ। भगवद्भक्तोंके चिन्तन एवं स्मरणमें अपना मन लगाकर मैं भी भगवान् वासुदेवसे अपनी सुगति चाहता हूँ। मैं मधुसूदनके वशमें हूँ, स्वतन्त्र नहीं हूँ। भगवान् विष्णु मेरा भी नियन्त्रण करनेमें समर्थ हैं। जो भगवान्‌से विमुख है, उसे कभी सिद्धि (मुक्ति) नहीं प्राप्त हो सकती; विष अमृत हो जाय, ऐसा कभी सम्भव नहीं है; लोहा सैकड़ों वर्षोंतक आगमें तपाया जाय, तो भी कभी सोना नहीं हो सकता; चन्द्रमाकी कलङ्कित कान्ति कभी निष्कलङ्क नहीं हो सकती; वह कभी सूर्यके समान प्रकाशमान नहीं हो सकता; परंतु जो अनन्यचित्त होकर भगवान् विष्णुके चिन्तनमें लगा है, वह मनुष्य अपने शरीरसे अत्यन्त मलिन होनेपर भी बड़ी शोभा पाता है। महान् लोकतत्त्वका अच्छी तरह विचार करनेपर भी यही निश्चित होता है कि भगवान्‌की उपासनाके बिना सिद्धि नहीं प्राप्त हो सकती; इसलिये देवगुरु बृहस्पतिके ऊपर सुदृढ़ अनुकम्पा करनेवाले भगवच्चरणोंका तुमलोग मोक्षके लिये स्मरण करते रहो। जो लोग सैकड़ों पुण्योंके फलस्वरूप इस सुन्दर मनुष्य-शरीरको पाकर भी व्यर्थ विषयसुखोंमें रमण करते हैं, मोक्षपथका अनुसरण नहीं करते, वे मानो राखके लिये जल्दी-जल्दी चन्दनकी लकड़ीको फूँक रहे हैं। बड़े-बड़े देवेश्वर हाथ जोड़कर मुकुलित करपङ्कज-कोषद्वारा जिन भगवान्‌के चरणारविन्दोंको प्रणाम करते हैं तथा जिनकी गति कभी और कहीं भी प्रतिहत नहीं होती, उन भवजन्मनाशक एवं सबके अग्रज सनातन पुरुष भगवान् विष्णुको नमस्कार है'॥ १-८॥ श्रीव्यासजी कहते हैं—इस पवित्र यमाष्टकको जो पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकको चला जाता है। भगवान् विष्णुकी भक्तिको बढ़ानेवाला यमराजका यह उत्तम वचन मैंने इस समय तुमसे कहा है; अब पुनः उसी पुरानी कथाको अर्थात् भृगुके पौत्र मार्कण्डेयजीने पूर्वकालमें जो कुछ किया था, उसको कहूँगा॥ ९-१०॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे यमाष्टकनाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'यमाष्टक नाम' नवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth