भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 318 में से

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पृष्ठ 49

३८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १० दसवाँ अध्याय मार्कण्डेयका विवाह कर वेदशिराको उत्पन्न करके प्रयागमें अक्षयवटके नीचे तप एवं भगवान्की स्तुति करना; फिर आकाशवाणीके अनुसार स्तुति करनेपर भगवान्का उन्हें आशीर्वाद एवं वरदान देना तथा मार्कण्डेयजीका क्षीरसागरमें जाकर पुनः उनका दर्शन करना


[मूल संस्कृत श्लोक - वाम भाग]

श्रीव्यास उवाच जित्वैवमात्मनो मृत्युं तपसा शंसितव्रतः। स जगाम पितुर्गेहं मार्कण्डेयो महामतिः॥ १ कृत्वा विवाहं धर्मेण भृगोर्वाक्यविशेषतः। स वेदशिरसं पुत्रमुत्पाद्य च विधानतः॥ २ इष्ट्वा यज्ञैस्तु देवेशं नारायणमनामयम्। श्राद्धेन तु पितॄनिष्ट्वा अन्नदानेन चातिथीन्॥ ३ प्रयागमासाद्य पुनः स्नात्वा तीर्थे गरीयसि। मार्कण्डेयो महातेजास्तेपे वटतले तपः॥ ४ यस्य प्रसादेन पुरा जितवान् मृत्युमात्मनः। तं देवं द्रष्टुमिच्छन् यः स तेपे परमं तपः॥ ५ वायुभक्षश्चिरं कालं तपसा शोषयंस्तनुम्। एकदा तु महातेजा मार्कण्डेयो महामतिः॥ ६ आराध्य माधवं देवं गन्धपुष्पादिभिः शुभैः। अग्रे व्यग्रमनाः स्थित्वा हृदये तमनुस्मरन्। शङ्खचक्रगदापाणिं तुष्टाव गरुडध्वजम्॥ ७ मार्कण्डेय उवाच नरं नृसिंहं नरनाथमच्युतं प्रलम्बबाहुं कमलायतेक्षणम्। क्षितीश्वरैरर्चितपादपङ्कजं नमामि विष्णुं पुरुषं पुरातनम्॥ ८ जगत्पतिं क्षीरसमुद्रमन्दिरं तं शार्ङ्गपाणिं मुनिवृन्दवन्दितम्। श्रियःपतिं श्रीधरमीशमीश्वरं नमामि गोविन्दमनन्तवर्चसम्॥ ९


[हिन्दी अनुवाद - दक्षिण भाग]

श्रीव्यासजी कहते हैं—शुकदेव ! इस प्रकार तपस्याद्वारा अपनी मृत्युको जीतकर प्रशंसित व्रतवाले महाबुद्धिमान् मार्कण्डेयजी पिताके घर गये। वहाँ भृगुजीके विशेष आग्रहसे धर्मपूर्वक विवाह करके उन्होंने विधिके अनुसार ‘वेदशिरा' नामक एक पुत्र उत्पन्न किया। तत्पश्चात् निरामय (निर्विकार) देवेश्वर भगवान् नारायणका यज्ञोंद्वारा यजन करते हुए उन्होंने श्राद्धसे पितरोंका और अन्नदानसे अतिथियोंका पूजन किया। इसके बाद पुनः प्रयागमें जाकर वहाँके श्रेष्ठतम तीर्थ त्रिवेणीमें स्नान करके महातेजस्वी मार्कण्डेयजी अक्षयवटके नीचे तप करने लगे। जिनके कृपाप्रसादसे उन्होंने पूर्वकालमें मृत्युपर विजय प्राप्त की थी, उन्हीं देवाधिदेवके दर्शनकी इच्छासे उन्होंने उत्कृष्ट तपस्या आरम्भ की। दीर्घकालतक केवल वायु पीकर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए वे महातेजस्वी महाबुद्धिमान् मार्कण्डेयजी एक दिन गन्ध-पुष्प आदि शुभ उपकरणोंसे भगवान् वेणीमाधवकी आराधना करके उनके सम्मुख स्वस्थचित्तसे खड़े हो गये और हृदयमें उन्हीं शङ्ख-चक्र-गदाधारी गरुडध्वज भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए उनकी स्तुति करने लगे॥ १-७॥ मार्कण्डेयजी बोले—जो भगवान् श्रेष्ठ नर, नृसिंह और नरनाथ (मनुष्योंके स्वामी) हैं, जिनकी भुजाएँ लम्बी हैं, नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान विशाल हैं तथा चरणारविन्द असंख्य भूपतियोंद्वारा पूजित हैं, उन पुरातन पुरुष भगवान् विष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ। जो संसारके पालक हैं, क्षीरसमुद्र जिनका निवास-स्थान है, जो हाथमें शार्ङ्गधनुष धारण किये रहते हैं, मुनिवृन्द जिनकी वन्दना करते हैं, जो लक्ष्मीके पति हैं और लक्ष्मीको निरन्तर अपने हृदयमें धारण करते हैं, उन सर्वसमर्थ, सर्वेश्वर, अनन्त तेजोमय भगवान् गोविन्दको


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