संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 51, कुल 318 में से
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४० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १० [मूल संस्कृत श्लोक - वाम भाग] वागुवाच स्तोत्रेणानेन विप्रेन्द्र स्तुहि नारायणं प्रभुम्। नान्यथा सर्वतीर्थानां फलं प्राप्स्यसि सुव्रत ॥ १९ मार्कण्डेय उवाच तदेवाख्याहि भगवन् स्तोत्रं तीर्थफलप्रदम्। येन जप्तेन सकलं तीर्थस्नानफलं लभेत् ॥ २० वागुवाच जय जय देवदेव जय माधव केशव। जय पद्मपलाशाक्ष जय गोविन्द गोपते ॥ २१ जय जय पद्मनाभ जय वैकुण्ठ वामन। जय पद्म हृषीकेश जय दामोदराच्युत ॥ २२ जय पद्मेश्वरानन्त जय लोकगुरो जय। जय शङ्खगदापाणे जय भूधरसूकर ॥ २३ जय यज्ञेश वाराह जय भूधर भूमिप। जय योगेश योगज्ञ जय योगप्रवर्त्तक ॥ २४ जय योगप्रवर्त्तक जय धर्मप्रवर्त्तक। कृतप्रिय जय जय यज्ञेश यज्ञाङ्ग जय ॥ २५ जय वन्दितसद्द्विज जय नारदसिद्धिद। जय पुण्यवतां गेह जय वैदिकभाजन ॥ २६ जय जय चतुर्भुज (श्री) जयदेव जय दैत्यभयावह। जय सर्वज्ञ सर्वात्मन् जय शंकर शाश्वत ॥ २७ जय विष्णो महादेव जय नित्यमधोक्षज। प्रसादं कुरु देवेश दर्शयाद्य स्वकां तनुम् ॥ २८ व्यास उवाच इत्येवं कीर्तिते तेन मार्कण्डेयेन धीमता। प्रादुर्बभूव भगवान् पीतवासा जनार्दनः ॥ २९ शङ्खचक्रगदापाणिः सर्वाभरणभूषितः। तेजसा द्योतयन् सर्वा दिशो विष्णुः सनातनः ॥ ३० तं दृष्ट्वा सहसा भूमौ चिरप्रार्थितदर्शनम्। प्रयातः शिरसा वश्यो भक्त्या स भृगुनन्दनः ॥ ३१ निपत्योत्पत्य च पुनः पुनः साङ्गं महामनाः। प्रबद्धसम्पुटकरो गोविन्दं पुरतः स्तुवन् ॥ ३२ [हिन्दी अनुवाद - दक्षिण भाग] आकाशवाणीने कहा—विप्रेन्द्र ! सुव्रत ! इस स्तोत्रसे प्रभुवर नारायणका स्तवन करो; और किसी उपायसे तुम्हें समस्त तीर्थोंका फल नहीं प्राप्त होगा ॥ १९ ॥ मार्कण्डेयजी बोले—भगवन् ! जिसका जप करनेसे तीर्थस्नानका सम्पूर्ण फल प्राप्त हो जाता है, वह तीर्थफलदायक स्तोत्र कौन-सा है ? उसे ही मुझे बताइये ॥ २० ॥ आकाशवाणीने कहा—देवदेव ! माधव ! केशव ! आपकी जय हो, जय हो। आपके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान शोभा पाते हैं। गोविन्द ! गोपते ! आपकी जय हो, जय हो। पद्मनाभ ! वैकुण्ठ ! वामन ! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। पद्मस्वरूप हृषीकेश ! आपकी जय हो। दामोदर ! अच्युत ! आपकी जय हो। लक्ष्मीपते ! अनन्त ! आपकी जय हो। लोकगुरो ! आपकी जय हो, जय हो। शङ्ख और गदा धारण करनेवाले तथा पृथ्वीको उठानेवाले भगवान् वाराह ! आपकी जय हो, जय हो। यज्ञेश्वर ! पृथ्वीका धारण तथा पोषण करनेवाले वाराह ! आपकी जय हो, जय हो। योगके ईश्वर, ज्ञाता और प्रवर्तक ! आपकी जय हो, जय हो। योग और धर्मके प्रवर्तक ! आपकी जय हो, जय हो। कर्मप्रिय ! यज्ञेश्वर ! यज्ञाङ्ग ! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। उत्तम ब्राह्मणोंकी वन्दना करने—उन्हें सम्मान देनेवाले देवता ! आपकी जय हो और नारदजीको सिद्धि देनेवाले परमेश्वर ! आपकी जय हो। पुण्यवानोंके आश्रय, वैदिक वाणीके चरम तात्पर्यभूत एवं वेदोक्त कर्मोंके परम आश्रय नारायण ! आपकी जय हो, जय हो। चतुर्भुज ! आपकी जय हो। दैत्योंको भय देनेवाले श्रीजयदेव ! आपकी जय हो, जय हो। सर्वज्ञ ! सर्वात्मन् ! आपकी जय हो। सनातनदेव ! कल्याणकारी भगवन् ! आपकी जय हो, जय हो। महादेव ! विष्णो ! अधोक्षज ! देवेश्वर ! आप मुझपर प्रसन्न होइये और आज मुझे अपने स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कराइये ॥ २१—२८ ॥ श्रीव्यासजी कहते हैं—शुकदेव ! आकाशवाणीके कथनानुसार जब बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीने इस प्रकार भगवन्नामोंका कीर्तन किया, तब पीताम्बरधारी भगवान् जनार्दन वहाँ प्रकट हो गये। वे सनातन भगवान् विष्णु हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा लिये, समस्त आभूषणोंसे भूषित हो अपने तेजसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। भृगुवंशको आनन्दित करनेवाले मार्कण्डेयजीने भगवान्को, जिनका दर्शन चिरकालसे प्रार्थित था, सहसा सामने प्रकट हुआ देख, भक्तिविवश हो, भूमिपर मस्तक रखकर प्रणाम किया। भूमिपर गिर-गिरकर बारंबार साष्टांग प्रणाम करके खड़े हो, महामना मार्कण्डेय दोनों हाथ जोड़ सामने उपस्थित हुए भगवान्की इस प्रकार स्तुति करने लगे ॥ २९—३२ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth