भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 318 में से

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पृष्ठ 52

अध्याय १० ] मार्कण्डेयका विवाह कर वेदशिराको उत्पन्न करके प्रयागमें तप एवं भगवान्‌की स्तुति करना ४१ मार्कण्डेय उवाच नमोऽस्तु ते देवदेव महाचित्त महाकाय महाप्राज्ञ महादेव महाकीर्त्ते ब्रह्मेन्द्रचन्द्र- रुद्राचितपादयुगल श्रीपद्महस्त सम्मर्दितदैत्य- देह ॥ ३३॥ अनन्तभोगशयनार्पितसर्वाङ्ग सनक- सनन्दनसनत्कुमाराद्यैर्योगिभिर्नासाग्रन्यस्तलोचनै- रनवरतमभिचिन्तितमोक्षतत्त्व । गन्धर्व- विद्याधरयक्षकिन्नरकिम्पुरुषैरहरहर्गीयमानदिव्य- यशः ॥ ३४॥ नृसिंह नारायण पद्मनाभ गोविन्द गोवर्द्धनगुहानिवास योगीश्वर देवेश्वर जलेश्वर महेश्वर ॥ ३५॥ योगधर महामायाधर विद्याधर यशोधर कीर्तिधर त्रिगुणनिवास त्रितत्त्वधर त्रेताग्निधर ॥ ३६ ॥ त्रिवेदभाक् त्रिनिकेत त्रिसुपर्ण त्रिदण्डधर ॥ ३७॥ स्निग्धमेघाभार्चितद्युतिविराजित पीताम्बरधर किरीटकटक- केयूरहारमणिरत्नांशुदीप्तिविद्योतितसर्वदिश ॥ ३८ ॥ कनकमणिकुण्डलमण्डितगण्डस्थल मधुसूदन विश्वमूर्ते ॥ ३९ ॥ लोकनाथ यज्ञेश्वर यज्ञप्रिय तेजोमय भक्तिप्रिय वासुदेव दुरितापहाराराध्य पुरुषोत्तम नमोऽस्तु ते ॥ ४० ॥ व्यास उवाच इत्युदीरितमाकर्ण्य भगवांस्तु जनार्दनः । देवदेवः प्रसन्नात्मा मार्कण्डेयमुवाच ह ॥ ४१ श्रीभगवानुवाच तुष्टोऽस्मि भवतो वत्स तपसा महता पुनः । स्तोत्रैरपि महाबुद्धे नष्टपापोऽसि साम्प्रतम् ॥ ४२ वरं वरय विप्रेन्द्र वरदोऽहं तवाग्रतः । नातमतपसा ब्रह्मन् द्रष्टुं साध्योऽहमञ्जसा ॥ ४३ मार्कण्डेयजी बोले—महामना ! महाकाय ! महामते ! महादेव ! महायशस्वी ! देवाधिदेव ! आपको नमस्कार है। ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्रमा तथा रुद्र निरन्तर आपके युगल- चरणारविन्दोंकी अर्चना करते हैं। आपके हाथमें शोभाशाली कमल सुशोभित होता है; आपने दैत्योंके शरीरोंको मसल डाला है, आपको नमस्कार है। आप 'अनन्त' नामसे विख्यात शेषनागके शरीरकी शय्याको अपने सम्पूर्ण अङ्ग समर्पित कर देते हैं—उसीपर शयन करते हैं। सनक, सनन्दन और सनत्कुमार आदि योगीजन अपने नेत्रोंकी दृष्टिको नासिकाके अग्रभागपर सुस्थिर करके नित्य- निरन्तर जिस मोक्षतत्त्वका चिन्तन करते हैं, वह आप ही हैं। गन्धर्व, विद्याधर, यक्ष, किंनर और किम्पुरुष प्रतिदिन आपके ही दिव्य सुयशका गान करते रहते हैं। नृसिंह ! नारायण ! पद्मनाभ ! गोविन्द ! गिरिराज गोवर्धनकी कन्दरामें क्रीड़ा-विश्रामादिके लिये निवास करनेवाले ! योगीश्वर ! देवेश्वर ! जलेश्वर और महेश्वर ! आपको नमस्कार है। योगधर ! महामायाधर ! विद्याधर ! यशोधर ! कीर्तिधर ! सत्त्वादि तीनों गुणोंके आश्रय ! त्रितत्त्वधारी तथा गार्हपत्यादि तीनों अग्नियोंको धारण करनेवाले देव ! आपको प्रणाम है। आप ऋक्, साम और यजुष्—इन तीनों वेदोंके परम प्रतिपाद्य, त्रिनिकेत (तीनों लोकोंके आश्रय), त्रिसुपर्ण, मन्त्ररूप और त्रिदण्डधारी हैं; ऐसे आपको प्रणाम है। स्निग्ध मेघकी आभाके सदृश सुन्दर श्यामकान्तिसे सुशोभित, पीताम्बरधारी, किरीट, वलय, केयूर और हारोंमें जटिल मणिरत्नोंकी किरणोंसे समस्त दिशाओंको प्रकाशित करनेवाले नारायणदेव ! आपको नमस्कार है। सुवर्ण और मणियोंसे बने हुए कुण्डलोंद्वारा अलंकृत कपोलोंवाले मधुसूदन ! विश्वमूर्ते ! आपको प्रणाम है। लोकनाथ ! यज्ञेश्वर ! यज्ञप्रिय ! तेजोमय ! भक्तिप्रिय वासुदेव ! पापहारिन् ! आराध्यदेव पुरुषोत्तम ! आपको नमस्कार है ॥ ३३-४० ॥ श्रीव्यासजी बोले—इस प्रकार स्तवन सुनकर देवदेव भगवान् जनार्दनने प्रसन्नचित्त होकर मार्कण्डेयजीसे कहा ॥ ४१ ॥ श्रीभगवान् बोले—वत्स ! मैं तुम्हारे महान् तप और फिर स्तोत्रपाठसे तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। महाबुद्धे ! इस समय तुम्हारा सारा पाप नष्ट हो चुका है। विप्रेन्द्र ! मैं तुम्हारे सम्मुख वर देनेके लिये उपस्थित हूँ; वर माँगो। ब्रह्मन् ! जिसने तप नहीं किया है, ऐसा कोई भी मनुष्य अनायास ही मेरा दर्शन नहीं पा सकता ॥ ४२-४३ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth