भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 318 में से

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पृष्ठ 53

४२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ११ मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजी बोले— देवेश्वर! इस समय आपके कृतकृत्योऽस्मि देवेश साम्प्रतं तव दर्शनात्। | दर्शनसे ही मैं कृतार्थ हो गया। जगत्पते! अब तो मुझे त्वद्भक्तिमचलामेकां मम देहि जगत्पते॥ ४४ | एकमात्र अपनी अविचल भक्ति ही दीजिये। माधव! यदि प्रसन्नो भगवन् मम माधव श्रीपते। | श्रीपते! हृषीकेश! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे चिरायुष्यं हृषीकेश येन त्वां चिरमर्चये॥ ४५ | चिरकालिक आयु दीजिये, जिससे मैं चिरकालतक श्रीभगवानुवाच | आपकी आराधना कर सकूँ॥ ४४-४५॥ मृत्युस्ते निर्जितः पूर्वे चिरायुस्त्वं च लब्धवान्। | श्रीभगवान् बोले— मृत्युको तो तुम पहले ही जीत भक्तिरस्त्वचला ते मे वैष्णवी मुक्तिदायिनी॥ ४६ | चुके हो, अब चिरकालिक आयु भी तुम्हें प्राप्त हुई। साथ इदं तीर्थं महाभाग त्वन्नाम्ना ख्यातिमेष्यति। | ही, मेरी मुक्तिदायिनी अविचल वैष्णवी भक्ति भी तुम्हें पुनस्त्वं द्रक्ष्यसे मां वै क्षीराब्धौ योगशायिनम्॥ ४७ | प्राप्त हो। महाभाग! यह तीर्थ आजसे तुम्हारे ही नामसे व्यास उवाच | विख्यात होगा; अब पुनः तुम क्षीरसमुद्रमें योगनिद्राका | आश्रय लेकर सोये हुए मेरा दर्शन पाओगे॥ ४६-४७॥ इत्युक्त्वा पुण्डरीकाक्षस्तत्रैवान्तरधीयत। | श्रीव्यासजी बोले— यों कहकर कमललोचन मार्कण्डेयोऽपि धर्मात्मा चिन्तयन्मधुसूदनम्॥ ४८ | भगवान् विष्णु वहीं अदृश्य हो गये। धर्मात्मा, साधुशिरोमणि, अर्चयन् देवदेवेशं जपन् शुद्धं नमन्नपि। | तपोधन मार्कण्डेयजी भी शुद्धस्वरूप देवदेवेश्वर वेदशास्त्राणि पुण्यानि पुराणान्यखिलानि च॥ ४९ | मधुसूदनका ध्यान, पूजन, जप और नमस्कार करते हुए मुनीनां श्रावयामास गाथाश्चैव तपोधनः। | वहीं रहकर मुनियोंको पवित्र वेदशास्त्र, अखिल पुराण, इतिहासानि पुण्यानि पितृतत्त्वं च सत्तमः॥ ५० | विविध प्रकारकी गाथाएँ, पावन इतिहास और पितृतत्त्व ततः कदाचित् पुरुषोत्तमोक्तं | भी सुनाने लगे। तदनन्तर किसी समय भगवान् पुरुषोत्तमके वचः स्मरन् शास्त्रविदां वरिष्ठः। | कहे हुए वचनको स्मरण कर, वे शास्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भ्रमन् समुद्रं स जगाम द्रष्टुं | उग्रतेजस्वी मुनि उन सुरेश्वर भगवान् श्रीहरिका दर्शन हरिं सुरेशं मुनिरुग्रतेजाः॥ ५१ | करनेके लिये घूमते हुए समुद्रकी ओर चले। हृदयमें श्रमेण युक्तश्चिरकालसम्भ्रमाद् | भगवान्‌की भक्ति धारण किये चिरकालतक परिश्रमपूर्वक भृगोः स पौत्रो हरिभक्तिमुद्वहन्। | चलते-चलते क्षीरसागरमें पहुँचकर उन भृगुके पौत्रने क्षीराब्धिमासाद्य हरिं सुरेशं | नागराजके शरीररूपी पर्यङ्कपर निद्रामग्न हुए सुरेश्वर नागेन्द्रभोगे कृतनिद्रमैक्षत॥ ५२ | भगवान् विष्णुका दर्शन किया॥ ४८-५२॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे मार्कण्डेयचरित्रे दशमोऽध्यायः॥ १०॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'मार्कण्डेयके चरित्र' वर्णनके प्रसंगमें दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०॥ ═══════════════════════════════════════════════════════════════ ग्यारहवाँ अध्याय मार्कण्डेयजीद्वारा शेषशायी भगवान्का स्तवन व्यास उवाच | व्यासजी बोले— शुकदेव! तदनन्तर मार्कण्डेयजी प्रणिपत्य जगन्नाथं चराचरगुरुं हरिम्। | शेषशय्यापर सोये हुए उन चराचरगुरु जगदीश्वर भगवान् मार्कण्डेयोऽभितुष्टाव भोगपर्यङ्कशायिनम्॥ १ | विष्णुको प्रणाम करके उनका स्तवन करने लगे॥ १॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth