भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 318 में से

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पृष्ठ 54

अध्याय ११ ] मार्कण्डेयजीद्वारा शेषशायी भगवान्का स्तवन ४३


[मूल संस्कृत श्लोक]

मार्कण्डेय उवाच

प्रसीद भगवन् विष्णो प्रसीद पुरुषोत्तम । प्रसीद देवदेवेश प्रसीद गरुडध्वज ॥ २

प्रसीद विष्णो लक्ष्मीश प्रसीद धरणीधर । प्रसीद लोकनाथाद्य प्रसीद परमेश्वर ॥ ३

प्रसीद सर्वदेवेश प्रसीद कमलेक्षण । प्रसीद मन्दरधर प्रसीद मधुसूदन ॥ ४

प्रसीद सुभागाकान्त प्रसीद भुवनाधिप । प्रसीदाद्य महादेव प्रसीद मम केशव ॥ ५

जय कृष्ण जयाचिन्त्य जय विष्णो जयाव्यय । जय विश्व जयाव्यक्त जय विष्णो नमोऽस्तु ते ॥ ६

जय देव जयाजेय जय सत्य जयाक्षर । जय काल जयेशान जय सर्व नमोऽस्तु ते ॥ ७

जय यज्ञपते नाथ जय विश्वपते विभो । जय भूतपते नाथ जय सर्वपते विभो ॥ ८

जय विश्वपते नाथ जय दक्ष नमोऽस्तु ते । जय पापहरानन्त जय जन्मजरापह ॥ ९

जय भद्रातिभद्रेश जय भद्र नमोऽस्तु ते । जय कामद काकुत्स्थ जय मानद माधव ॥ १०

जय शंकर देवेश जय श्रीश नमोऽस्तु ते । जय कुङ्कुमरक्ताभ जय पङ्कजलोचन ॥ ११

जय चन्दनलिप्ताङ्ग जय राम नमोऽस्तु ते । जय देव जगन्नाथ जय देवकिनन्दन ॥ १२

जय सर्वगुरो ज्ञेय जय शम्भो नमोऽस्तु ते । जय सुन्दर पद्माभ जय सुन्दरिवल्लभ । जय सुन्दरसर्वाङ्ग जय वन्द्य नमोऽस्तु ते ॥ १३

जय सर्वद सर्वेश जय शर्मद शाश्वत । जय कामद भक्तानां प्रभविष्णो नमोऽस्तु ते ॥ १४


[हिन्दी अनुवाद]

मार्कण्डेयजी बोले — भगवन्! विष्णो! आप प्रसन्न हों। पुरुषोत्तम! आप प्रसन्न हों। देवदेवेश्वर! गरुडध्वज! आप प्रसन्न हों, प्रसन्न हों। लक्ष्मीपते विष्णो! धरणीधर! आप प्रसन्न हों, प्रसन्न हों। लोकनाथ! आदिपरमेश्वर! आप प्रसन्न हों, प्रसन्न हों। कमलके समान नेत्रोंवाले सर्वदेवेश्वर! आप प्रसन्न हों, प्रसन्न हों! समुद्रमन्थनके समय मन्दर पर्वतको धारण करनेवाले मधुसूदन! आप प्रसन्न हों, प्रसन्न हों। लक्ष्मीकान्त! भुवनपते! आप प्रसन्न हों, प्रसन्न हों। आदिपुरुष महादेव! केशव! आप मुझपर प्रसन्न हों, प्रसन्न हों ॥ २—५ ॥

कृष्ण! अचिन्तनीय कृष्ण! अव्यय विष्णो! विश्वके रूपमें रहनेवाले एवं व्यापक व्यक्त होते हुए भी अव्यक्त! परमेश्वर! आपकी जय हो, आपको मेरा प्रणाम है। अजेय देव! आपकी जय हो, जय हो। अविनाशी सत्य! आपकी जय हो, जय हो। सबका शासन करनेवाले काल! आपकी जय हो, जय हो। सर्वमय! आपकी जय हो, आपको नमस्कार है। यज्ञेश्वर! नाथ! व्यापक विश्वनाथ! आपकी जय हो, जय हो। स्वामिन्! भूतनाथ! सर्वेश्वर! विभो! आपकी जय हो, जय हो। विश्वपते! नाथ! कार्यदक्ष ईश्वर! आपकी जय हो, जय हो; आपको प्रणाम है। पापहारी! अनन्त! जन्म तथा वृद्धावस्थाके भयको नष्ट करनेवाले देव! आपकी जय हो, जय हो। भद्र! अतिभद्र! ईश! कल्याणमय प्रभो! आपकी जय हो, जय हो; आपको नमस्कार है। कामनाओंको पूर्ण करनेवाले ककुत्स्थ-कुलोत्पन्न श्रीराम! सम्मान देनेवाले माधव! आपकी जय हो, जय हो। देवेश्वर शंकर! लक्ष्मीपते! आपकी जय हो, जय हो; आपको नमस्कार है। कुङ्कुमके समान अरुण कान्तिवाले कमलनयन! आपकी जय हो, जय हो। चन्दनसे अनुलिप्त श्रीअङ्गोंवाले श्रीराम! आपकी जय हो, जय हो; आपको नमस्कार है। देव! जगन्नाथ! देवकीनन्दन! आपकी जय हो, जय हो। सर्वगुरो! जाननेयोग्य शम्भो! आपकी जय हो, जय हो; आपको नमस्कार है। नील कमलकी-सी आभावाले श्यामसुन्दर! सुन्दरी श्रीराधाके प्राणवल्लभ! आपकी जय हो, जय हो। सर्वाङ्गसुन्दर! वन्दनीय प्रभो! आपको नमस्कार है; आपकी जय हो, जय हो। सब कुछ देनेवाले सर्वेश्वर! कल्याणदायी सनातन पुरुष! आपकी जय हो, जय हो। भक्तोंकी कामनाओंको देनेवाले प्रभुवर! आपकी जय हो, आपको नमस्कार है ॥ ६—१४ ॥