संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 57, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें४६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ११ विश्वयोने विशालाक्ष विश्वात्मन् विश्वसम्भव। अनन्यशरणं प्राप्तमतोऽत्र कुलनन्दन॥ ४४ त्राहि मां कृपया कृष्ण शरणागतमातुरम्। नमस्ते पुण्डरीकाक्ष पुराणपुरुषोत्तम॥ ४५ अब्जनाभ हृषीकेश मायामय नमोऽस्तु ते। मामुद्धर महाबाहो मग्ने संसारसागरे ॥ ४६ गह्वरे दुस्तरे दुःखक्लिष्टे क्लेशमहाग्रहैः। अनाथं कृपणं दीनं पतितं भवसागरे। मां समुद्धर गोविन्द वरदेश नमोऽस्तु ते॥ ४७ नमस्त्रैलोक्यनाथाय हरये भूधराय च। देवदेव नमस्तेऽस्तु श्रीवल्लभ नमोऽस्तु ते ॥ ४८ कुलनन्दन कृष्ण! आप विश्वकी उत्पत्तिके स्थान, विशाललोचन, विश्वोत्पादक और विश्वात्मा हैं; अतः दूसरेकी शरणमें न जाकर एकमात्र आपकी ही शरणमें आये हुए मुझ आतुरका आप कृपापूर्वक यहाँ उद्धार करें। पुराण-पुरुषोत्तम पुण्डरीकलोचन! आपको नमस्कार है। कज्जलके समान श्याम कान्तिवाले हृषीकेश! मायाके आश्रयभूत महेश्वर! आपको नमस्कार है। महाबाहो! संसार-सागरमें डूबे हुए मुझ शरणागतका उद्धार कर दें। वरदाता ईश्वर! गोविन्द! क्लेशरूपी महान् ग्राहोंसे भरे हुए, दुःख और क्लेशोंसे युक्त, दुस्तर एवं गहरे भवसागरमें गिरे हुए मुझ दीन, अनाथ एवं कृपणका उद्धार करें। त्रिभुवननाथ विष्णु और धरणीधर अनन्तको नमस्कार है। देवदेव! श्रीवल्लभ! आपको बारम्बार नमस्कार है॥ ४४-४८॥ कृष्ण कृष्ण कृपालुस्त्वमगतीनां गतिर्भवान्। संसारार्णवमग्नानां प्रसीद मधुसूदन॥ ४९ त्वामेकमाद्यं पुरुषं पुराणं जगत्पतिं कारणमच्युतं प्रभुम्। जनार्दनं जन्मजरार्तिनाशनं सुरेश्वरं सुन्दरमिन्दिरापतिम्॥ ५० बृहद्भुजं श्यामलकोमलं शुभं वराननं वारिजपत्रनेत्रम्। तरंगभङ्गायतकन्तलं हरिं सुकान्तीमीशं प्रणतोऽस्मि शाश्वतम्॥ ५१ सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्त्वदर्पितम्। तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ त्वत्पूजाकरौ करौ॥ ५२ जन्मान्तरसहस्रेषु यन्मया पातकं कृतम्। तन्मे हर त्वं गोविन्द वासुदेवेति कीर्तनात्॥ ५३ कृष्ण! कृष्ण! आप दयालु और आश्रयहीनके आश्रय हैं। मधुसूदन! संसार-सागरमें निमग्न हुए प्राणियोंपर आप प्रसन्न हों। आज मैं एक (अद्वितीय), आदि, पुराणपुरुष, जगदीश्वर, जगत्के कारण, अच्युतस्वरूप, सबके स्वामी और जन्म-जरा एवं पीड़ाको नष्ट करनेवाले, देवेश्वर, परम सुन्दर लक्ष्मीपति भगवान् जनार्दनको प्रणाम करता हूँ। जिनकी भुजाएँ बड़ी हैं, जो श्यामवर्ण, कोमल, सुशोभन, सुमुख और कमलदललोचन हैं, क्षीरसागरकी तरंगभङ्गीके समान जिनके लम्बे-लम्बे घुँघराले केश हैं, उन परम कमनीय, सनातन ईश्वर भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ। भगवन्! वही जिह्वा सफल है, जो आप श्रीहरिका स्तवन करती है; वही चित्त सार्थक है, जो आपके चरणोंमें समर्पित हो चुका है तथा केवल वे ही हाथ श्लाघ्य हैं, जो आपकी पूजा करते हैं। गोविन्द! हजारों जन्मान्तरोंमें मैंने जो-जो पाप किये हों, उन सबको आप 'वासुदेव' इस नामका कीर्तन करनेमात्रसे हर लीजिये ॥ ४९-५३॥ व्यास उवाच इति स्तुतस्ततो विष्णुर्मार्कण्डेयेन धीमता। संतुष्टः प्राह विश्वात्मा तं मुनिं गरुडध्वजः॥ ५४ व्यासजी बोले—तदनन्तर बुद्धिमान् मार्कण्डेय मुनिके इस प्रकार स्तुति करनेपर गरुडचिह्नित ध्वजावाले विश्वात्मा भगवान् विष्णुने संतुष्ट होकर उनसे कहा॥ ५४॥ श्रीभगवानुवाच प्रीतोऽस्मि तपसा विप्र स्तुत्या च भृगुनन्दन। वरं वृणीष्व भद्रं ते प्रार्थितं दद्मि ते वरम्॥ ५५ श्रीभगवान् बोले—विप्र! भृगुनन्दन! मैं तुम्हारी तपस्या और स्तुतिसे प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। तुम मुझसे वर माँगो। मैं तुम्हें मुँहमाँगा वर दूँगा॥ ५५॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth