संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ११] मार्कण्डेयजीद्वारा शेषशायी भगवान्का स्तवन ४७ मार्कण्डेय उवाच त्वत्पादपद्मे देवेश भक्तिं मे देहि सर्वदा। यदि तुष्टो ममाद्य त्वमन्यदेकं वृणोम्यहम्॥ ५६ स्तोत्रेणानेन देवेश यस्त्वां स्तोष्यति नित्यशः। स्वलोकवसतिं तस्य देहि देव जगत्पते॥ ५७ दीर्घायुष्ट्वं तु यद्दत्तं त्वया मे तप्यतः पुरा। तत्सर्वं सफलं जातमिदानीं तव दर्शनात्॥ ५८ वस्तुमिच्छामि देवेश तव पादाब्जमर्चयन्। अत्रैव भगवन् नित्यं जन्ममृत्युविवर्जितः॥ ५९ मार्कण्डेयजी बोले—देवेश्वर! यदि आज आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं यही माँगता हूँ कि 'आपके चरणकमलोंमें मेरी भक्ति सदा बनी रहे।' इसके सिवा एक दूसरा वर भी मैं माँग रहा हूँ—'देव! देवेश्वर! जगत्पते! जो इस स्तोत्रसे आपकी नित्य स्तुति करे, उसे आप अपने वैकुण्ठधाममें निवास प्रदान करें।' पूर्वकालमें तपस्या करते हुए मुझको जो आपने दीर्घायु होनेका वरदान दिया था, वह सब आज आपके दर्शनसे सफल हो गया। देवेश! भगवन्! अब मैं आपके चरणारविन्दोंका पूजन करता हुआ जन्म और मृत्युसे रहित होकर यहाँ ही नित्य निवास करना चाहता हूँ॥ ५६–५९॥ श्रीभगवानुवाच मय्यस्तु ते भृगुश्रेष्ठ भक्तिरव्यभिचारिणी। भक्त्या मुक्तिर्भविष्यत्येव तव कालेन सत्तम॥ ६० यस्त्विदं पठते स्तोत्रं सायं प्रातस्त्वरितम्। मयि भक्तिं दृढां कृत्वा मम लोके स मोदते॥ ६१ यत्र यत्र भृगुश्रेष्ठ स्थितस्त्वं मां स्मरिष्यसि। तत्र तत्र समेष्यामि दान्तो भक्तवशोऽस्मि भोः॥ ६२ श्रीभगवान् बोले—भृगुश्रेष्ठ! मुझमें तुम्हारी अनन्य भक्ति बनी रहे तथा साधुशिरोमणे! समय आनेपर इस भक्तिसे तुम्हारी मुक्ति भी अवश्य ही हो जायगी। तुम्हारे कहे हुए इस स्तोत्रका जो लोग नित्य प्रातःकाल और संध्याके समय पाठ करेंगे, वे मुझमें सुदृढ़ भक्ति रखते हुए मेरे लोकमें आनन्दपूर्वक रहेंगे। भृगुश्रेष्ठ! मैं दान्त (स्ववश) होनेपर भी भक्तोंके वशमें रहता हूँ; अतः तुम जहाँ-जहाँ रहकर मेरा स्मरण करोगे, वहाँ-वहाँ मैं पहुँच जाऊँगा॥ ६०–६२॥ व्यास उवाच इत्युक्त्वा तं मुनिश्रेष्ठं मार्कण्डेयं स माधवः। विरराम स सर्वत्र पश्यन् विष्णुं यतस्ततः॥ ६३ इति ते कथितं विप्र चरितं तस्य धीमतः। मार्कण्डेयस्य च मुनेस्तेनैवोक्तं पुरा मम॥ ६४ ये विष्णुभक्त्या चरितं पुराणं भृगोस्तु पौत्रस्य पठन्ति नित्यम्। ते मुक्तपापा नरसिंहलोके वसन्ति भक्तैरभिपूज्यमानाः॥ ६५ व्यासजी बोले—मुनिवर मार्कण्डेयसे यों कहकर भगवान् लक्ष्मीपति मौन हो गये तथा वे मुनि इधर-उधर विचरते हुए सर्वत्र भगवान् विष्णुका साक्षात्कार करने लगे। विप्र! बुद्धिमान् मार्कण्डेय मुनिके इस चरित्रका, जिसे पूर्वकालमें उन्होंने स्वयं ही मुझसे कहा था, मैंने तुमसे वर्णन किया। जो लोग भृगुके पौत्र मार्कण्डेयजीके इस पुरातन चरित्रका भगवान् विष्णुमें भक्ति रखते हुए नित्य पाठ करते हैं, वे पापोंसे मुक्त हो, भक्तोंसे पूजित होते हुए भगवान् नृसिंहके लोकमें निवास करते हैं॥ ६३–६५॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे मार्कण्डेयचरितं नाम एकादशोऽध्यायः॥ ११॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'मार्कण्डेय-चरित' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth