संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १३ ] पतिव्रताकी शक्ति; उसके साथ एक ब्रह्मचारीका संवाद ५३ भिक्षाटनं तु कृत्वासौ जपन् वेदममन्द्रितः। | वहाँ जाकर वह 'ब्रह्मचारी' के रूपमें विख्यात हुआ। कुर्वन्नेवाग्निकार्यं तु नन्दिग्रामे च तस्थिवान् ॥ १९ | भिक्षाटन करके जीवन-निर्वाह करता हुआ वह | आलस्यरहित हो वेदके स्वाध्याय तथा अग्निहोत्रमें तत्पर मृते भर्तरि तन्माता पुत्रे प्रव्रजिते तु सा। | रहकर उसी नन्दिग्राममें रहने लगा। इधर उसकी माता दुःखाद्दुःखमनुप्राप्ता नियतं रक्षकं विना ॥ २० | अपने स्वामीके मरने और पुत्रके विरक्त होकर घरसे | निकल जानेके बाद किसी नियत रक्षकके न होनेसे अथ स्नात्वा तु नद्यां वै ब्रह्मचारी स्वकर्पटम्। | दुःख-पर-दुःख भोगने लगी ॥ १४-२० ॥ क्षितौ प्रसार्य शोषार्थं जपन्नासीत वाग्यतः ॥ २१ | तदनन्तर एक दिन ब्रह्मचारीने नदीमें स्नान करके | अपना वस्त्र सुखानेके लिये पृथ्वीपर फैला दिया और काको बलाका तद्वस्त्रं परिगृह्याशु जग्मतुः। | स्वयं मौन होकर जप करने लगा। इसी समय एक तौ दृष्ट्वा भर्त्सयामास देवशर्मा ततो द्विजः ॥ २२ | कौआ और बगुला—दोनों वह वस्त्र लेकर शीघ्रतासे | उड़ चले। तब उन्हें इस प्रकार करते देख देवशर्मा विष्ठामुत्सृज्य वस्त्रे तु जग्मतुस्तस्य भर्त्सनात्। | ब्राह्मणने डाँट बतायी। उसकी डाँट सुनकर वे पक्षी उस रोषेण वीक्षयामास खे यान्तौ पक्षिणौ तु सः ॥ २३ | वस्त्रपर बीट करके उसे वहीं छोड़कर चले गये। तब | ब्राह्मणने आकाशमें जाते हुए उन पक्षियोंकी ओर क्रोधपूर्वक तद्रोषवह्निना दग्धौ भूम्यां निपतितौ खगौ। | देखा। वे पक्षी उसकी क्रोधाग्निसे भस्म होकर पृथ्वीपर स दृष्ट्वा तौ क्षितिं यातौ पक्षिणौ विस्मयं गतः ॥ २४ | गिर पड़े। उन्हें पृथ्वीपर गिरा देख ब्रह्मचारी बहुत ही | विस्मित हुआ। फिर वह यह समझकर कि इस पृथ्वीपर तपसा न मया कश्चित् सदृशोऽस्ति महीतले। | तपस्यामें मेरी बराबरी करनेवाला कोई नहीं है, अनायास इति मत्वा गतो भिक्षामटितुं ग्राममञ्जसा ॥ २५ | ही गाँवमें भिक्षा माँगने चला ॥ २१-२५ ॥ | अटन् ब्राह्मणगेहेषु ब्रह्मचारी तपःस्मयी। | वत्स ! तपस्याका अभिमान रखनेवाला वह ब्रह्मचारी प्रविष्टस्तद्गृहं वत्स गृहे यत्र पतिव्रता ॥ २६ | ब्राह्मणोंके घरोंमें भीख माँगता हुआ उस घरमें गया, जहाँ | वह पतिव्रता सावित्री रहती थी। पतिव्रताने उसे देखा, तं दृष्ट्वा याच्यमानापि तेन भिक्षां पतिव्रता। | ब्रह्मचारीने भिक्षाके लिये उससे याचना की, तो भी वाग्यता पूर्वं विज्ञाय भर्तुः कृत्वानुशासनम् ॥ २७ | वह मौन ही रही। पहले उसने अपने स्वामीके | आदेशकी ओर ध्यान दे उसीका पालन किया; फिर क्षालयामास तत्पादौ भूय उष्णेन वारिणा। | गरम जलसे पतिके चरण धोये—इस प्रकार स्वामीको आश्वास्य स्वपतिं सा तु भिक्षां दातुं प्रचक्रमे ॥ २८ | आराम देकर वह भिक्षा देनेको उद्यत हुई। तब ब्रह्मचारी | क्रोधसे लाल आँखें करके अपने तपोबलके द्वारा ततः क्रोधेन रक्ताक्षो ब्रह्मचारी पतिव्रताम्। | पतिव्रताको जला देनेकी इच्छासे उसकी ओर बारंबार दग्धुकामस्तपोवीर्यात् पुनः पुनरुदैक्षत। | देखने लगा। सावित्री उसे यों करते देख हँसती हुई सावित्री तु निरीक्ष्यैवं हसन्ती सा तमब्रवीत् ॥ २९ | बोली—'ऐ क्रोधी ब्राह्मण! मैं कौआ और बगुला नहीं | हूँ, जो आज नदीके तटपर तुम्हारे कोपसे जलकर भस्म न काको न बलाकाहं त्वत्क्रोधेन तु यौ मृतौ। | हो गये थे। मुझसे यदि भीख चाहते हो, तो चुपचाप नदीतीरेऽद्य कोपात्मन् भिक्षां मत्तो यदीच्छसि ॥ ३० | ले लो' ॥ २६-३० ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth