संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १३ [संस्कृत श्लोक] तयैवमुक्तः सावित्र्या भिक्षामदाय सोऽग्रतः। चिन्तयन् मनसा तस्याः शक्तिं दूरार्थवेदिनीम्॥ ३१ एत्याश्रमे मठे स्थाप्य भिक्षापात्रं प्रयत्नतः। पतिव्रतायां भुक्तायां गृहस्थे निर्गते पतौ॥ ३२ पुनरागम्य तद्गेहं तामुवाच पतिव्रताम्। ब्रह्मचार्युवाच प्रब्रूह्येतन्महाभागे पृच्छतो मे यथार्थतः॥ ३३ विप्रकृष्टार्थविज्ञानं कथमाशु तवाभवत्। इत्युक्ता तेन सा साध्वी सावित्री तु पतिव्रता॥ ३४ तं ब्रह्मचारिणं प्राह पृच्छन्तं गृहमेत्य वै। शृणुष्वावहितो ब्रह्मन् यन्मां त्वं परिपृच्छसि॥ ३५ तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि स्वधर्मपरिबृंहितम्। स्त्रीणां तु पतिशुश्रूषा धर्म एषः परःस्थितः॥ ३६ तमेवाहं सदा कुर्यां नान्यमस्मि महामते। दिवारात्रमसंदिग्धं श्रद्धया परितोषणम्॥ ३७ कुर्वन्त्या मम सम्भूतं विप्रकृष्टार्थदर्शनम्। अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि निबोध त्वं यदीच्छसि॥ ३८ पिता यायावरः शुद्धस्तस्माद्वेदमधीत्य वै। मृते पितरि कृत्वा तु प्रेतकार्यमिहागतः॥ ३९ उत्सृज्य मातरं द्रष्टुं वृद्धां दीनां तपस्विनीम्। अनाथां विधवामत्र नित्यं स्वोदरपोषकः॥ ४० यया गर्भे धृतः पूर्वं पालितो लालितस्तथा। तां त्यक्त्वा विपिने धर्मं चरन् विप्र न लज्जसे॥ ४१ यया तव कृतं ब्रह्मन् बाल्ये मलनिकृन्तनम्। दुःखितां तां गृहे त्यक्त्वा किं भवेद्विपिनेऽटतः॥ ४२ मातृदुःखेन ते वक्त्रं पूतिगन्धमिदं भवेत्। पित्रैव संस्कृतो यस्मात् तस्माच्छक्तिरभूदियम्॥ ४३ [हिन्दी अनुवाद] सावित्रीके यों कहनेपर उससे भिक्षा लेकर वह आगे चला और उसकी दूरवर्ती घटनाको जान लेनेवाली शक्तिका मन-ही-मन चिन्तन करता हुआ अपने आश्रमपर पहुँचा। वहाँ भिक्षापात्रको यत्नपूर्वक मठमें रखकर जब पतिव्रता भोजनसे निवृत्त हो गयी और जब उसका गृहस्थ पति घरसे बाहर चला गया, तब वह पुनः उसके घर आया और उस पतिव्रतासे बोला॥ ३१-३२१/२॥ ब्रह्मचारीने कहा— महाभागे! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, तुम मुझे यथार्थरूपसे बताओ, तुम्हें दूरकी घटनाका ज्ञान इतना शीघ्र कैसे हो गया?॥ ३३१/२॥ उसके यों कहनेपर वह साध्वी पतिव्रता सावित्री घर आकर प्रश्न करनेवाले उस ब्रह्मचारीसे यों बोली—'ब्रह्मन्! तुम मुझसे जो कुछ पूछते हो, उसे सावधान होकर सुनो—स्वधर्म-पालनसे बढ़े हुए अपने परोक्षज्ञानके विषयमें मैं तुमसे भलीभाँति बताऊँगी। पतिकी सेवा करना ही स्त्रियोंका सुनिश्चित परम धर्म है। महामते! मैं सदा उसी धर्मका पालन करती हूँ, किसी अन्य धर्मका नहीं। निस्संदेह मैं दिन-रात श्रद्धापूर्वक पतिको संतुष्ट करती रहती हूँ, इसीलिये मुझे दूर होनेवाली घटनाका भी ज्ञान हो जाता है। मैं तुम्हें कुछ और भी बताऊँगी; तुम्हारी इच्छा हो, तो सुनो—'तुम्हारे पिता यज्ञशर्मा यायावर-वृत्तिके शुद्ध ब्राह्मण थे। उनसे ही तुमने वेदाध्ययन किया था। पिताके मर जानेपर उनका प्रेतकार्य करके तुम यहाँ चले आये। दीन-अवस्थामें पड़कर कष्ट भोगती हुई उस अनाथ विधवा वृद्धा माताकी देख-भाल करना छोड़कर तुम यहाँ रोज अपना ही पेट भरनेमें लगे हुए हो। ब्राह्मण! जिसने पहले तुम्हें गर्भमें धारण किया और जन्मके बाद तुम्हारा लालन-पालन किया, उसे असहायावस्थामें छोड़कर वनमें धर्माचरण करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती? ब्रह्मन्! जिसने बाल्यावस्थामें तुम्हारा मल-मूत्र साफ किया था, उस दुखिया माताको घरमें अकेली छोड़कर वनमें घूमनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा? माताके कष्टसे तुम्हारा मुँह दुर्गन्धयुक्त हो जायगा। तुम्हारे पिताने ही तुम्हारा उत्तम संस्कार कर दिया था, जिससे तुम्हें यह In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth