भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 318 में से

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पृष्ठ 70

अध्याय १६ ] भगवान् विष्णुके ध्यानसे मोक्षकी प्राप्तिका प्रतिपादन ५९ अव्यक्तमूलप्रभवस्तस्मादग्रे तथोत्थितः । संसारवृक्षका वर्णन करता हूँ, जिसने इस सारे दृश्य- बुद्धिस्कन्धमयश्चैव इन्द्रियाङ्कुरकोटरः ॥ ५ प्रपञ्चको व्याप्त कर रखा है। यह संसारवृक्ष अव्यक्त परमात्मारूपी मूलसे प्रकट हुआ है। उन्हींसे प्रकट होकर महाभूतविशाखश्च विशेषैः पत्रशाखवान्। हमारे सामने इस रूपमें खड़ा है। बुद्धि (महत्तत्त्व) धर्माधर्मसुपुष्पश्च सुखदुःखफलोदयः ॥ ६ उसका तना है, इन्द्रियाँ ही उसके अङ्कुर और कोटर हैं, पञ्चमहाभूत उसकी बड़ी-बड़ी डालियाँ हैं, विशेष आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्म वृक्षः सनातनः। पदार्थ ही उसके पत्ते और टहनियाँ हैं, धर्म-अधर्म फूल एतद् ब्रह्म परं चैव ब्रह्म वृक्षस्य तस्य तत् ॥ ७ हैं, उससे 'सुख' और 'दुःख' नामक फल प्रकट होते हैं, प्रवाहरूपसे सदा रहनेवाला यह संसारवृक्ष ब्रह्मकी इत्येवं कथितं वत्स संसारवृक्षलक्षणम्। भाँति सभी भूतोंका आश्रय है। यह अपरब्रह्म और वृक्षमेनं समारूढा मोहमायान्ति देहिनः ॥ ८ परब्रह्म भी इस संसारवृक्षका कारण है। पुत्र ! इस प्रकार मैंने तुमसे संसारवृक्षका लक्षण बतलाया है। इस वृक्षपर संसरन्तीह सततं सुखदुःखसमन्विताः । चढ़े हुए देहाभिमानी जीव मोहित हो जाते हैं। प्रायः प्रायेण प्राकृता मर्त्या ब्रह्मज्ञानपराङ्मुखाः॥ ९ ब्रह्मज्ञानसे विमुख प्राकृत मनुष्य सदा सुख-दुःखसे युक्त होकर इस संसारमें फँसे रहते हैं, ब्रह्मज्ञानी विद्वान् इस छित्त्वैनं कृतिनो यान्ति नो यान्ति ब्रह्मज्ञानिनः। संसारवृक्षको नहीं प्राप्त होते । वे इसका उच्छेद करके कर्मक्रिये महाप्राज्ञ नैनं छिन्दन्ति दुष्कृताः ॥ १० मुक्त हो जाते हैं। महाप्राज्ञ शुकदेव ! जो पापी हैं, वे कर्म-क्रियाका उच्छेद नहीं कर पाते। ज्ञानी पुरुष ज्ञानरूपी एनं छित्त्वा च भित्त्वा च ज्ञानेन परमासिना । उत्तम खड्गके द्वारा इस वृक्षको छिन्न-भिन्न करके उस ततोऽमरत्वं ते यान्ति यस्मान्नावर्तते पुनः ॥ ११ अमरपदको प्राप्त करते हैं, जहाँसे जीव पुनः इस संसारमें नहीं आता। शरीर तथा स्त्रीरूपी बन्धनोंसे दृढ़तापूर्वक देहदारमयैः पाशैर्दृढं बद्धोऽपि मुच्यते । बँधा हुआ पुरुष भी ज्ञानके द्वारा मुक्त हो जाता है; अतः ज्ञानमेव परं पुंसां श्रेयसामभिवाञ्छितम्। श्रेष्ठतम पुरुषोंको ज्ञानकी प्राप्ति ही परम अभीष्ट होती है; तोषणं नरसिंहस्य ज्ञानहीनः पशुः पुमान् ॥ १२ क्योंकि ज्ञान ही भगवान् नृसिंहको संतोष देता है। ज्ञानहीन पुरुष तो पशु ही है। मनुष्योंके आहार, निद्रा, भय और आहारनिद्राभयमैथुनानि मैथुन आदि कर्म तो पशुओंके ही समान होते हैं; उनमें समानमेतत्पशुभिनराणाम् । केवल ज्ञान ही अधिक होता है। जो ज्ञानहीन हैं, वे ज्ञानं नराणामधिकं हि लोके पशुओंके ही तुल्य हैं ॥ ४-१३ ॥ ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः ॥ १३ । इति श्रीनरसिंहपुराणे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें पन्द्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥ सोलहवाँ अध्याय भगवान् विष्णुके ध्यानसे मोक्षकी प्राप्तिका प्रतिपादन श्रीशुक उवाच | श्रीशुकदेवजी बोले- पिताजी ! जो संसारवृक्षपर संसारवृक्षमारुह्य द्वन्द्वपाशशतैर्दृढैः । आरूढ़ हो; राग-द्वेषादि द्वन्द्वमय सैकड़ों सुदृढ़ पाशों बध्यमानः सुतैश्वर्यैः पतितो योनिसागरे ॥ १ | तथा पुत्र और ऐश्वर्य आदिके बन्धनसे बँधकर योनि- In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth