संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 71, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें६० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १६ यः कामक्रोधलोभैस्तु विषयैः परिपीडितः । | समुद्रमें गिरा हुआ है तथा काम, क्रोध, लोभ और बद्धः स्वकर्मभिर्गौणैः पुत्रदारैषणादिभिः ॥ २ | विषयोंसे पीड़ित होकर अपने कर्ममय मुख्य बन्धनों | तथा पुत्रैषणा और दारैषणा आदि गौण बन्धनोंसे आबद्ध स केन निस्तरत्याशु दुस्तरं भवसागरम् । | है, वह मनुष्य इस दुस्तर भवसागरको कैसे शीघ्र पार पृच्छामाख्याहि मे तात तस्य मुक्तिः कथं भवेत् ॥ ३ | कर सकता है ? उसकी मुक्ति कैसे हो सकती है ? | हमारे इस प्रश्नका समाधान कीजिये ॥ १-३ ॥ श्रीव्यास उवाच | | श्रीव्यासजी बोले- महाप्राज्ञ पुत्र ! मैंने पूर्वकालमें शृणु वत्स महाप्राज्ञ यज्ज्ञात्वा मुक्तिमाप्नुयात् । | नारदजीके मुखसे जिसका श्रवण किया था और जिसे तच्च वक्ष्यामि ते दिव्यं नारदेन श्रुतं पुरा ॥ ४ | जान लेनेपर मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर लेता है, उस दिव्य | ज्ञानका मैं तुमसे वर्णन करता हूँ। यमराजके भवनमें नरके रौरवे घोरे धर्मज्ञानविवर्जिताः । | जहाँ घोर रौरव नरकके भीतर धर्म और ज्ञानसे रहित स्वकर्मभिर्महादुःखं प्राप्ता यत्र यमालये ॥ ५ | प्राणी अपने पापकर्मोंके कारण महान् कष्ट पाते हैं, | वहाँ एक बार नारदजी गये। उन्होंने देखा, पापी जीव महापापकृतं घोरं सम्प्राप्ताः पापकृज्जनाः । | अपने महान् पापोंके फलस्वरूप घोर संकटमें पड़े हैं। आलोक्य नारदः शीघ्रं गत्वा यत्र त्रिलोचनः ॥ ६ | यह देखकर नारदजी शीघ्र ही उस स्थानपर गये, जहाँ | त्रिलोचन महादेवजी थे। वहाँ पहुँचकर सिरपर गङ्गाजीको गङ्गाधरं महादेवं शंकरं शूलपाणिनम् । | धारण करनेवाले महान् देवता शूलपाणि भगवान् प्रणम्य विधिवद्देवं नारदः परिपृच्छति ॥ ७ | शंकरको उन्होंने विधिवत् प्रणाम किया और इस | प्रकार पूछा ॥ ४-७ ॥ नारद उवाच | | नारदजी बोले- 'भगवन् ! जो संसारमें महान् द्वन्द्वों, यः संसारे महाद्वन्द्वैः कामभोगैः शुभाशुभैः । | शुभाशुभ कामभोगों और शब्दादि विषयोंसे बँधकर शब्दादिविषयैर्बद्धः पीड्यमानः षडूर्द्मिभिः ॥ ८ | छहों ऊर्मियोंद्वारा * पीड़ित हो रहा है, वह मृत्युमय कथं नु मुच्यते क्षिप्रं मृत्युसंसारसागरात् । | संसार-सागरसे किस प्रकार शीघ्र ही मुक्त हो सकता भगवन् ब्रूहि मे तत्त्वं श्रोतुमिच्छामि शंकर ॥ ९ | है ? कल्याणस्वरूप भगवान् शिव ! यह बात मुझे बताइये। तस्य तद्वचनं श्रुत्वा नारदस्य त्रिलोचनः । | मैं यही सुनना चाहता हूँ।' नारदजीका वह वचन सुनकर उवाच तमृषिं शम्भुः प्रसन्नवदनो हरः ॥ १० | त्रिनेत्रधारी भगवान् हरका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिल | उठा। वे उन महर्षिसे बोले ॥ ८-१० ॥ महेश्वर उवाच | | श्रीमहेश्वरने कहा - मुनिश्रेष्ठ ! सुनो; मैं सब प्रकारके ज्ञानामृतं च गुह्यं च रहस्यमृषिसत्तम । | बन्धनोंका भय और दुःख दूर करनेवाले गोपनीय वक्ष्यामि शृणु दुःखघ्नं सर्वबन्धभयापहम् ॥ ११ | रहस्यभूत ज्ञानामृतका वर्णन करता हूँ। तृणसे लेकर तृणादि चतुरास्यान्तं भूतग्रामं चतुर्विधम् । | चतुरानन ब्रह्माजीतक, जो चार प्रकारका प्राणिसमुदाय चराचरं जगत्सर्वं प्रसुप्तं यस्य मायया ॥ १२ | है, वह अथवा समस्त चराचर जगत् जिनकी मायासे तस्य विष्णोः प्रसादेन यदि कश्चित् प्रबुध्यते । | सुप्त हो रहा है, उन भगवान् विष्णुकी कृपासे यदि स निस्तरति संसारं देवानापि दुस्तरम् ॥ १३ | कोई जाग उठता है - ज्ञानवान् हो जाता है तो वही | देवताओंके लिये भी दुस्तर इस संसार-सागरको पार भोगैश्वर्यमदोन्मत्तस्तत्त्वज्ञानपराङ्मुखः । | कर जाता है। जो मनुष्य भोग और ऐश्वर्यके मदसे संसारसुमहापङ्के जीर्णा गौरिव मज्जति ॥ १४ | उन्मत्त और तत्त्वज्ञानसे विमुख है, वह संसाररूपी
- भूख, प्यास, जरा, मृत्यु, शोक और मोह-ये छः दुःख 'ऊर्मि' कहे गये हैं।