संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 72, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १६ ] भगवान् विष्णुके ध्यानसे मोक्षकी प्राप्तिका प्रतिपादन ६१ यस्त्वात्मानं निबध्नाति कर्मभिः कोशकारवत्। महान् पङ्कमें उस तरह डूब जाता है, जैसे कीचड़में तस्य मुक्तिं न पश्यामि जन्मकोटिशतैरपि॥ १५ फँसी हुई बूढ़ी गाय। जो रेशमके कीड़ेकी भाँति अपनेको कर्मोंके बन्धनसे बाँध लेता है, उसके लिये करोड़ों जन्मोंमें तस्मान्नारद सर्वेशं देवानां देवमव्ययम्। भी मैं मुक्तिकी सम्भावना नहीं देखता। इसलिये नारद! आराधयेत्सदा सम्यग् ध्यायेद्विष्णुं समाहितः॥ १६ सदा समाहितचित्त होकर सर्वेश्वर अविनाशी देवदेव भगवान् विष्णुका सदा भलीभाँति आराधन और ध्यान यस्तं विश्वमनाद्यन्तमाद्यं स्वात्मनि संस्थितम्। करना चाहिये॥ ११-१६॥ सर्वज्ञममलं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ १७ जो सदा उन विश्वस्वरूप, आदि-अन्तसे रहित, सबके आदिकारण, आत्मनिष्ठ, अमल एवं सर्वज्ञ भगवान् विष्णुका निर्विकल्पं निराकाशं निष्प्रपञ्चं निरामयम्। ध्यान करता है, वह मुक्त हो जाता है। जो विकल्पसे वासुदेवमजं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ १८ रहित, अवकाशशून्य, प्रपञ्चसे परे, रोग-शोकसे हीन एवं अजन्मा हैं, उन वासुदेव (सर्वव्यापी भगवान्) विष्णुका निरञ्जनं परं शान्तमच्युतं भूतभावनम्। सदा ध्यान करनेवाला पुरुष संसार-बन्धनसे मुक्त हो देवगर्भं विभुं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ १९ जाता है। जो सब दोषोंसे रहित, परम शान्त, अच्युत, प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले तथा देवताओंके भी उत्पत्ति- सर्वपापविनिर्मुक्तमप्रमेयमलक्षणम् । स्थान हैं, उन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला निर्वाणमनघं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २० पुरुष जन्म-मृत्युके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है। जो सम्पूर्ण पापोंसे शून्य, प्रमाणरहित, लक्षणहीन, शान्त तथा अमृतं परमानन्दं सर्वपापविवर्जितम्। निष्पाप हैं, उन भगवान् विष्णुका सदा चिन्तन करनेवाला ब्रह्मण्यं शंकरं विष्णुं सदा संकीर्त्य मुच्यते॥ २१ मनुष्य कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। जो अमृतमय, परमानन्दस्वरूप, सब पापोंसे रहित, ब्राह्मणप्रिय तथा सबका योगेश्वरं पुराणाख्यमशरीरं गुहाशयम्। कल्याण करनेवाले हैं, उन भगवान् विष्णुका निरन्तर नाम- अमात्रमव्ययं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २२ कीर्तन करनेसे मनुष्य संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है। जो योगोंके ईश्वर, पुराण, प्राकृत देहहीन, बुद्धिरूप गुहामें शुभाशुभविनिर्मुक्तमूर्भिष्टकपरं विभुम्। शयन करनेवाले, विषयोंके सम्पर्कसे शून्य और अविनाशी अचिन्त्यममलं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २३ हैं, उन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला पुरुष जन्म-मृत्युके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है॥ १७-२२॥ सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्तं सर्वदुःखविवर्जितम्। जो शुभ और अशुभके बन्धनसे रहित, छः ऊर्मियोंसे अप्रतर्क्यमजं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २४ परे, सर्वव्यापी, अचिन्तनीय तथा निर्मल हैं, उन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मनुष्य संसारसे मुक्त हो अनामगोत्रमद्वैतं चतुर्थं परमं पदम्। जाता है। जो समस्त द्वन्द्वोंसे मुक्त और सब दुःखोंसे तं सर्वहृद्गतं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २५ रहित हैं, उन तर्कके अविषय, अजन्मा भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करता हुआ पुरुष मुक्त हो जाता है। जो अरूपं सत्यसंकल्पं शुद्धमाकाशवत्परम्। नाम-गोत्रसे शून्य, अद्वितीय और जाग्रत् आदि तीनों एकाग्रमनसा विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २६ अवस्थाओंसे परे तुरीय परमपद हैं, समस्त भूतोंके हृदय- मन्दिरमें विद्यमान उन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान सर्वात्मकं स्वभावस्थमात्मचैतन्यरूपकम्। करनेवाला पुरुष मुक्त हो जाता है। जो रूपरहित, सत्यसंकल्प शुभ्रमेकाक्षरं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २७ और आकाशके समान परम शुद्ध हैं, उन भगवान् विष्णुका सदा एकाग्रचित्तसे चिन्तन करनेवाला मनुष्य मुक्ति प्राप्त अनिर्वाच्यमविज्ञेयमक्षरादिमसम्भवम् । कर लेता है। जो सर्वरूप, स्वभावनिष्ठ और आत्मचैतन्यरूप एकं नूतं सदा विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २८ हैं, उन प्रकाशमान एकाक्षर (प्रणवमय) भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मनुष्य मुक्त हो जाता है। In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth