भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 318 में से

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पृष्ठ 73

६२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १६ विश्वाद्यं विश्वगोप्तारं विश्वादं सर्वकामदम्। जो अनिर्वचनीय, ज्ञानातीत, प्रणवस्वरूप और जन्म- स्थानत्रयातिगं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥ २९ रहित हैं, उन एकमात्र नित्यनूतन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मनुष्य मुक्त हो जाता है। जो विश्वके सर्वदुःखक्षयकरं सर्वशान्तिकरं हरिम्। आदिकारण, विश्वके रक्षक, विश्वका भक्षण (संहार) करनेवाले सर्वपापहरं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥ ३० तथा सम्पूर्ण काम्यवस्तुओंके दाता हैं, तीनों अवस्थाओंसे अतीत उन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मनुष्य ब्रह्मादिदेवगन्धर्वैर्मुनिभिः सिद्धचारणैः। मुक्त हो जाता है। समस्त दुःखोंके नाशक, सबको शान्ति योगिभिः सेवितं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥ ३१ प्रदान करनेवाले और सम्पूर्ण पापोंको हर लेनेवाले भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मनुष्य संसार-बन्धनसे विष्णौ प्रतिष्ठितं विश्वं विष्णुर्विश्वे प्रतिष्ठितः। मुक्त हो जाता है। ब्रह्मा आदि देवता, गन्धर्व, मुनि, विश्वेश्वरमजं विष्णुं कीर्तयन्नेव मुच्यते ॥ ३२ सिद्ध, चारण और योगियोंद्वारा सेवित भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला पुरुष पाप-तापसे मुक्त हो जाता संसारबन्धनान्मुक्तिमिच्छन् काममशेषतः। है। यह विश्व भगवान् विष्णुमें स्थित है और भगवान् भक्त्यैव वरदं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥ ३३ विष्णु इस विश्वमें प्रतिष्ठित हैं। सम्पूर्ण विश्वके स्वामी, अजन्मा भगवान् विष्णुका कीर्तन करनेमात्रसे मनुष्य व्यास उवाच मुक्त हो जाता है। जो संसार-बन्धनसे मुक्ति तथा सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति चाहता है, वह यदि भक्तिपूर्वक वरदायक नारदेन पुरा पृष्ट एवं स वृषभध्वजः। भगवान् विष्णुका ध्यान करे तो सफलमनोरथ होकर यदुवाच तदा तस्मै तन्मया कथितं तव ॥ ३४ संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ २३-३३ ॥ श्रीव्यासजी कहते हैं—बेटा ! इस प्रकार पूर्वकालमें तमेव सततं ध्याहि निर्बीजं ब्रह्म केवलम्। देवर्षि नारदजीके पूछनेपर उन वृषभचिह्नित अवाप्स्यसि ध्रुवं तात शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ३५ ध्वजावाले भगवान् शंकरने उस समय उनके प्रति जो कुछ कहा था, वह सब मैंने तुमसे कह सुनाया। तात ! श्रुत्वा सुरर्षिर्विष्णोः प्राधान्यमिदमीश्वरात् । निर्बीज ब्रह्मरूप उन अद्वितीय विष्णुका ही निरन्तर ध्यान स विष्णुं सम्यगाराध्य परां सिद्धिमवाप्तवान् ॥ ३६ करो; इससे तुम अवश्य ही सनातन अविनाशी पदको प्राप्त करोगे ॥ ३४-३५ ॥ यश्चैनं पठते चैव नृसिंहकृतमानसः । देवर्षि नारदने शंकरजीके मुखसे इस प्रकार भगवान् शतजन्मकृतं पापमपि तस्य प्रणश्यति ॥ ३७ विष्णुकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन सुनकर उनकी भलीभाँति आराधना करके उत्तम सिद्धि प्राप्त कर ली। जो भगवान् विष्णोः स्तवमिदं पुण्यं महादेवेन कीर्तितम्। नृसिंहमें चित्त लगाकर इस प्रसंगका नित्य पाठ करता प्रातः स्नात्वा पठेन्नित्यममृतत्वं स गच्छति ॥ ३८ है, उसका सौ जन्मोंमें किया हुआ पाप भी नष्ट हो जाता है। महादेवजीके द्वारा कथित भगवान् विष्णुके इस पावन ध्यायन्ति ये नित्यमनन्तमच्युतं स्तोत्रका जो प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके पाठ करता हृत्पद्ममध्येऽथ कीर्तयन्ति ये। है, वह अमृतपद (मोक्ष)-को प्राप्त कर लेता है। जो उपासकानां प्रभुमीश्वरं परं लोग अपने हृदय-कमलके मध्यमें विराजमान अनन्त ते यान्ति सिद्धिं परमां तु वैष्णवीम् ॥ ३९ ॥ भगवान् अच्युतका सदा ध्यान करते हैं और उपासकोंके प्रभु उन परमेश्वर भगवान् विष्णुका कीर्तन करते हैं, वे परम उत्तम वैष्णवी सिद्धि (विष्णु-सायुज्य) प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३६-३९ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे विष्णोःस्तवराजनिरूपणे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीविष्णुस्तवराजनिरूपण' विषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth