संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 74, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ पृष्ठ की पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी प्रतिलिपि प्रस्तुत है:
अध्याय १७ ] $\qquad\qquad$ अष्टाक्षरमन्त्र और उसका माहात्म्य $\qquad\qquad$ ६३ सत्रहवाँ अध्याय अष्टाक्षरमन्त्र और उसका माहात्म्य
श्रीशुक उवाच किं जपन् मुच्यते तात सततं विष्णुतत्परः। संसारदुःखान् सर्वेषां हिताय वद मे पितः॥ १ व्यास उवाच अष्टाक्षरं प्रवक्ष्यामि मन्त्राणां मन्त्रमुत्तमम्। यं जपन् मुच्यते मर्त्यो जन्मसंसारबन्धनात्॥ २ हृत्पुण्डरीकमध्यस्थं शङ्खचक्रगदाधरम्। एकाग्रमनसा ध्यात्वा विष्णुं कुर्याज्जपं द्विजः॥ ३ एकान्ते निर्जनस्थाने विष्ण्वग्रे वा जलान्तिके। जपेदष्टाक्षरं मन्त्रं चित्ते विष्णुं निधाय वै॥ ४ अष्टाक्षरस्य मन्त्रस्य ऋषिनारायणः स्वयम्। छन्दश्च दैवी गायत्री परमात्मा च देवता॥ ५ शुक्लवर्णं च ॐकारं नकारं रक्तमुच्यते। मोकारं वर्णतः कृष्णं नाकारं रक्तमुच्यते॥ ६ राकारं कुङ्कुमाभं तु यकारं पीतमुच्यते। णाकारमञ्जनाभं तु यकारं बहुवर्णकम्॥ ७ ॐ नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः। भक्तानां जपतां तात स्वर्गमोक्षफलप्रदः। वेदानां प्रणवेनैष सिद्धो मन्त्रः सनातनः॥ ८ सर्वपापहरः श्रीमान् सर्वमन्त्रेषु चोत्तमः। एनमष्टाक्षरं मन्त्रं जपन्नारायणं स्मरेत्॥ ९ संध्यावसाने सततं सर्वपापैः प्रमुच्यते। एष एव परो मन्त्र एष एव परं तपः॥ १० एष एव परो मोक्ष एष स्वर्ग उदाहृतः। सर्ववेदरहस्येभ्यः सार एष समुद्धृतः॥ ११ विष्णुना वैष्णवानां हि हिताय मनुजां पुरा। एवं ज्ञात्वा ततो विप्रो ह्यष्टाक्षरमिमं स्मरेत्॥ १२
[हिन्दी अनुवाद]
श्रीशुकदेवजी बोले—तात! पिताजी! मनुष्य सदा भगवान् विष्णुके भजनमें तत्पर रहकर किस मन्त्रका जप करनेसे सांसारिक कष्टसे मुक्त होता है? यह मुझे बताइये। इससे सब लोगोंका हित होगा॥ १॥ श्रीव्यासजी बोले—बेटा! मैं तुम्हें सभी मन्त्रोंमें उत्तम अष्टाक्षरमन्त्र बतलाऊँगा, जिसका जप करनेवाला मनुष्य जन्म और मृत्युसे युक्त संसाररूपी बन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ २॥ द्विजको चाहिये कि अपने हृदय-कमलके मध्यभागमें शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णुका एकाग्रचित्तसे ध्यान करते हुए जप करे। एकान्त, जनशून्य स्थानमें, श्रीविष्णुमूर्तिके सम्मुख अथवा जलाशयके निकट मनमें भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए अष्टाक्षरमन्त्रका जप करना चाहिये। साक्षात् भगवान् नारायण ही अष्टाक्षरमन्त्रके ऋषि हैं, दैवी गायत्री छन्द है, परमात्मा देवता हैं, ॐकार शुक्लवर्ण है, 'न' रक्तवर्ण है, 'मो' कृष्णवर्ण है, 'ना' रक्त है, 'रा' कुङ्कुम-रंगका है, 'य' पीतवर्णका है, 'णा' अञ्जनके समान कृष्णवर्णवाला है और 'य' विविध वर्णोंसे युक्त है। तात! यह 'ॐ नमो नारायणाय' मन्त्र समस्त प्रयोजनोंका साधक है और भक्तिपूर्वक जप करनेवाले लोगोंको स्वर्ग तथा मोक्षरूप फल देनेवाला है॥ ३—७ १/२ ॥ यह सनातन मन्त्र वेदोंके प्रणव (सारभूत अक्षरों)- से सिद्ध होता है। यह सभी मन्त्रोंमें उत्तम, श्रीसम्पन्न और सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला है। जो सदा संध्याके अन्तमें इस अष्टाक्षरमन्त्रका जप करता हुआ भगवान् नारायणका स्मरण करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। यही उत्तम मन्त्र है और यही उत्तम तपस्या है। यही उत्तम मोक्ष तथा यही स्वर्ग कहा गया है। पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने वैष्णवजनोंके हितके लिये सम्पूर्ण वेद-रहस्योंसे यह सारभूत मन्त्र निकाला है। इस प्रकार जानकर ब्राह्मणको चाहिये कि इस अष्टाक्षर-मन्त्रका स्मरण (जप) करे॥ ८—१२॥
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth