भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 318 में से

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पृष्ठ 75

६४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १७

स्नात्वा शुचिः शुचौ देशे जपेत् पापविशुद्धये । जपे दाने च होमे च गमने ध्यानपर्वसु ॥ १३

जपेन्नारायणं मन्त्रं कर्मपूर्वे परे तथा। जपेत्सहस्रं नियुतं शुचिर्भूत्वा समाहितः ॥ १४

मासि मासि तु द्वादश्यां विष्णुभक्तो द्विजोत्तमः । स्नात्वा शुचिर्जपेद्यस्तु नमो नारायणं शतम् ॥ १५

स गच्छेत् परमं देवं नारायणमनामयम्। गन्धपुष्पादिभिर्विष्णुमनेनाराध्य यो जपेत् ॥ १६

महापातकयुक्तोऽपि मुच्यते नात्र संशयः । हृदि कृत्वा हरिं देवं मन्त्रमेनं तु यो जपेत् ॥ १७

सर्वपापविशुद्धात्मा स गच्छेत् परमां गतिम्। प्रथमेन तु लक्षेण आत्मशुद्धिर्भविष्यति ॥ १८

द्वितीयेन तु लक्षेण मनुसिद्धिमवाप्नुयात् । तृतीयेन तु लक्षेण स्वर्गलोकमवाप्नुयात् ॥ १९

चतुर्थेन तु लक्षेण हरेः सामीप्यमाप्नुयात्। पञ्चमेन तु लक्षेण निर्मलं ज्ञानमाप्नुयात् ॥ २०

तथा षष्ठेन लक्षेण भवेद्विष्णौ स्थिरा मतिः । सप्तमेन तु लक्षेण स्वरूपं प्रतिपद्यते ॥ २१

अष्टमेन तु लक्षेण निर्वाणमधिगच्छति। स्वस्वधर्मसमायुक्तो जपं कुर्याद् द्विजोत्तमः ॥ २२

एतत् सिद्धिकरं मन्त्रमष्टाक्षरमतन्द्रितः । दुःस्वप्नासुरपैशाचा उरगा ब्रह्मराक्षसाः ॥ २३

जापिनं नोपसर्पन्ति चौरक्षुद्राधयस्तथा। एकाग्रमनसाव्यग्रो विष्णुभक्तो दृढव्रतः ॥ २४

जपेन्नारायणं मन्त्रमेतन्मृत्युभयापहम्। मन्त्राणां परमो मन्त्रो देवतानां च दैवतम् ॥ २५


स्नान करके, पवित्र होकर, शुद्ध स्थानमें बैठकर पापशुद्धिके लिये इस मन्त्रका जप करना चाहिये। जप, दान, होम, गमन, ध्यान तथा पर्वके अवसरपर और किसी कर्मके पहले तथा पश्चात् इस नारायण-मन्त्रका जप करना चाहिये। भगवान् विष्णुके भक्तश्रेष्ठ द्विजको चाहिये कि वह प्रत्येक मासकी द्वादशी तिथिको पवित्र-भावसे एकाग्रचित्त होकर सहस्र या लक्ष मन्त्रका जप करे ॥ १३-१४¹/₂॥

स्नान करके पवित्रभावसे जो ‘ॐ नमो नारायणाय' मन्त्रका सौ (एक सौ आठ) बार जप करता है, वह निरामय परमदेव भगवान् नारायणको प्राप्त करता है। जो इस मन्त्रके द्वारा गन्ध-पुष्प आदिसे भगवान् विष्णुकी आराधना करके इसका जप करता है, वह महापातकसे युक्त होनेपर भी निस्संदेह मुक्त हो जाता है। जो हृदयमें भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए इस मन्त्रका जप करता है, वह समस्त पापोंसे विशुद्धचित्त होकर उत्तम गतिको प्राप्त करता है ॥ १५-१७¹/₂॥

एक लक्ष मन्त्रका जप करनेसे चित्तशुद्धि होती है, दो लक्षके जपसे मन्त्रकी सिद्धि होती है, तीन लक्षके जपसे मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त कर सकता है, चार लक्षसे भगवान् विष्णुकी समीपता प्राप्त होती है और पाँच लक्षसे निर्मल ज्ञानकी प्राप्ति होती है। इसी प्रकार छः लक्षसे भगवान् विष्णुमें चित्त स्थिर होता है, सात लक्षसे भगवत्स्वरूपका ज्ञान होता है और आठ लक्षसे पुरुष निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त कर लेता है। द्विजमात्रको चाहिये कि अपने-अपने धर्मसे युक्त रहकर इस मन्त्रका जप करे। यह अष्टाक्षरमन्त्र सिद्धिदायक है। आलस्य त्यागकर इसका जप करना चाहिये। इसे जप करनेवाले पुरुषके पास दुःस्वप्न, असुर, पिशाच, सर्प, ब्रह्मराक्षस, चोर और छोटी-मोटी मानसिक व्याधियाँ भी नहीं फटकती हैं ॥ १८-२३¹/₂॥

विष्णुभक्तको चाहिये कि वह दृढ़संकल्प एवं स्वस्थ होकर एकाग्रचित्तसे इस नारायण-मन्त्रका जप करे। यह मृत्युभयका नाश करनेवाला है। मन्त्रोंमें सबसे उत्कृष्ट मन्त्र और देवताओंका भी देवता (आराध्य) है।


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