संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 76, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १७ ] अष्टाक्षरमन्त्र और उसका माहात्म्य ६५ गुह्यानां परमं गुह्यमोंकाराद्यक्षराष्टकम् । यह ॐकारादि अष्टाक्षर-मन्त्र गोपनीय वस्तुओंमें परम गोपनीय आयुष्यं धनपुत्रांश्च पशून् विद्यां महद्यशः ॥ २६ है। इसका जप करनेवाला मनुष्य आयु, धन, पुत्र, पशु, विद्या, महान् यश एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको भी धर्मार्थकाममोक्षांश्च लभते च जपन्नरः। प्राप्त कर लेता है। यह वेदों और श्रुतियोंके कथनानुसार एतत् सत्यं च धर्म्यं च वेदश्रुतिनिदर्शनात् ॥ २७ धर्मसम्मत तथा सत्य है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ये मन्त्ररूपी नारायण मनुष्योंको सिद्धि देनेवाले हैं। ऋषि, एतत् सिद्धिकरं नृणां मन्त्ररूपं न संशयः । पितृगण, देवता, सिद्ध, असुर और राक्षस इसी परम उत्तम ऋषयः पितरो देवाः सिद्धास्त्वसुरराक्षसाः ॥ २८ मन्त्रका जप करके परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। जो ज्योतिष एतदेव परं जप्त्वा परां सिद्धिमितो गताः । आदि अन्य शास्त्रोंके विधानसे अपना अन्तकाल निकट ज्ञात्वा यस्त्वात्मनः कालं शास्त्रान्तरविधानतः । जानकर इस मन्त्रका जप करता है, वह भगवान् विष्णुके अन्तकाले जपेन्नेति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ २९ प्रसिद्ध परमपदको प्राप्त होता है ॥ २४-२९ ॥ नारायणाय नम इत्ययमेव सत्यं भव्य बुद्धिवाले विरक्त पुरुष प्रसन्नतापूर्वक मेरी संसारघोरविषसंहरणाय मन्त्रः । बात सुनें—मैं दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर उच्चस्वरसे शृण्वन्तु भव्यमतयो मुदितास्त्वरागा यह उपदेश देता हूँ कि "संसाररूपी सर्पके भयानक उच्चैस्तरामुपदिशाम्यहमूर्ध्वबाहुः ॥ ३० ॥ विषका नाश करनेके लिये यह 'ॐ नारायणाय नमः' मन्त्र ही सत्य (अमोघ) औषध है"। पुत्र और शिष्यो ! भूत्वोर्ध्वबाहुरद्याहं सत्यपूर्वं ब्रवीम्यहम् । सुनो—आज मैं दोनों बाँहें ऊपर उठाकर सत्यपूर्वक हे पुत्र शिष्याः शृणुत न मन्त्रोऽष्टाक्षरात्परः ॥ ३१ कह रहा हूँ कि 'अष्टाक्षरमन्त्र' से बढ़कर दूसरा कोई मन्त्र नहीं है। मैं भुजाओंको ऊपर उठाकर सत्य, सत्य सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुत्क्षिप्य भुजमुच्यते । और सत्य कह रहा हूँ, 'वेदसे बढ़कर दूसरा शास्त्र वेदाच्छास्त्रं परं नास्ति न देवः केशवात् परः ॥ ३२ और भगवान् विष्णुसे बढ़कर दूसरा कोई देवता नहीं आलोच्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः । है।' सम्पूर्ण शास्त्रोंकी आलोचना तथा बार-बार उनका विचार करनेसे एकमात्र यही उत्तम कर्तव्य सिद्ध होता इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा ॥ ३३ है कि 'नित्य-निरन्तर भगवान् नारायणका ध्यान ही इत्येतत् सकलं प्रोक्तं शिष्याणां तव पुण्यदम् । करना चाहिये'। बेटा ! तुमसे और शिष्योंसे यह सारा कथाश्च विविधाः प्रोक्ता मया भज जनार्दनम् ॥ ३४ पुण्यदायक प्रसंग मैंने कह सुनाया तथा नाना प्रकारकी कथाएँ भी सुनायीं; अब तुम भगवान् जनार्दनका भजन अष्टाक्षरमिमं मन्त्रं सर्वदुःखविनाशनम् । करो। महाबुद्धिमान् पुत्र! यदि तुम सिद्धि चाहते हो तो जप पुत्र महाबुद्धे यदि सिद्धिमभीप्ससि ॥ ३५ इस सर्वदुःखनाशक अष्टाक्षरमन्त्रका जप करो। जो पुरुष इदं स्तवं व्यासमुखात्तु निस्सृतं श्रीव्यासजीके मुखसे निकले हुए इस स्तोत्रका त्रिकाल संध्यात्रये ये पुरुषाः पठन्ति । संध्याके समय पाठ करेंगे, वे धुले हुए श्वेत वस्त्र तथा ते धौतपाण्डुरपटा इव राजहंसाः राजहंसोंके समान निर्मल (विशुद्ध)-चित्त हो निर्भयतापूर्वक संसारसागरमपेतभयास्तरन्ति ॥ ३६ संसार-सागरसे पार हो जायँगे ॥ ३०-३६ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे अष्टाक्षरमाहात्म्यं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'अष्टाक्षरमन्त्रका माहात्म्य' नामक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥ 1113 Narsingpuran_Section_4_1_Front Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth