संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 77, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १८ अठारहवाँ अध्याय भगवान् सूर्यद्वारा संज्ञाके गर्भसे मनु, यम और यमीकी, छायाके गर्भसे मनु, शनैश्चर एवं तपतीकी उत्पत्ति तथा अश्वरूपधारिणी संज्ञासे अश्विनीकुमारोंका प्रादुर्भाव सूत उवाच सूतजी बोले—मुनिवरो तथा महामते भरद्वाज! इति श्रुत्वा कथाः पुण्याः सर्वपापप्रणाशिनीः। पूर्वकालमें श्रीकृष्णद्वैपायनसे इस प्रकार नाना भाँतिकी नानाविधा मुनिश्रेष्ठाः कृष्णद्वैपायनात् पुनः॥ १ पावन पापनाशक कथाएँ सुनकर महाभाग शुक अन्य सिद्धगणोंके साथ भगवान् नारायणकी आराधनामें तत्पर शुकः पूर्वं महाभागो भरद्वाजो महामते। हो गये। ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने आपसे पाप-नाश सिद्धैरन्यैश्च सहितो नारायणपरोऽभवत् ॥ २ करनेवाली मार्कण्डेय आदिकी विचित्र कथाएँ कहीँ; अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ १-३॥ एवं ते कथिता विप्र मार्कण्डेयादिकाः कथाः। भरद्वाजजी बोले—सूतजी! आपने पहले मुझसे मया विचित्राः पापघ्न्यः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥ ३ वसु आदि देवताओंकी सृष्टिका उस प्रकार वर्णन किया; परंतु अश्विनीकुमारों तथा मरुद्गणोंकी उत्पत्ति नहीं कही; भरद्वाज उवाच अतः अब उसे ही कहिये ॥४॥ वस्वादीनां तथा प्रोक्ता मम सृष्टिस्त्वया पुरा। सूतजी बोले—महामते ! पूर्वकालमें शक्तिनन्दन अश्विनोर्मरुतां चैव नोक्तोत्पत्तिस्तु तां वद ॥ ४ श्रीपराशरजीने विष्णुपुराणमें मरुद्गणोंकी उत्पत्तिका विस्तार- पूर्वक वर्णन किया है तथा वायुदेवताने वायुपुराणमें सूत उवाच अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्ति भी विस्तारपूर्वक कही है; मरुतां विस्तरेणोक्ता वैष्णवाख्ये महामते। अतः मैं यहाँ संक्षेपसे ही इस सृष्टिका वर्णन करूँगा, पुराणे शक्तिपुत्रेण पुरोत्पत्तिश्च वायुना ॥ ५ सुनिये ॥ ५-६॥ प्रजापति दक्षकी एक कन्या अदिति नामसे प्रसिद्ध अश्विनोर्देवयोश्चैव सृष्टिरुक्ता सुविस्तरात्। है। उनके गर्भसे 'आदित्य' नामक पुत्र हुआ। अदितिकुमार संक्षेपात्तव वक्ष्यामि सृष्टिमेतां शृणुष्व मे ॥ ६ आदित्यको त्वष्टा प्रजापतिने अपनी संज्ञा नामकी कन्या दक्षकन्यादितिः। अदितेरादित्यः पुत्रः। तस्मै ब्याह दी। आदित्य भी त्वष्टाकी रूपवती एवं मनोरमा त्वष्टा दुहितरं संज्ञां नाम कन्यां दत्तवान् ॥ ७॥ सोऽपि कन्या संज्ञाको पाकर उसके साथ सुखपूर्वक रहने लगे। संज्ञा अपने पतिके तापको न सह सकनेके कारण कुछ त्वाष्ट्रीं रूपवतीं मनोज्ञां प्राप्य तया सह रेमे। सा कालके बाद अपने पिताके घर चली गयी। उस कन्याको कतिपयात् कालात् स्वभर्तुरादित्यस्य तापमसहन्ती देखकर पिताने कहा—'बेटी ! तुम्हारे स्वामी सूर्यदेव पितुर्गृहं जगाम ॥८॥ तामवलोक्य सुतां पितोवाच तुम्हारा स्नेहपूर्वक पालन करते हैं या तुम्हारे साथ किं पुत्रि तव भर्त्ता सविता स्नेहात् त्वां रक्षत्युत कठोरतापूर्ण व्यवहार करते हैं?' पिताकी ऐसी बात परुष इति ॥ ९॥ एवं पितुर्वचनं श्रुत्वा संज्ञा तं सुनकर संज्ञा उनसे बोली—'तात! मैं स्वामीके प्रचण्ड प्रत्युवाच। दग्धाहुं भर्तुः प्रचण्डतापादिति ॥ १० ॥ तापसे जल गयी हूँ।' यह सुनकर पिताने उससे कहा— 'बेटी! तुम पतिके घर चली जाओ। पतिकी सेवा करना एवं श्रुत्वा तामाह पिता गच्छ पुत्रि भर्तुर्गृहमिति ही युवती स्त्रियोंका परम उत्तम धर्म है। मैं भी कुछ ॥ ११॥ युवतीस्त्रीणां भर्तुः शुश्रूषणमेव धर्मः दिनोंके बाद आकर जामाता आदित्यदेवकी उष्णताको श्रेयान्। अहमपि कतिपयदिवसादागत्या- उनके शरीरसे कुछ कम कर दूँगा' ॥ ७-१२॥ दित्यस्योष्णतां जामातुरुद्धरिष्यामि ॥ १२ ॥ 1113 Narsingpuran_Section_4_1_Back In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth