भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 318 में से

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पृष्ठ 78

अध्याय १८ ] भगवान् सूर्यद्वारा संज्ञाके गर्भसे मनु, यम और यमीकी उत्पत्ति ६७

इत्युक्ता सा च पुनर्भातृगृहं प्राप्य कतिपय- | पिताके यों कहनेपर वह पुनः पतिके घर लौट आयी दिवसान्मनुं यमीं यमं चापत्यत्रयमादित्यात् प्रासूत। | तथा कुछ दिनोंके बाद क्रमशः मनु, यम और यमी पुनस्तदुष्णतामसहन्ती छायां भर्तुरुपभोगाय | (यमुना)—इन तीन संतानोंको जन्म दिया। किंतु पुनः स्वप्रज्ञाबलेनोत्पाद्य तत्र संस्थाप्य गत्वोत्तर- | जब सूर्यका ताप उससे नहीं सहा गया, तब संज्ञाने अपनी कुरूनधिश्चायाश्वी भूत्वा विचचार ॥ १३ ॥ | बुद्धिके बलसे स्वामीके उपभोगके लिये अपनी छाया | (प्रतिबिम्ब)-स्वरूपा एक स्त्रीको उत्पन्न किया तथा उसे | ही घरमें रखकर वह उत्तरकुरुदेशमें चली गयी और वहाँ | घोड़ीका रूप धारण करके इधर-उधर विचरने लगी ॥ १३ ॥ आदित्योऽपि संज्ञेयमिति मत्वा तस्यां जायां | अदितिनन्दन सूर्यने भी उसे संज्ञा ही मानकर उस पुनरपत्यत्रयमुत्पादयामास ॥ १४ ॥ मनुं शनैश्चरं तपतीं | अपनी जाया (भार्या)-रूपधारिणी छायाके गर्भसे पुनः च। स्वेष्वपत्येषु पक्षपातेन वर्तन्तीं छायां दृष्ट्वा यमः | मनु, शनैश्चर तथा तपती—इन तीन संतानोंको उत्पन्न स्वपितरमाह नेयमस्मन्मातेति ॥ १५ ॥ पितापि | किया। छायाको अपनी संतानोंके प्रति पक्षपातपूर्ण बर्ताव तच्छ्रुत्वा भार्यां प्राह। सर्वेष्वपत्येषु सममेव | करते देखकर यमने अपने पितासे कहा—'तात! यह वर्ततामिति ॥ १६ ॥ पुनरपि स्वेष्वपत्येषु स्नेहात् | हमलोगोंकी माता नहीं है।' पिताने भी जब यह सुना, तब प्रवर्तन्तीं छायां दृष्ट्वा यमो यमी च तां | उस भार्यासे कहा—'सब संतानोंके प्रति समानरूपसे ही बहुविधमपीत्थमूवाच। आदित्यसंनिधानात् तूष्णीं | बर्ताव करो।' फिर भी छायाको अपनी ही संतानोंके प्रति बभूवतुः ॥ १७॥ ततश्छाया तयोः शापं दत्तवती। | अधिक स्नेहपूर्ण बर्ताव करते देख यम और यमीने उसे यम त्वं प्रेतराजो भव यमि त्वं यमुना नाम नदी | बहुत कुछ बुरा-भला कहा, किंतु जब सूर्यदेव पास आये, भवेति ॥ १८ ॥ ततः क्रोधादादित्योऽपि छायापुत्रयोः | तब वे दोनों चुप हो रहे। यह देख छायाने उन दोनोंको शापं दत्तवान् हे पुत्र शनैश्चर त्वं ग्रहो भव | शाप देते हुए कहा—'यम! तुम प्रेतोंके राजा बनो और क्रूरदृष्टिर्मन्दगामी च पापग्रहस्त्वं च ॥ १९ ॥ पुत्रि | यमी! तू 'यमुना' नामक नदी हो जा।' छायाका यह तपती नाम नदी भवेति। अथादित्यो ध्यानमास्थाय | क्रूरतापूर्ण बर्ताव देखकर भगवान् सूर्य भी कुपित हो उठे संज्ञा क्व स्थितेति विचारयामास ॥ २० ॥ | और उसके पुत्रोंको शाप देते हुए बोले—'बेटा शनैश्चर! | तू क्रूरतापूर्ण दृष्टिसे देखनेवाला मन्दगामी ग्रह हो जा। तेरी | गणना पापग्रहोंमें होगी। बेटी तपती! तू भी 'तपती' | नामकी नदी हो जा!' इसके बाद भगवान् सूर्य ध्यानस्थ | होकर विचार करने लगे कि 'संज्ञा' कहाँ है ॥ १४-२० ॥ स दृष्ट्वानुत्तरकुरुषु ध्यानचक्षुषाश्वीभूय | उन्होंने ध्यान-नेत्रसे देखा, संज्ञा उत्तरकुरुमें 'अश्वा' का विचरन्तीम्। स्वयं चाश्वरूपेण तत्र गत्वा | रूप धारण करके विचर रही है। तब वे स्वयं भी अश्वका तया सह सम्पर्कं कृतवान् ॥ २१ ॥ | रूप धारण करके वहाँ गये। जाकर उन्होंने उसके साथ तस्यामेवादित्यादश्विनावुत्पन्नौ तयोरतिशयवपुषोः | समागम किया। उस अश्वरूपधारिणी संज्ञाके ही गर्भसे साक्षात् प्रजापतिरागत्य देवत्वं यज्ञभागत्वं मुख्यं च | सूर्यके वीर्यसे दोनों 'अश्विनीकुमार' उत्पन्न हुए। उनके देवानां भिषजत्वं दत्त्वा जगाम। आदित्यश्चाश्वरूपं | शरीर सब देवताओंसे अधिक सुन्दर थे। साक्षात् ब्रह्माजीने विहाय स्वभार्यां संज्ञां त्वाष्ट्रीं स्वरूपधारिणीं | वहाँ पधारकर उन दोनों कुमारोंको देवत्व तथा यज्ञोंमें भाग नीत्वा स्वरूपमास्थाय दिवं जगाम ॥ २२ ॥ | प्राप्त करनेका अधिकार प्रदान किया। साथ ही उन्हें | देवताओंका प्रधान वैद्य बना दिया। इसके बाद ब्रह्माजी चले | गये। फिर सूर्यदेवने अश्वका रूप त्यागकर अपना स्वरूप

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