संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 82, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १९ ] विश्वकर्माद्वारा १०८ नामोंसे भगवान् सूर्यका स्तवन ७१ ७६. योगज्ञः — भगवान् श्रीहरिसे कर्मयोगका ज्ञान प्राप्त करके उसका मनुको उपदेश करनेवाले*, ७७. योगभावनः — योगको प्रकट करनेवाले ॥ ११ ॥ ७८. अमृतात्मा शिवः — अमृतस्वरूप शिव, अमृतात्मा शिवो नित्यो वरेण्यो वरदः प्रभुः। ७९. नित्यः — सनातन, ८०. वरेण्यः — वरणीय — आश्रय धनदः प्राणदः श्रेष्ठः कामदः कामरूपधृक् ॥ १२ लेनेयोग्य, ८१. वरदः — उपासकको मनोवाञ्छित वर देनेवाले, ८२. प्रभुः — सब कुछ करनेमें समर्थ, ८३. धनदः — धनदान करनेवाले, ८४. प्राणदः — प्राणदाता, ८५. श्रेष्ठः — सबसे उत्कृष्ट, ८६. कामदः — मनोवाञ्छित वस्तु देनेवाले, ८७. कामरूपधृक् — इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले ॥ १२ ॥ ८८. तरणिः — संसारसागरसे तारनेवाले, तरणिः शाश्वतः शास्ता शास्त्रज्ञस्तपनः शयः। ८९. शाश्वतः — सनातन पुरुष, ९०. शास्ता — शासक वेदगर्भो विभुर्वीरः शान्तः सावित्रिवल्लभः ॥ १३ या उपदेशक, ९१. शास्त्रज्ञः — समस्त शास्त्रोंके ज्ञाता, तपनः — तपनेवाले या ताप देनेवाले, ९२. शयः — सबके अधिष्ठान या आश्रय, ९३. वेदगर्भः — शुक्लयजुर्वेदको प्रकट करनेवाले, ९४. विभुः — सर्वत्र व्यापक, ९५. वीरः — शूरवीर, ९६. शान्तः — शमयुक्त, ९७. सावित्रिवल्लभः — गायत्रीमन्त्रके अधिदेवता ॥ १३ ॥ ९८. ध्येयः — ध्यान करनेयोग्य, ९९. विश्वेश्वरः — सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर, १००. भर्ता — सबका भरण- ध्येयो विश्वेश्वरो भर्ता लोकनाथो महेश्वरः। पोषण करनेवाले, १०१. लोकनाथः — संसारके रक्षक, महेन्द्रो वरुणो धाता विष्णुरग्निर्दिवाकरः ॥ १४ १०२. महेश्वरः — परमेश्वर, १०३. महेन्द्रः — देवराज इन्द्र-स्वरूप, १०४. वरुणः — पश्चिम दिशाके अधिपति 'वरुण' नामक आदित्य, १०५. धाता — जगत्का धारण- पोषण करनेवाले अथवा 'धाता' नामक आदित्य, १०६. विष्णुः — व्यापक अथवा 'विष्णु' नामक आदित्य, १०७. अग्निः — अग्निस্বরূপ, १०८. दिवाकरः — रात्रिका अंधकार दूर करके प्रकाशपूर्ण दिनको प्रकट करनेवाले ॥ १४ ॥ एतैस्तु नामभिः सूर्यः स्तुतस्तेन महात्मना। उन महात्मा विश्वकर्माने उपर्युक्त नामोंद्वारा भगवान् उवाच विश्वकर्माणं प्रसन्नो भगवान् रविः ॥ १५ सूर्यका स्तवन किया। इससे भगवान् सूर्यको बड़ी प्रसन्नता हुई और वे उन विश्वकर्मासे बोले ॥ १५ ॥ प्रजापते! आपकी बुद्धिमें जो बात है — आप जिस उद्देश्यको लेकर आये हैं, वह मुझे ज्ञात है। अतः आप भ्रमिमारोप्य मामत्र मण्डलं मम शातय। मुझे शाणचक्रपर चढ़ाकर मेरे मण्डलको छाँट दें; इससे त्वद्बुद्धिस्थं मया ज्ञातमेवमौष्ण्यं शमं व्रजेत् ॥ १६ मेरी उष्णता कुछ कम हो जायगी ॥ १६ ॥
- जैसा कि गीतामें कहा है — 'इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान् मनवे प्राह....................॥'