भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 83

७२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २० इत्युक्तो विश्वकर्मा च तथा स कृतवान् द्विज। ब्रह्मन् ! भगवान् सूर्यके यों कहनेपर विश्वकर्माने शान्तोष्णाः सविता तस्य दुहितुर्विश्वकर्मणः ॥ १७ वैसा ही किया। विप्रवर! उस दिनसे प्रकाशस्वरूप सविता विश्वकर्माकी बेटी संज्ञाके लिये शान्त हो गये तथा उनकी उष्णता कम हो गयी। इसके बाद वे त्वष्टासे बोले ॥ १७१/२ ॥ संज्ञायाश्चाभवद्विप्र भानुस्त्वष्टारमब्रवीत्। अनघ! चूँकि आपने एक सौ आठ नामोंके द्वारा त्वया यस्मात् स्तुतोऽहं वै नाम्नामष्टशतेन च ॥ १८ मेरी स्तुति की है, इसलिये मैं प्रसन्न होकर आपको वर देनेके लिये उद्यत हूँ। कोई वर माँगिये ॥ १८१/२ ॥ वरं वृणीष्व तस्मात् त्वं वरदोऽहं तवानघ। भगवान् सूर्यके यों कहनेपर विश्वकर्मा बोले-देव! इत्युक्तो भानुना सोऽथ विश्वकर्माब्रवीदिदम् ॥ १९ यदि आप मुझे वर देनेको उद्यत हैं तो यह मुझे वर वरदो यदि मे देव वरमेतं प्रयच्छ मे। प्रदान कीजिये- 'देव भास्कर! जो मनुष्य इन नामोंके एतैस्तु नामभिर्यस्त्वां नरः स्तोष्यति नित्यशः॥ २० द्वारा प्रतिदिन आपकी स्तुति करे, उस भक्तपुरुषके सारे तस्य पापक्षयं देव कुरु भक्तस्य भास्कर ॥ २१ पापोंका आप नाश कर दें' ॥ १९-२१ ॥ तेनैवमुक्तो दिनकृत् तथेति विश्वकर्माके यों कहनेपर दिन प्रकट करनेवाले त्वष्टारमुक्त्वा विरराम भास्करः। भगवान् भास्कर उनसे 'बहुत अच्छा' कहकर चुप हो संज्ञां विशङ्कां रविमण्डलस्थितां गये, तत्पश्चात् सूर्यमण्डलमें निवास करनेवाली संज्ञाको कृत्वा जगामाथ रविं प्रसाद्य ॥ २२ निर्भय करके, सूर्यदेवको संतुष्टकर विश्वकर्मा अपने स्थानको चले गये ॥ २२ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥ बीसवाँ अध्याय मारुतोंकी उत्पत्ति सूत उवाच श्रीसूतजी बोले- द्विजश्रेष्ठ! अब मैं मारुतोंकी साम्प्रतं मारुतोत्पत्तिं वक्ष्यामि द्विजसत्तम। पुरा उत्पत्तिका वर्णन करूँगा। पूर्वकालमें देवासुर-संग्राममें देवासुरे युद्धे देवैरिन्द्रादिभिर्दितैः ॥ १ ॥ पुत्राः पराभूता इन्द्र आदि देवताओंद्वारा दितिके पुत्र दैत्यगण पराजित दितिश्च विनष्टपुत्रा महेन्द्रदर्पहरं पुत्रमिच्छन्ती हो गये थे। उस समय दिति, जिसके पुत्र नष्ट हो कश्यपमृषिं स्वपतिमाराधयामास ॥ २ ॥ स च गये थे, महेन्द्रके अभिमानको चूर्ण करनेवाले पुत्रकी तपसा संतुष्टो गर्भाधानं चकार तस्याम्। इच्छा मनमें लेकर अपने पति कश्यप ऋषिकी पुनस्तामेवमुक्तवान् ॥ ३ ॥ यदि त्वं शुचिः सती आराधना करने लगी। तपस्यासे संतुष्ट होकर ऋषिने दितिके भीतर गर्भका आधान किया। फिर वे उससे इस प्रकार बोले- 'यदि तुम पवित्र रहती हुई In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth