भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 318 में से

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पृष्ठ 84

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अध्याय २१ ] सूर्यवंशका वर्णन ७३


[अध्याय २० (अवशिष्ट भाग)]

[संस्कृत] शरच्छतमिमं गर्भं धारयिष्यसि ततश्च महेन्द्रदर्पहन्ता पुत्रो भविष्यति। इत्येवमुक्ता सा च तं गर्भं धारयामास ॥ ४ ॥ इन्द्रोऽपि तज्ज्ञात्वा वृद्धब्राह्मणरूपेणागत्य दितिपाश्र्वं स्थितवान्। किंचिदूनपूर्णे वर्षशते पादशौचमकृत्वा दितिः शयनमारुह्य निद्रां गता ॥ ५ ॥ सोऽपि लब्धावसरो वज्रपाणिस्तत्कुक्षिं प्रविश्य वज्रेण तं गर्भं सप्तधा चिच्छेद। सोऽपि तेन प्रच्छिद्यमानो रुरोद ॥ ६ ॥ मा रोदीरिति वदन्निन्द्रस्तान् सप्तधैकैकं चिच्छेद ॥ ७ ॥ सप्तधा ते सर्वे मरुतो यतो जातमात्रान्मा रोदीरित्युक्तवान्। महेन्द्रस्य सहाया अमी मरुतो नाम देवा बभूवुः ॥ ८ ॥

एवं मुने सृष्टिरियं तवेरिता देवासुराणां नरनागरक्षसाम् । वियन्मुखानामपि यः पठेदिदं शृण्वंश्च भक्त्या हरिलोकमेति सः ॥ ९ ॥

[हिन्दी अनुवाद] सौ वर्षोंतक इस गर्भको धारण कर सकोगी तो उसके बाद इन्द्रका दर्प चूर्ण करनेवाला पुत्र तुम्हारे गर्भसे उत्पन्न होगा।' कश्यपजीके यों कहनेपर दितिने उस गर्भको धारण किया ॥ १-४ ॥

इन्द्रको भी जब यह समाचार ज्ञात हुआ, तब वे बूढ़े ब्राह्मणके वेषमें दितिके पास आये और रहने लगे। जब सौ वर्ष पूर्ण होनेमें कुछ ही कमी रह गयी, तब एक दिन दिति (भोजनके पश्चात्) पैर धोये बिना ही शय्यापर आरूढ़ हो, सो गयी। इधर इन्द्रने भी अवसर प्राप्त हो जानेसे वज्र हाथमें ले, दितिके उदरमें प्रविष्ट हो, वज्रसे उस गर्भके सात टुकड़े कर दिये। उनके द्वारा काटे जानेपर वह गर्भ रोने लगा। तब इन्द्रने 'मा रोदीः' (मत रोओ)—यों कहते हुए पुनः एक-एकके सात-सात टुकड़े कर डाले। इस तरह सात-सात टुकड़ोंमें बँटे हुए वे सातों खण्ड 'मारुत' नामसे विख्यात हुए; क्योंकि जन्म होते ही इन्द्रने उन्हें 'मा रोदीः'-इस प्रकार कहा था। ये सभी इन्द्रके सहायक 'मरुत्' नामक देवता हुए ॥ ५-८ ॥

मुने! इस प्रकार मैंने तुमसे देवता, असुर, नर, नाग, राक्षस और आकाश आदि भूतोंकी सृष्टिका वर्णन किया। जो इसका भक्तिपूर्वक पाठ अथवा श्रवण करता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त होता है ॥ ९ ॥

इति श्रीनरसिंहपुराणे विंशतितमोऽध्यायः ॥ २० ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'मरुतोंकी उत्पत्ति' नामक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥


इक्कीसवाँ अध्याय

सूर्यवंशका वर्णन

भरद्वाज उवाच अनुसर्गश्च सर्गश्च त्वया चित्रा कथेरिता । वंशमन्वन्तरे ब्रूहि वंशानुचरितं च मे ॥ १ ॥

भरद्वाजजी बोले— सूतजी! आपने 'सर्ग' और 'अनुसर्ग' का वर्णन किया, विचित्र कथाएँ सुनायीं; अब मुझसे राजाओंके वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचरितका वर्णन करें ॥ १ ॥

सूत उवाच राज्ञां वंशः पुराणेषु विस्तरेण प्रकीर्तितः । संक्षेपात् कथयिष्यामि वंशमन्वन्तराणि ते ॥ २ ॥

वंशानुचरितं चैव शृणु विप्र महामते । शृण्वन्तु मुनयश्चेमे श्रोतुमागत्य ये स्थिताः ॥ ३ ॥

सूतजी बोले— पुराणोंमें राजाओंके वंशका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है; यहाँ मैं राजाओंके वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचरितका संक्षेपसे वर्णन करूँगा। महामते विप्रवर! इसे आप तथा अन्य मुनि भी, जो कथाश्रवणके लिये यहाँ आकर ठहरे हुए हैं, सुनें ॥ २-३ ॥