संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 95, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५
ऋषीणां देवतानां च नायकत्वं प्रकाशितम्। यतस्ततः सुरैरग्रे पूज्यसे त्वं भवात्मज ॥ १४
त्वामाराध्य गणाध्यक्षं सर्वज्ञं कामरूपिणम्। कार्यार्थं रक्तकुसुमै रक्तचन्दनवारिभिः ॥ १५
रक्ताम्बरधरो भूत्वा चतुर्थ्यामर्चयेज्जपेत्। त्रिकालमेककालं वा पूजयेन्नियताशनः ॥ १६
राजानं राजपुत्रं वा राजमन्त्रिणमेव वा। राज्यं च सर्वविघ्नेश वशं कुर्यात् सराष्ट्रकम् ॥ १७
अविघ्नं तपसो मह्यं कुरु नौमि विनायक। मयेत्थं संस्तुतो भक्त्या पूजितश्च विशेषतः ॥ १८
यत्फलं सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु यत्फलम्। तत्फलं पूर्णमाप्नोति स्तुत्वा देवं विनायकम् ॥ १९
विषमं न भवेत् तस्य न च गच्छेत् पराभवम्। न च विघ्नो भवेत् तस्य जातो जातिस्मरो भवेत् ॥ २०
य इदं पठते स्तोत्रं षड्भिर्मासैर्वरं लभेत्। संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ॥ २१
भयभीत किया था। शिवपुत्र ! आपने ऋषि और देवताओंपर अपना स्वामित्व प्रकट कर दिया है, इसीसे देवगण आपकी प्रथम पूजा करते हैं। सर्वविघ्नेश्वर ! यदि मनुष्य रक्तवस्त्र धारणकर नियमित आहार करके अपने कार्यकी सिद्धिके लिये लाल पुष्पों और रक्तचन्दन-युक्त जलसे चतुर्थीके दिन तीनों काल या एक कालमें आप कामरूपी सर्वज्ञ गणपतिको पूजन करे तथा आपका नाम जपे तो वह पुरुष राजा, राजकुमार, राजमन्त्रीको राज्य अथवा समस्त राष्ट्रसहित अपने वशमें कर सकता है ॥ १३-१७ ॥
विनायक! मैं आपकी स्तुति करता हूँ। आप मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक स्तवन एवं विशेषरूपसे पूजन किये जानेपर मेरी तपस्याके विघ्नको दूर कर दें। सम्पूर्ण तीर्थों और समस्त यज्ञोंमें जो फल प्राप्त होता है, उसी फलको मनुष्य भगवान् विनायकका स्तवन करके पूर्णरूपसे प्राप्त कर लेता है। उसपर कभी संकट नहीं आता, उसका कभी तिरस्कार नहीं होता और न उसके कार्यमें विघ्न ही पड़ता है; वह जन्म लेनेके बाद पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेवाला होता है। जो प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह छः महीनोंतक निरन्तर पाठ करनेसे गणेशजीसे मनोवाञ्छित वर प्राप्त करता है और एक वर्षमें पूर्णतः सिद्धि प्राप्त कर लेता है—इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ १८-२१ ॥
सूत उवाच
एवं स्तुत्वा पुरा राजा गणाध्यक्षं द्विजोत्तम। तापसं वेषमास्थाय तपश्चर्तुं गतो वनम् ॥ २२
उत्सृज्य वस्त्रं नागत्वक्सदृशं बहुमूल्यकम्। कठिनां तु त्वचं वार्क्षीं कट्यां धत्ते नृपोत्तमः ॥ २३
तथा रत्नानि दिव्यानि वलयानि निरस्य तु। अक्षसूत्रमलंकारं फलैः पद्मस्य शोभनम् ॥ २४
तथोत्तमाङ्गे मुकुटं रत्नहाटकशोभितम्। त्यक्त्वा जटाकलापं तु तपोऽर्थे बिभृयान्नृपः ॥ २५
कृत्वेत्थं स तपोवेषं वसिष्ठोक्तं तपोवनम्। प्रविश्य च तपस्तेपे शाकमूलफलाशनः ॥ २६
सूतजी बोले— द्विजोत्तमगण ! इस प्रकार राजा इक्ष्वाकु पहले गणेशजीका स्तवन करके, फिर तपस्वीका वेष धारणकर तप करनेके लिये वनमें चले गये। साँपकी त्वचाके समान मुलायम एवं बहुमूल्य वस्त्र त्यागकर वे श्रेष्ठ महाराज कमरमें वृक्षोंकी कठोर छाल पहनने लगे। दिव्य रत्नोंके हार और कड़े निकालकर हाथमें अक्षसूत्र तथा गलेमें कमलगट्टोंकी बनी हुई सुन्दर माला धारण करने लगे। इसी प्रकार वे नरेश मस्तकपरसे रत्न तथा सुवर्णसे सुशोभित मुकुट हटाकर वहाँ तपस्याके लिये जटाजूट रखने लगे ॥ २२-२५ ॥
इस प्रकार वसिष्ठजीके कथनानुसार तापस-वेष धारणकर तपोवनमें प्रविष्ट हो, वे शाक और फल-मूलका आहार करते हुए तपस्यामें प्रवृत्त हो गये।